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खो गया खोरठा का ‘अर्जुन’

Updated at : 25 Jan 2019 9:12 AM (IST)
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खो गया खोरठा का ‘अर्जुन’

दीपक सवाल खोरठा जगत ने अपनी एक और विभूति खो दी है. अर्जुन प्रसाद पानुरी नहीं रहे. हाल के वर्षों की बात करें, तो डॉ एके झा के बाद खोरठा भाषा-साहित्य के लिए यह दूसरी बड़ी क्षति है. वैसे तो, संतोष कुमार महतो, प्रह्लाद चंद्र दास ‘आला’ जैसे कुछ अन्य खोरठा साहित्यकारों का निधन भी […]

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दीपक सवाल
खोरठा जगत ने अपनी एक और विभूति खो दी है. अर्जुन प्रसाद पानुरी नहीं रहे. हाल के वर्षों की बात करें, तो डॉ एके झा के बाद खोरठा भाषा-साहित्य के लिए यह दूसरी बड़ी क्षति है. वैसे तो, संतोष कुमार महतो, प्रह्लाद चंद्र दास ‘आला’ जैसे कुछ अन्य खोरठा साहित्यकारों का निधन भी हाल के कुछ वर्षों में हुआ है. इस दशक में खोरठा की अनेक विभूति इस दुनिया से विदा हो गयीं, लेकिन डॉ झा के बाद अर्जुन पानुरी का जाना खोरठा जगत के लिए अधिक अपूरणीय क्षति है.
अर्जुन पानुरी मूलतः बरवाअड्डा, धनबाद के निवासी थे. वह खोरठा के लब्धप्रतिष्ठ आदि कवि व साहित्यकार श्रीनिवास पानुरी के पुत्र थे. उनका जन्म 24 जून 1954 को हुआ था. 1986 में श्रीनिवास पानुरी के निधन के बाद अर्जुन पानुरी अपने पिता के साहित्यिक उत्तराधिकारी के रूप में सामने आये. इस ‘अर्जुन’ की तुलना महाभारत के पांडव पुत्र अर्जुन से भी की जा सकती है.
जिस प्रकार पांडव के खोये गौरव को वापस पाने के लिए उनके पुत्र अर्जुन ने जंग के मैदान में वीरता के साथ लड़ाई लड़ी थी, उसी प्रकार अपने पिता श्रीनिवास पानुरी के गौरवपूर्ण साहित्यिक इतिहास को बचाये रखने के लिए इस अर्जुन ने भी आजीवन संघर्ष किया. अर्जुन पानुरी के बारे में यहां तक कहा जाता है कि इन्होंने उससे भी अधिक काम किया, जितना कि प्रेमचंद के लिए अमृत राय ने किया था.
कुछ साहित्यकारों का तो यहां तक मत है कि श्रीनिवास पानुरी के निधन के बाद खोरठा क्षेत्र में उनके योगदान को कतिपय लोग जिस प्रकार दबाने की इच्छा रखते थे, वह अर्जुनजी के कारण ही सफल नहीं हो सके. श्रीनिवास पानुरी एक समृद्ध साहित्यिक विरासत छोड़ गये थे. अर्जुनजी के कंधे पर उस विरासत को बचाने की चुनौती थी. उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारा और अपने पिता की उस साहित्यिक विरासत को संजोने और स्थापित करने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी. अगर अर्जुन यह काम करने के लिए आगे न आये हुए होते, तो उनके पिता श्रीनिवास पानुरी की समृद्ध साहित्यिक विरासत का हाल डॉ एके झा की तरह हो गया होता. एके झा अपने पीछे खोरठा साहित्य का खजाना छोड़ गये थे.
उनके पेटरवार स्थित आवास के अनोखे ‘साहित्य कक्ष’ (एक तरह की लाइब्रेरी) में यह खजाना देखने को मिलता था, लेकिन उनके निधन के बाद जैसे सब-कुछ तितर-बितर हो कर रह गया, किंतु अर्जुन पानुरी ने अपने पिता की कृतियों के साथ ऐसा नहीं होने दिया.
अर्जुनजी हर वर्ष 25 दिसंबर को अपने पिता (श्रीनिवास पानुरी) की जयंती पर अपने यहां भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन कराते थे. इसमें उस इलाके के मशहूर राजनेता एके रॉय, राजकिशोर महतो, फूलचंद मंडल, मथुरा महतो, आनंद महतो आदि की भागीदारी समय-समय पर रही.
धनबाद के नामचीन साहित्यकार मनमोहन पाठक, विकल शास्त्री, खोरठा साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद नागर, नरेश नीलकमल, नारायण महतो, नारायण मंडल, विनय तिवारी, जयप्रकाश दसौंधी, महेंद्र प्रबुद्ध जैसों की भागीदारी रहती थी. बाद में बोकारो के एके झा, गिरिधारी गोस्वामी ‘आकाशखूंटी’, शिवनाथ प्रामाणिक ‘मानिक’, प्रदीप कुमार ‘दीपक’, सुकुमार, अंबुज कुमार ‘अंबुज’, गोमो के श्याम सुंदर महतो ‘श्याम’, महेंद्रनाथ गोस्वामी ‘सुधाकर’, गिरिडीह के शिवनंदन पांडेय ‘गरीब’, बहादुर पांडेय, डॉ संजय, रामगढ़ में डॉ बीएन ओहदार, रांची से दिनेश दिनमणि आदि नामी-गिरामी साहित्यकार भाग लेते थे.
