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कुडुख लोकनृत्य के पर्याय बन चुके हैं रांची के सरन उरांव

Updated at : 13 Sep 2019 5:57 AM (IST)
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कुडुख लोकनृत्य के पर्याय बन चुके हैं रांची के सरन उरांव

सुनील मिंज सरन उरांव झारखंडी जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने वाले बेहद प्रभावशाली, सशक्त और प्रतिबद्ध कलाकार-चिंतक हैं.कुडुख लोकनृत्य के क्षेत्र में वह एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से नृत्य का ऐसा संसार रचा, जिसमें कुडुख समुदाय बेहद आनंदित महसूस करता है. उनके नृत्य से किसी को यह महसूस नहीं […]

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सुनील मिंज

सरन उरांव झारखंडी जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने वाले बेहद प्रभावशाली, सशक्त और प्रतिबद्ध कलाकार-चिंतक हैं.कुडुख लोकनृत्य के क्षेत्र में वह एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से नृत्य का ऐसा संसार रचा, जिसमें कुडुख समुदाय बेहद आनंदित महसूस करता है. उनके नृत्य से किसी को यह महसूस नहीं हुआ कि वह विकलांग हैं. सरन उरांव एवं परिवार की एक कटिबद्ध सांस्कृतिक टोली है, जो विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों में स्टाल लगा कर पारंपरिक परिधानों की प्रदर्शनी-बिक्री करती है.

यह एक सांस्कृतिक अभियान है, जिसकी आज बड़ी जरूरत है. इस कल्चरल टीम ने एक अन्य सांस्कृतिक टीम के साथ मिल कर ‘गांधी के 150वीं जयंती’ के अवसर पर उनके ही गीत ‘रघु पति राघव राजा राम…’ का कुडुख अनुवाद कर आदिवासी म्यूजिक में पिरोया है, जिसकी प्रस्तुति इंडिया हैबिटेट सेंटर में की जा चुकी है.

फिलहाल वह रांची के सुखदेवनगर के हेहल स्थित पावा टोली में परिवार के साथ रहते हैं. उनके घर पर ही मानो आदिवासी संग्रहालय बना हुआ है, जहां आप आदिवासी वाद्ययंत्र जैसे नागाड़ा, मांदर, झुनकी, झांझ, कर्ताल, सभी आदिवासी समुदायों के पारंपरिक परिधान- करया, कुखेना, पड़िया, बंडी, तीर, धनुष, और चाला-पच्चो की दैवीय तस्वीर आदि सांस्कृतिक धरोहरों को देख सकते हैं.

वह बचपन से ही रसिक मिजाजी हैं. नौकरी के दौरान भी उनका यह शौक बना रहा. वह अच्छे गायक और नर्तक हैं. कार्यालय महालेखाकार बिहार, की ओर से कार्यालय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, नयी दिल्ली द्वारा आयोजित द्वितीय अखिल भारतीय ऑडिट एवं एकाउंट्स संस्कृति प्रतियोगिता जनवरी, 1990 हैदराबाद में उनकी टीम द्वारा आदिवासी लोकगीत एवं नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्हें प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

इसके अलावा तृतीय एवं चतुर्थ अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतियोगिता, 1991 (कोलकता)और 1992 में नागपुर (महाराष्ट्र) में लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रस्तुत किया गया. केंद्रीय सिविल सेवा क्रीड़ा तथा सांस्कृतिक बोर्ड नयी दिल्ली द्वारा आयोजित सांस्कृतिक प्रतियोगिता, फरवरी 1990 में उनके समूह के द्वारा लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रस्तुत किया गया. स्थानीय स्तर पर सरना नव युवक संघ, रांची द्वारा आयोजित सरहुल एवं करम पूर्व संध्या समारोह 1991 में उनकी सांस्कृतिक टोली सरन उरांव एवं परिवार को प्रथम पुरस्कार मिजा.

सरन उरांव का जन्म 12 दिसंबर, 1949 को रांची लापुुंग थाना क्षेत्र के माड़ी दरमी टोली में हुआ. पिता जेंगा उरांव और माता रामी उरांव के घर. उनकी उच्च शिक्षा 1969 में संत जेवियर काॅलेज, रांची से हुई. स्नातकोत्तर की शिक्षा रांची काॅलेज, रांची से 1972 में हुई.

आदिवासी धर्म, साहित्य, कला एवं संस्कृति पर नियमित कार्य करके उन्होंने हमारे समाज का नाम ऊंचा किया. वह कुडुख आदिवासी समुदाय के मान बढ़ाने वाले बड़े कलाकार हैं. आदिवासी समाज को आज उनकी राह पर चलने की आवश्यकता है.

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