वर्षारंभ 2019 : आर्थिकी के अनसुलझे सवाल, चुनौतियां ज्यादा, संभावनाएं कम

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
संदीप बामजई
आर्थिक मामलों के जानकार
अगले कुछ महीनों में नयी सरकार का गठन होना है. इससे पहले मौजूदा सरकार अगले महीने की शुरुआत में अपना अंतरिम बजट पेश करेगी. ऐसे वक्त में खेती, रोजगार, निवेश, उद्योग, ढांचागत और सेवा आदि क्षेत्रों में जारी समस्याओं का कोई ठोस समाधान निकल पायेगा, यह संभव होता नहीं दिख रहा है. दो-तीन महीनों के बचे कार्यकाल में मौजूदा सरकार खेती-किसानी और रोजगार के मसलों को हल करने के लिए कुछ साहसिक फैसले करने की भले ही हिम्मत दिखाये, लेकिन मौजूदा हालात इसकी इजाजत देते नहीं दिखते. चुनावी साल में अर्थव्यवस्था में क्या कुछ बदलेगा और वैश्विक स्तर पर जारी व्यापार युद्ध जैसे हालात का हमारी अर्थव्यवस्था कैसे सामना करेगी, यह सबसे गौर करनेवाली बात होगी. नये साल में आर्थिक मोर्चे पर मजबूती की उम्मीदों और संभावनाओं पर विशेष प्रस्तुति...
चुनौतियां ज्यादा, संभावनाएं कम
साल 2019 एक चुनावी साल है. इसलिए सरकार अब आगामी बजट पूरा पेश नहीं कर सकती. उसे अंतरिम बजट पेश करना है. आम चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद आचार संहिता लागू हो जायेगी, जिसके बाद करने के लिए कुछ नहीं होगा. चुनाव बाद चाहे जिसकी भी सरकार बनेगी, वह नयी सरकार जुलाई में जाकर कहीं पूरा बजट पेश करेगी. ऐसे में मौजूदा सरकार के पास इस साल के शुरुआत में करने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए समझना आसान है कि देश में कुछ प्रमुख क्षेत्रों में आर्थिक चुनौतियां रहेंगी ही.
खेती, रोजगार, उद्योग, निवेश, इन्फ्रास्ट्रक्चर और सेवा, ये सभी बड़े क्षेत्र हैं और इन्हें मोटे बजट की जरूरत है. इन सबका हाल कहीं न कहीं पस्त है, इसलिए इन क्षेत्रों को संभालना बहुत जरूरी भी है. पिछली सरकारों के आखिरी बजट पर नजर डालते हैं, तो अंतरिम बजट एक तरह से बजट का खाका ही रहा है, बजट नहीं. इस अंतरिम बजट को 'वोट ऑन एकाउंट' कहते हैं, जो एक फरवरी को होगा. इसमें सरकार के पास ज्यादा कुछ करने के लिए होता नहीं है.
इसलिए अब सरकार के सामने खेती की सबसे बड़ी चुनौती है. आर्थिक विषयों के हिसाब से देखें, तो सरकार महज दो-तीन महीनों में बजट से बाहर किसान के लिए क्या कर सकती है, यही न कि वह शायद 'डीटीबी' (डायरेक्ट ट्रांसफर बेनेफिट) ले आये. या भावांतर की तरह कोई पाइलट योजना लाये, या फिर कोई अन्य पाइलट प्रोजेक्ट ले आये, जो जल्द से जल्द हो सके. अब इसके साथ समस्या यह है कि सरकार को अपना राजस्व घाटा भी देखना है कि कहीं किसी त्वरित योजना से नुकसान तो नहीं हो रहा है. क्योंकि, पिछले साल भी सरकार ने राजकोषीय घाटे (फिस्कल डेफिसिट) से बचने के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पायी, इसलिए उस पर इस बार लक्ष्य पूरा करने का दबाव रहेगा.
