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प्लास्टिक का बढ़ता कहर

Updated at : 01 Sep 2019 2:43 AM (IST)
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प्लास्टिक का बढ़ता कहर

भारत में 1.65 करोड़ टन प्लास्टिक की सालाना खपत होती है, जिसमें से 43 फीसदी का इस्तेमाल सिर्फ एक बार होता है. करीब 80 फीसदी प्लास्टिक कचरे में फेंका जाता है तथा 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जमा भी नहीं हो पाता. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपिता […]

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भारत में 1.65 करोड़ टन प्लास्टिक की सालाना खपत होती है, जिसमें से 43 फीसदी का इस्तेमाल सिर्फ एक बार होता है. करीब 80 फीसदी प्लास्टिक कचरे में फेंका जाता है तथा 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जमा भी नहीं हो पाता. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक एक बार इस्तेमाल होनेवाले प्लास्टिक की मुसीबत से छुटकारा पाने का आह्वान किया है. इस कोशिश में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ विभिन्न संस्थाओं और नागरिकों को भी बढ़-चढ़कर योगदान करना चाहिए.
26 हजार टन प्लास्टिक प्रतिदिन उत्पन्न होता है भारत में
दुनिया के बाकी देशों की तरह भारत भी प्लास्टिक कचरे की समस्या से जूझ रहा है. दिन-ब-दिन देश में प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा लगाये गये एक अनुमान के अनुसार, 25,940 टन प्लास्टिक प्रतिदिन उत्पन्न होता है भारत में, जो लगभग नौ हजार एशियाई हाथी या 86 बोइंग 747 जेट के वजन के बराबर है. इस प्लास्टिक में 94 प्रतिशत थर्मोप्लास्टिक या रिसाइकिल किये जाने वाले प्लास्टिक मटीरियल जैसे पॉलिइथीलीन टेरीप्थैलेट व पॉलिविनाइल क्लोराइड शामिल होते हैं. सात से आठ बार रिसाइकिल किये जाने के बाद ही इन मटीरियल का निस्तारण किया जा सकता है.
  • 10,386 टन इनमें से ऐसे प्लास्टिक हैं, जो रिसाइकिल नहीं किये जाते हैं, यानी ये इधर-उधर बिखरे रहते हैं.
  • प्रतिदिन उत्पन्न होनेवाले इस प्लास्टिक कचरा का छठवां हिस्सा 60 शहरों द्वारा पैदा किया जाता है.
  • हमारे देश में प्रतिदिन जितना प्लास्टिक कचरा पैदा हाेता है, उसका 50 प्रतिशत दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों से आता है.
सीपीसीबी से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर दिल्ली स्थित द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) की 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में प्रतिवर्ष उत्पन्न होनेवाले कुल ठोस कचरे का आठ प्रतिशत प्लास्टिक कचरा होता है. जिसके उत्पादन में दिल्ली देश में पहले स्थान पर है, जबकि कोलकाता और अहमदाबाद क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं.
वर्ष 2017-18 में हमारे देश में 6,60,787.90 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न हुआ
देश में जितनी प्लास्टिक की खपत होती है, उसका लगभग 70 प्रतिशत ऐसे ही छोड़ दिया जाता है. अधिकांश भारतीय शहरों में इसका प्रसंस्करण नहीं होता है.
वर्ष 2017 के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में प्लास्टिक कचरे से सबसे ज्यादा प्रदूषित होनेवाली नदी गंगा है.
महामारी बनता प्लास्टिक
दुनियाभर में जिस तरह से प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ रहा है, उससे यह प्रदूषण अब महामारी का रूप ले चुका है. प्लास्टिक कचरा भूमि को दूषित तो कर ही रहा है, साथ ही अधिकांश कचरा बहकर समुद्रों में जा रहा है. यह कचरा हर साल 10 लाख से अधिक समुद्री पक्षियों और एक लाख से अधिक समुद्री जीवों की मौत का कारण बन रहा है.
इस ग्रह को बचाने के लिए प्लास्टिक के इस्तेमाल पर ठहरकर सोचना होगा. प्लास्टिक का हर टुकड़ा धरती के लिए खतरनाक है. धरती पर बिखरे, समुद्रों में तैरते और सूक्ष्म कणों में तब्दील होकर भोज्य पदार्थों को दूषित करता प्लास्टिक कण हर प्रकार से खतरनाक है.
