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विभाजन को खारिज करते ''मुस्लिम गीत''

Updated at : 21 Dec 2018 8:20 AM (IST)
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विभाजन को खारिज करते ''मुस्लिम गीत''

लोकगीत के संदर्भ में एक खास बात यह है कि वह मातृभाषाओं की जमीन पर ही संभव होता आया दिखता है. साथ ही, उसकी महक-मिठास सदा से मानव-चित्त को आकर्षित करती रही है. वह महक-मिठास एकरेखीय नहीं है. उसमें सुख और दुख दोनों कभी अलग-अलग तो कभी एक -दूसरे में सुने-सुनाये अभिव्यक्त होते हैं. आज […]

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लोकगीत के संदर्भ में एक खास बात यह है कि वह मातृभाषाओं की जमीन पर ही संभव होता आया दिखता है. साथ ही, उसकी महक-मिठास सदा से मानव-चित्त को आकर्षित करती रही है. वह महक-मिठास एकरेखीय नहीं है. उसमें सुख और दुख दोनों कभी अलग-अलग तो कभी एक -दूसरे में सुने-सुनाये अभिव्यक्त होते हैं.

आज की तारीख में लोकगीतों ने बौद्धिक एवं अकादमिक जगत को भी अपनी ओर आकृष्ट किया है. उसके विभिन्न पक्षों एवं पहलुओं के अध्ययन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जाने लगी है. बात जहां तक भोजपुरी लोकगीतों की है तो यह बेहिचक कहा जा सकता है कि इन गीतों के कई महत्वपूर्ण संग्रह प्रकाशित हैं. रामनरेश त्रिपाठी, हंसकुमार तिवारी, दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह, कृष्णदेव उपाध्याय के साथ-साथ कई ऐसे नाम हैं जिनके अथक प्रयत्न एवं लगन ने इन गीतों के संग्रहों को संभव किया है. फिर भी सैकड़ों-हजारों गीत आज भी लोकस्मृतियों में ही संचित हैं, बिखरे-बहके हैं.

उनके संकलन-संग्रह की तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो फिर हमारे हाथ अफसोस के सिवा कुछ नहीं लगने वाला. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भोजपुरी लोकगीतों के अब तक जितने प्रकाशित संग्रह हैं, वे महत्वपूर्ण होते हुए भी भोजपुरी क्षेत्र की सकल आबादी की लोकगीतात्मक अभिव्यक्तियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते. भोजपुरी क्षेत्र की जो सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना है वह भारत के अन्य भाषा-क्षेत्रों की तरह बहुजातियों, धर्मों, रिवाजों, मान्यताओं एवं विश्वासों की है.

ऐसे में इस क्षेत्र के मुसलमानों की व्यापक आबादी को अनदेखा नहीं किया जा सकता, परंतु अब तक के गीत-संग्रहों में इस बड़ी आबादी के गीतों को शायद ही कहीं जगह मिल पायी है जबकि इस क्षेत्र के मुसलमानों की भी मातृभाषा भोजपुरी ही है. संकलनकर्ताओं की व्यक्तिगत अभिरुचियां और संस्कारगत भिन्नताएं इसकी प्रमुख वजह रही हैं. बहरहाल, यह विमर्श का एक अलग मुद्दा है.

इस बीच 2014 में डॉ सबीह अफरोज अली के संपादन में युगांतर प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित संग्रह ‘मुस्लिम लोकगीत’ ने इस गैप को अपने तईं भरने का काम किया है.

इस संग्रह में कुल 209 गीत हैं. ये सारे गीत भोजपुरी क्षेत्र और भोजपुरी के हैं. संख्या के लिहाज से तो ये काफी नहीं हैं, पर इस समुदाय की परंपराओं, रूढ़ियों, विश्वासों, मान्यताओं, मनोदशाओं और उसके मुख्य सवालों को विभिन्न लोकशैलियों और लोकधुनों के हवाले समझने के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं. इन अधिकांश गीतों के संकलन का श्रेय संग्रह-संपादक सबीह अफरोज के मरहूम पिता डॉ इरशाद अली को जाता है.

उन्होंने ही पूरे श्रम, लगन और निष्ठा से अधिकांश गीतों का संकलन किया है. संग्रह के संपादक डॉ सबीह का भी आजमगढ़ मंडल के मुस्लिम लोकगीतों पर शोधकार्य है. शोधकार्य के दौरान मिले कुछ गीतों को भी उन्होंने इस संग्रह में शामिल कर लिया है. इस तरह यह संग्रह एक पिता और पुत्र के साझे श्रम, समझ और लगन का सुफल है. ‘सबके दावेदार’ पत्रिका के संपादक एवं आलोचक पंकज गौतम ने इस संग्रह की भूमिका लिखी है. भोजपुरी के ये गीत इस अर्थ में काफी महत्वपूर्ण हैं कि ये इस भाषा-भूगोल की सामाजार्थिक संरचनाओं और आमजन की क्रिया-प्रतिक्रियाओं को अनेक तरह से अभिव्यक्त करते हैं.

अनेक ऐसे गीत हैं जो हिंदू-मुस्लिम विभाजन को सिरे से खारिज करते हैं. अनेक गीत हैं जो दोनों समुदायों में समान रूप से स्वीकृत हैं, वे एक ही मिट्टी, एक ही हवा-पानी और एक जैसी परिस्थितियों और संघर्षों की निर्मिति हैं़ संग्रह का सबसे जानदार हिस्सा स्त्री-गीतों का है. इनमें सामाजिक-पारिवारिक रिश्तों की आत्मीयता की गूंज है.

हंसी-दिल्लगी ,मान-मनुहार एवं उलाहनों की अकुंठ अभिव्यक्ति है. साथ ही, स्त्री-जीवन की बहुस्तरीय विडंबनाएं भी. इस लिहाज से ‘बारहमासा’ विशिष्ट हैं. कजरी, सोहर, विवाह गीतों के साथ-साथ मुस्लिम पीर-पैगंबरों और इस समुदाय के नायकों से संबंधित गीत भी हैं. इन गीतों का अपना एक सूफियाना मिजाज भी है. मुस्लिम पर्व-त्योहारों की चहल-पहल के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का बोध भी है. इसमें कुरान की अंतर्ध्वनि के साथ राम और कृष्ण का सुमिरन भी है. यहां सगुण के साथ निर्गुण भी है.

जीवन के साथ मृत्यु भी. इन गीतों की मूल भावभूमि प्रेम है. मनुष्य से प्रेम, अल्लाह से प्रेम, प्रकृति से प्रेम. इन गीतों की भाषा भोजपुरी है ,एक खास काट की भोजपुरी. राही मासूम रजा के शब्दों में ‘भोजपुरी उर्दू’.आमजीवन में प्रचलित भोजपुरी के शब्दों के साथ उर्दू ,अरबी, फारसी के शब्द एक प्रवाह में आते हैं, एक -दूसरे में रच-बसकर. यह रचाव हमारे साझेपन की देन है. ये गीत हमारे साझा जीवन एवं साझी संस्कृति के पुख्ता प्रमाण हैं. एकदम जीवंत. इस दिशा में अभी बहुत काम बाकी है. बहुतेरे मुस्लिम गीत संग्रहित किये जाने की प्रतीक्षा में हैं. समीक्षा : बलभद्र

सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, श्री रामकृष्ण महिला महाविद्यालय, गिरिडीह

पुस्तक मुस्लिम लोकगीत

लेखक डॉ. सबीह अफरोज अली

प्रकाशन युगांतर प्रकाशन, दिल्ली

मूल्य 300 रुपये

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