ऐसे में यह साफ है कि खेती के क्षेत्र में सरकार कुछ खास नहीं करेगी, जिसका अर्थ है कि खेती जस की तस बनी रहेगी. सरकार चाहे जो भी योजना लाये, सवाल यही है कि उसके लिए वह पैसा कहां से लायेगी? क्योंकि, एक तरफ सरकार का राजस्व घट रहा है, दूसरी तरफ अगर वह चाहे है कि खर्च बढ़ाये, तो यह बहुत ही मुश्किल है कि पैसे कहां से लायेगी. ले-दे के बचता है आरबीआई और उसके पास जमा पैसा. आरबीआई क्या करेगा, पता नहीं.
अब बात रोजगार की. रोजगार की हालत तो इतनी खराब है कि नौकरियां बढ़ने के बजाय घट रही हैं. जो सरकार इस संबंध में साढ़े चार साल में कुछ नहीं कर पायी, उससे ढाई-तीन महीने में क्या उम्मीद की जा सकती है? और अगर सरकार बदल गयी, तो फिर नयी सरकार के काम करने के अपने तरीके होंगे, वह कितना क्या करेगी, यह तो आनेवाला समय बतायेगा.
जहां तक उद्योग और निवेश की बात है, तो छोटे उद्योगों का जो हाल है, वह इतना जल्दी उबरता नहीं दिख रहा है. और अगले कुछ महीनाें में कितना और कहां से निवेश आयेगा, इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं और नयी सरकार का गठन होना है.
कुल मिलाकर देखें, तो भारत की अर्थव्यवस्था का जो हाल है, उसमें इस साल कोई खास सुधार की उम्मीद कम ही है, क्योंकि चुनावी साल होने की वजह से खर्चे ज्यादा हैं. योजनाएं बनाने और लागू करने में काफी वक्त लगता है और चुनाव होने, सरकार बनने और फिर सरकार को अपना कामकाज संभालने में ही यह साल गुजर जायेगा. इसलिए कोई बड़ी उम्मीद या सुधार तो संभव नहीं है.
सुधारों की दरकार
राज्य व केंद्र सरकार के कुल राजकोषीय घाटे को कम करने व निजी निवेश को प्रोत्साहन की जरूरत है. इस वर्ष हमें राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन द्वारा सुझाये गये लक्ष्य को 2023 तक प्राप्त करने की कोशिश करने की जरूरत होगी. लेकिन इसके लिए काल्पनिक अकाउंटिंग या ऑफ-बैलेंस शीट लेन-देन की बजाय बेहतर अनुपालन और ज्यादा प्रगतिशील तरीके से कराधान बढ़ाने और सही तरीके से खर्च करने का लक्ष्य रखना होगा.
कृषि, ऊर्जा और बैंकिंग क्षेत्र इन दिनों बदहाल हैं. किसानों को सहायता की आवश्यकता है. हालांकि उनकी सहायता के लिए जो कदम उठाये गये हैं, जैसे ऋण माफी, अव्यवहारिक न्यूनतम समर्थन मूल्य, इनपुट प्राइस सब्सिडी, उससे किसानों की समस्या हल होने की जगह बढ़ी है. किसानों को राहत देने के लिए एकमुश्त भुगतान एक बेहतर कदम होगा. ऊर्जा क्षेत्र में सुधार के लिए बेहतर पैमाइश, बिजली के उत्पादन व विकेंद्रीकण के लिये नयी प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करना होगा. इसके साथ ही बैंकिग क्षेत्र के संकट का स्थायी समाधान तलाशना होगा.
रोजगार सृजन के लिए बेहतर कारोबारी माहौल बनाने की जरूरत है. हमें भूमि अधिग्रहण, औद्योगिक नियमन, बिजली और रसद के प्रावधान और पर्यावरणीय मंजूरी जैसे क्षेत्रों में समन्वय के लिए केंद्र-राज्य उत्पादकता परिषद् उपयोगी साबित होगा.