प्लास्टिक कचरा निबटान का नहीं है कोई ठोस उपाय
प्लास्टिक रिसाइकिलिंग तभी संभव है, जब इसे विभिन्न रासायनिक घटकों में बारीकी से विभाजित कर दिया जाये. आमतौर पर जिस प्लास्टिक को लोग जानते हैं, उसके अनेक घटक होते हैं. मुख्य रूप से सात प्रकार के प्लास्टिक मटीरियल होते हैं, जैसे- सोडा बोतल, कचरा पेटी, रैप, शॉपिंग बैग, कंटेनर, मछली पकड़ने के जाल, फोम रोधन और तमाम अधात्विक घरेलू सामानों को बनाने में अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है. इन अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक जैसे-पीइटीइ, एलडीपीइ, पीवीसी, पीपी आदि की रिसाइकिलिंग के लिए विभिन्न रासायनिक प्रक्रिया की जरूरत होती है.
सबसे बड़ी समस्या अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक कचरे को एकत्र करना और फिर से रासायनिक संघटकों के साथ आधार पर अलग करना, बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है. समुद्रों में फैले प्लास्टिक टुकडों को एकत्र करना तो बहुत ही मुश्किल है. विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक मिश्रित हो चुके हैं, कुछ तो सूर्य की गर्मी और तरंगों की वजह से रासायनिक और भौतिक तौर पर विखंडित हो चुके हैं. सूक्ष्म टुकड़ों में तब्दील हो चुके माइक्रोप्लास्टिक सतह के नीचे पहुंच गये हैं.
हर साल लाखों मीटरिक टन प्लास्टिक कचरा
प्लास्टिक का उत्पादन, उपभोग और कचरा बनने की प्रक्रिया भयावह रूप से बढ़ रही है. पर्यावरण विशेषकर दुनिया के समुद्र हिस्से के लिए यह संकट लगातार विकराल हो रहा है. बड़े पैमाने पर प्लास्टिक का उत्पादन 1950 के दशक में बढ़ा, तब से यह बहुत तेजी से बढ़ता ही जा रहा है. उ
स दौर में जिस प्लास्टिक का उत्पादन किया गया, वह आज भी हमारे आसपास मौजूद है. प्लास्टिक पदार्थों को पूर्ण रूप से विखंडित नहीं किया जा सकता है. इसके सूक्ष्म कणों का व्यास पांच मिलीमीटर से कम होता है, जो पूरी धरती पर बिखरा हुआ है.
प्लास्टिक पॉल्यूशन कोलिशन की सीइओ डायना कोहेन के अनुसार, बीते 70 वर्षों में विश्व स्तर पर 8.3 अरब मीटरिक टन प्लास्टिक का उत्पादन किया जा चुका है. पर्यावरण में प्लास्टिक इस कदर व्याप्त हो चुका है कि हम जो पानी पीते हैं या खाना खाते हैं और सांसें लेते हैं, वह भी प्लास्टिक से अछूता नहीं है.
नदियों से प्लास्टिक पहुंच रहा है समुद्र में
साल 2016 में विश्व आर्थिक मंच की एक रिपोर्ट में बताया गया कि हर साल 80 लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में पहुंच रहा है. प्रत्येक मिनट एक ट्रक प्लास्टिक कचरा समुद्र में दाखिल हो रहा है. धरती की सतह पर लोगों द्वारा फेंका गया प्लास्टिक कचरा बारिश और शहरी नालों द्वारा नदियों में पहुंचता है, जो आखिरकार समुद्र में समाहित होता है. इस मामले में एशिया सबसे ऊपर है. दुनिया में आप कहीं भी रहें, लेकिन इस्तेमाल किया जानेवाले हर प्लास्टिक टुकड़ा किसी-न-किसी रास्ते समुद्र में ही पहुंच रहा है.
समुद्री जीवों की मौत बन रहा है प्लास्टिक
पूरी समुद्री पारिस्थितिकीय प्लास्टिक की गिरफ्त में है. इसकी वजह से 800 से अधिक समुद्री जीवों की प्रजातियों के सामने संकट है. विशेषकर समुद्री कछुए और व्हेल के गले और पेट प्लास्टिक से अट जाते हैं, जो उ‌नकी मौत का कारण बनता है. मछलियां प्लास्टिक खा रही हैं, जो खाद्य शृंखला का हिस्सा बनकर मानव शरीर में जा रही हैं. प्लास्टिक की वजह से समुद्री जीव भूख से धीमी और दर्दनाक मौत मरते हैं, क्योंकि जीवों के पेट में प्लास्टिक पहुंच चुका होता है, जिसका पाचन नहीं हो पाता है.
