समृद्ध हुआ भारत का कला जगत

By Prabhat Khabar Digital Desk
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शोभना नारायन
मशहूर नृत्यांगना
साल 2018 भारत के कला जगत के लिए अच्छा रहा. सबसे अच्छी बात यह रही कि युवाओं ने विभिन्न कलाओं में अपनी सहभागिता बढ़ायी और बच्चे शास्त्रीयता की तरफ जाते दिखे.
हम और आप तो यही सोचते हैं कि हमारे बच्चों का आजकल आधुनिक कलाओं की तरफ ज्यादा ध्यान रहता है और शास्त्रीयता से दूर भागते हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में हमने देखा है कि आज के बच्चे शास्त्रीय नृत्य-संगीत सीख रहे हैं. यह देख कर बहुत अच्छा लगा और उम्मीद जगी कि यह पीढ़ी कुछ बहुत अच्छा करेगी. साल 2018 में छोटे-बड़े कई फेस्टिवल भी बहुत हुए, इनमें से कई फेस्टिवल तो सरकारों ने कराये.
सरकारों ने तो इन कलाओं को आगे बढ़ाने में सहयोग किया, लेकिन सबसे अच्छी बात यह रही कि छोटे-छोटे स्थानों पर व्यक्तिगत तौर पर लोगों ने अच्छे-अच्छे आयोजन किये. अपनी मेहनत से लोगों ने अच्छे-अच्छे कार्यक्रम भी खूब कराये, स्मृतियां भी बहुत हुईं, जिन्हें देख कर लगा कि हम अपने पुरखों को कभी भूलनेवालों में नहीं हैं.
इन्हीं स्मृतियों में राष्ट्रकवि दिनकर के नाम पर पूरे पांच दिन का फेस्टिवल हुआ, जिसमें एक से बढ़ कर एक नामी कलाकारों ने शामिल होकर उनकी गरिमा बढ़ायी है. मैं समझती हूं कि इसी तरह से ही तमाम कलाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है. यह सब देख कर ही हम यह कह सकते हैं कि गुजरते साल ने कलाओं को समृद्ध करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.
साल 2018 में क्या कुछ हुआ, क्या घटनाएं रहीं, उनका समाज पर कितना असर हुआ, इतना तो मैं नहीं जानती, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर कहूं, तो इतना जरूर है कि एक कलाकार के तौर पर हमने बहुत अच्छा साल बिताया.
हालांकि, बीच-बीच में सामाजिक ताने-बाने में कुछ गड़बड़ी होने की खबरें आयीं, लेकिन हम भारत के लोग इतनी जल्दी नहीं घबराते और नकारात्मकता को ज्यादा देर तक अपने पास नहीं रहने देते, इसलिए कह सकती हूं कि हम पुरानी बातें छोड़ते गये और लगातार आगे बढ़ते गये.
आगे बढ़ना ही हमारी फितरत है. जहां तक साल 2019 का सवाल है कि उससे हमें क्या उम्मीदें रहेंगी, तो मैं समझती हूं कि मानवीयता, संवेदनशीलता, संबद्धता, सकारात्मकता और जिम्मेदारी के साथ ही शास्त्रीय कलाओं को हम आगे भी बढ़ाते रहेंगे, ताकि आनेवाली पीढ़ियां यह न कह सकें कि हमने अपनी जड़ों को छोड़ दिया.
साल 2018 में एक और बड़ी बात हुई. हमारे देश के महान रचनाकार कालीदास की रचना 'शकुंतला' पर तकरीबन 200 साल पहले ऑस्ट्रिया के एक संगीतकार ने ओपेरा लिखा था. उसका मंचन इसी साल भारत में हुआ, जो कि भारतीय कला जगत के लिए एक बड़ी घटना है. ऑस्ट्रिया से ऑर्केस्ट्रा की एक टीम आयी और उसके सिंगर ने शंकुतला को गाया, जिस पर मैंने अपना नृत्य पेश किया.
दिल्ली, कोलकाता, मुंबई के अलावा कई शहरों में यह प्रोग्राम हुआ. यह बड़ी घटना रही साल 2018 की, जिसमें सैकड़ों साल पुरानी हमारी शास्त्रीयता को एक नया आयाम मिला. इसलिए मुझे 2019 से बहुत उम्मीदें हैं कि भारतीय कला जगत और भी आगे बढ़ेगा. सरकारें तो अपना काम करती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा जरूरत लोगों की उसके साथ सहभागिता की होती है.
लोग नहीं जुड़ेंगे, तो हमारी कलाएं विस्तार नहीं पा सकेंगी. इसलिए उम्मीद करती हूं कि गुजरता साल जो देकर जा रहा है, आगामी साल उसके साथ चलते हुए उसे और भी आगे तक लेकर जाये, ताकि भारत की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया में बेहतरीन मुकाम हासिल हो सके.
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