सतत विकास के लिए अधिक प्रभावी योजनायें बनानी होंगी. जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए एक नये और तकनीकी रूप से सक्षम पर्यावरणीय नियामक बनाने पर जोर देना होगा.
सरकारी विभागों में, विशेषकर तकनीकी क्षेत्र में ज्यादा कुशल कर्मियों की जरूरत है. वहीं निचले स्तर पर 26 वर्ष से कम उम्र के युवाओं को सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रवेश स्तर के वेतन भुगतान पर इंटर्नशिप प्रदान करने की भी आवश्यकता है ताकि वे नाैकरी के योग्य बन सकें.बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार पर विशेष ध्यान देना होगा.
गैर-संचारी रोगों (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज) के बढ़ते प्रकोप से निपटने के लिए बेहतर प्रबंधन की जरूरत है. इस आेर ध्यान देना होगा.
वैश्विक निराशा की आशंका
आप भले इसे संयोग कहें, पर जिन सालों के आखिर में नौ का अंक होता है, वे भारी उथलपुथल के साल होते हैं. दस साल पहले 2009 में दुनियाभर के केंद्रीय बैंक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे बड़े संकट को 1929 की तरह महामंदी बनने से रोकने की जुगत में लगे थे. साल 2008-09 की तरह इस बार भी सबकी निगाहें अमेरिका पर हैं. दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ने 2018 में शानदार प्रदर्शन किया है, जिसकी बड़ी वजह करों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गयी कटौती थी.
पर, यह हालत जारी नहीं रह सकती है और गिरावट के रूझान अभी से ही दिख रहे हैं. ऐसा कमजोर वित्तीय नीति के कारण हो रहा है. अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व धीरे-धीरे ब्याज दरें बढ़ा रहा है जिसका एक कारण उसका यह अंदेशा है कि करों में कटौती अर्थव्यवस्था में बड़ा असंतुलन ला सकती है. यह संस्था बॉन्ड खरीद की नीति में भी बदलाव ला रही है.
इस कारण शेयर बाजार में भारी हलचल संभावित है. दुनिया में 1930 के दशक के बाद से पहली बार व्यापक व्यापार युद्ध जारी है. हालांकि कनाडा, मेक्सिको और जर्मनी के साथ भी ट्रंप प्रशासन की तनातनी रही, पर उसका मुख्य निशाना चीन है. चीन द्वारा अधिक अमेरिकी वस्तुएं खरीदने के वादे से फिलहाल तनाव में कमी आयी है, लेकिन अगर पहले कुछ महीनों में ट्रंप को लगा कि चीन ने वादा ठीक से नहीं निभाया है, तो यह व्यापार युद्ध गंभीर हो सकता है.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ऐसी स्थिति नहीं आने देने की पूरी कोशिश करेंगे क्योंकि पश्चिमी देशों से आर्थिक वृद्धि की दर बहुत अधिक होने के बावजूद चीन की अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में मद्धिम है. दुनिया की ये दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अकेले या एक साथ विश्व आर्थिकी के लिए बड़े संकट खड़ा कर सकती हैं. यदि हम इसमें तीसरी शक्ति- यूरोपीय संघ- को जोड़ लें, तो वहां पहले से काफी अफरातफरी का माहौल है. वहां आर्थिक के साथ राजनीतिक मोर्चे पर भी भारी संकट हैं.
विभिन्न देशों की आंतरिक अव्यवस्था तथा यूरोपीय संघ से संबंधों पर 2019 की स्थितियां निर्भर करेंगी. ईरान और सऊदी अरब के भीतर राजनीतिक हलचल तेल बाजार पर असर डाल सकती है. इन कारकों के अलावा तीन अन्य मुख्य तत्व भी हैं, जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए- रूस और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों का निरंतर खराब होते जाना, बड़े पैमाने पर साइबर हमला, जो वित्तीय संस्थानों को ठप कर दे तथा मौसमों में तेज बदलाव.
('द गार्डियन' के आर्थिक संपादक लैरी इलियट के लेख का संपादित/अनुदित अंश)
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