िबखरा प्लािस्टक प्रकृति के लिए गंभीर खतरा
प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जो बिखरा हुआ है. ये बिखरे प्लास्टिक हमारी प्राकृतिक चीजों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं. चूंकि ये रिसाइकिल नहीं किये जाते हैं, ऐसे में किसी न किसी रूप में ये प्रकृति में ही मौजूद रहते हैं और उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं. एलन मैक आर्थर फाउंडेशन के एक अनुमान के मुताबिक, 2050 तक दुनिया भर के समुद्र और महासागर में मछलियों के वजन से ज्यादा प्लास्टिक होगा.
पैकेजिंग इंडस्ट्री में सर्वाधिक प्लास्टिक का इस्तेमाल
फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा किये गये अध्ययन से पता चलता है प्लास्टिक का सर्वाधिक इस्तेमाल पैकेजिंग इंडस्ट्री द्वारा किया जाता है. वर्ष 2020 तक प्लास्टिक प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के 2.2 करोड़ टन तक हो जाने की उम्मीद है, जबकि वर्ष 2015 में यह 1.34 करोड़ टन था. और इनमें आधे लगभग वैसे प्लास्टिक हैं, जिनका सिर्फ एक बार उपयोग (सिंगल यूज वाले प्लास्टिक ) किया जा सकता है.
ऑनलाइन डिलिवरी भी बढ़ा रही समस्या
अपशिष्ट प्रबंधन विशेषज्ञ की मानें तो, ऑनलाइन रिटेल और फूड डिलिवरी एप की लोकप्रियता ने भी प्लास्टिक कचरे की समस्या को बढ़ा दिया है. हालांकि इसे लेकर कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसइ) के एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सबसे बड़े ऑनलाइन डिलीवरी स्टार्टअप्स स्विगी और जोमैटो दोनों में से प्रत्येक 2.8 करोड़ ऑर्डर की डिलिवरी प्रतिमाह करते हैं.
जोमैटो के सीइओ दीपेंदर गोयल के बीते वर्ष सितंबर में लिखे एक ब्लॉग के अनुसार, फूड डिलिवरी समूहों द्वारा भारत के प्लास्टिक कचरे में हर महीने 22 हजार टन की वृद्धि की जाती है. सीएसइ मानती है कि इ-कॉमर्स कंपनियां भी पैकेजिंग के लिए अत्यधिक मात्रा में प्लास्टिक का उपयोग करती हैं.
भारत में प्रति व्यक्ति 11 किलो प्लास्टिक खपत
प्लास्टिक उपभोग का वैश्विक आंकड़ा प्रति व्यक्ति 28 किलो है.
अमेरिका में प्रति व्यक्ति 109 किलो, चीन में 38 किलो और भारत में 11 किलो प्लास्टिक उपभोग किया जाता है प्रतिवर्ष़
एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2022 तक भारत में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति प्लास्टिक खपत 20 किलो तक पहुंच जायेगी.
वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष प्लास्टिक खपत के दो करोड़ टन तक पहुंच जाने की उम्मीद है.
कुल उत्पादित प्लास्टिक का 80 प्रतिशत पैकेजिंग सेक्टर में इस्तेमाल होता है.स्रोत : टेरी
पैकेजिंग उद्योग ने उत्पन्न किये सबसेज्यादा प्लास्टिक अपशिष्ट
गेयर, जेमबैक व लॉ (2017) की रूपांतरित रिपोर्ट (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के सौजन्य से ) के अनुसार, वैश्विक स्तर पर प्रतिवर्ष 40 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है. जिसका सबसे ज्यादा उपभोग पैकेजिंग इंडस्ट्री द्वारा किया गया.
इस प्रकार पैकेजिंग इंडस्ट्री ने वर्ष 2015 में 36 प्रतिशत प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न किया. जबकि बिल्डिंग व कंस्ट्रक्शन ने 16, टेक्सटाइल ने 14, कंज्यूमर व इंस्टीट्यूशनल प्रोडक्ट्स ने 10, ट्रांसपोर्टेशन ने सात, इलेक्ट्रिकल/ इलेक्ट्रॉनिक्स ने चार व इंडस्ट्रियल मशीनरी ने एक प्रतिशत प्लास्टिक कचरा पैदा किया. बाकि बचे उद्योगों द्वारा 12 प्रतिशत कचरा उत्पन्न किया गया.
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