इस मौके पर आगंतुक साहित्यकारों को खोरठा के क्षेत्र में उनके विशेष योगदान के लिए ‘पानुरी स्मृति साहित्य सम्मान’ से सम्मानित किया जाता था. कुल मिला कर इस आयोजन की अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसे ‘खोरठा कुंभ’ जैसा नाम दिया जाने लगा. यह पूरा आयोजन अर्जुनजी ही कराते थे. उनके जाने के बाद क्या यह आयोजन जारी रहा पायेगा? कहने का मतलब कि खोरठा के अन्य साहित्यकार क्या इस आयोजन की जिम्मेदारी उठायेंगे, यह अब वक्त ही बता पायेगा.
अर्जुनजी ने अपने पिता की कृतियों को पुनः प्रकाशित एवं अप्रकाशित पांडुलिपियों को प्रकाशित करने-कराने का काम कर खोरठा जगत को अनमोल तोहफा दिया. 1954 में लिखित ‘बाल किरण’, ‘दिव्य ज्योति’, ‘मेघदूत’ एवं ‘रामकथा अमृत’ का पुनः प्रकाशन तथा ‘चाबी-काठी’, ‘आंखिक गीत’ (कविता संग्रह), ‘उदभाषण करण’ (नाटक) एवं ‘रक्ते भिंगल पांखा’ का प्रकाशन विशेष उल्लेखनीय है.
हालांकि, श्रीनिवासजी की कई कृतियां अब भी प्रकाशित नहीं हो सकी हैं, लेकिन अर्जुनजी ने उनके साहित्यिक उत्तराधिकारी के रूप में जितना कुछ किया, वह अविस्मरणीय है.
ऐसा माना जाता है कि साहित्यकार की संतान बहुत कम ही साहित्य क्षेत्र में आ पाती हैं अथवा आना पसंद करती हैं, लेकिन श्रीनिवासजी के पांच पुत्रों व तीन पुत्रियों में अर्जुनजी अपने पिता के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए न केवल आगे आये, बल्कि पूरी निष्ठा के साथ जीवन-पर्यंत समर्पित रहे.
वैसे तो, अर्जुन पानुरी की शिक्षा-दीक्षा स्नातक तक थी, लेकिन जब वह आठवीं कक्षा में अध्ययनरत थे, उन्हीं दिनों से हिंदी और खोरठा में लिखना शुरू कर दिया था. यूं कहें, तो श्रीनिवास पानुरी के पांच पुत्रों में उनके साहित्य लेखन का प्रभाव केवल अर्जुन पानुरी पर पड़ा और उन्होंने पिता के पद-चिन्हों पर चलते हुए बचपन से ही लिखना प्रारंभ कर दिया.
इनकी पहली कविता आदिवासी पत्रिका में 1978-79 में प्रकाशित हुई थी. आकाशवाणी रांची से भी इनकी रचनाएं प्रसारित होने लगीं. आकशवाणी ने इनकी पहली रचना ‘परिवार नियोजन’ पर प्रसारित किया था. खोरठा पत्रिका ‘लुआठी’ ने अर्जुन पानुरी की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए एक आलेख में बताया है कि उन्हें अपने पिता की कविताएं कंठस्थ थीं.
वह कवि सम्मेलनों में सबसे पहले अपने पिता की कुछ लोकप्रिय कविताएं सुनाते थे, उसके बाद ही अपनी मौलिक रचनाओं का पाठ करते थे. अर्जुनजी ने करीब बीस पुस्तकें लिखीं, पर इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि धनाभाव में उसे प्रकाशित नहीं करवा सके.
अपने पुश्तैनी पेशा और छोटे-मोटे व्यवसाय से गुजारा किया, पर साहित्य के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ. ‘सरग दूत’ उनकी एकमात्र प्रकाशित खोरठा काव्य है. वह विभिन्न संस्थाओं द्वारा अलग-अलग समारोह-सम्मेलनों में सम्मानित हो चुके हैं. 2001 में खोरठा साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें ‘खोरठा रत्न’ से सम्मानित किया गया था. इनका निधन 13 जनवरी 2019 को पीएमसीएच, धनबाद में हुआ है.
वह कैंसर से पीड़ित थे. उनके निधन से खोरठा साहित्य जगत में एक और रिक्तता आ गयी है. इस रिक्तता की भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती. महेंद्रनाथ सुधाकर ने कहा है कि अर्जुन का निधन खोरठा जगत के लिए अपूरणीय क्षति है. दिनेश दिनमणि के शब्दों में, ‘खोरठा के महान साधक श्रीनिवास पानुरी के पुत्र अर्जुन पानुरी खुद भी एक अच्छे कवि और खोरठा के साधक थे. उनका जाना खोरठा जगत में महत्वपूर्ण क्षति है’
खैर, जीवन-मरण तो प्राणी जगत का शाश्वत सत्य है. अर्जुन को भी उसी सच्चाई से साक्षात्कार हुआ, लेकिन उनके जाने के बाद उनके शेष और अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाने और उस विरासत को संभालने की जिम्मेदारी को अगर उठाया जा सका, तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. खोरठा के इस ‘अर्जुन’ को नमन!
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