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125वीं जयंती आज : परमहंस योगानंद की शिक्षाओं के मूल में क्रियायोग का विज्ञान

Updated at : 05 Jan 2018 7:36 AM (IST)
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125वीं जयंती आज : परमहंस योगानंद की शिक्षाओं के मूल में क्रियायोग का विज्ञान

ब्रह्मचारी निष्ठानंद पांच जनवरी 2018 को पश्चिम में योग के पिता परमहंस योगानंद की 125वीं जयंती है. वह आधुनिक आध्यात्मिक गौरवग्रंथ योगी कथामृत के लेखक भी हैं. उनके जीवन पर एक अत्यधिक वृत्तचित्र का भी निर्माण हुआ है. प्रमुख आध्यात्मिक विभूतियों में से एक के रूप में व्यापक रूप से जाने गये, श्री योगानंद ने […]

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ब्रह्मचारी निष्ठानंद
पांच जनवरी 2018 को पश्चिम में योग के पिता परमहंस योगानंद की 125वीं जयंती है. वह आधुनिक आध्यात्मिक गौरवग्रंथ योगी कथामृत के लेखक भी हैं. उनके जीवन पर एक अत्यधिक वृत्तचित्र का भी निर्माण हुआ है.
प्रमुख आध्यात्मिक विभूतियों में से एक के रूप में व्यापक रूप से जाने गये, श्री योगानंद ने संयुक्त राज्य अमेरिका और दुनिया के आध्यात्मिक परिदृश्य पर एक अमिट छाप छोड़ दी. अपने सार्वजनिक व्याख्यानों, लेखनों तथा स्थापित किये धर्मार्थ, आध्यात्मिक संस्थाओं योगदा सत्संग सोसाइटी अॉफ इंडिया/सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप (वाइएसएस/एसआरएफ) के दुनिया भर में 800 मंदिर, ध्यान केंद्र और रिट्रीट हैं. उन्होंने भारत के वैदिक दर्शन की व्यापक जागरूकता और प्रशंसा में योगदान दिया.
उनकी शिक्षाओं के मूल में क्रियायोग का पवित्र विज्ञान है, जो राजयोग का एक रूप है. शरीर एवं मन दोनों को शांत करने का कार्य करता है. व्यक्ति के लिए विचारों, भावनाओं तथा संवेदनाओं के आम तौर पर रहनेवाले हलचल से उसकी ऊर्जा एवं एकाग्रता का प्रत्याहार करना संभव बनाता है. उस आंतरिक शांति की स्पष्टता में व्यक्ति अपने सच्चे स्वरूप के साथ अपनी गहराती भीतरी शांति तथा एकात्मता का अनुभव करता है.
श्री योगानंद द्वारा लिखित बहु लोकप्रिय आध्यात्मिक गौरवग्रंथ, योगी कथामृत ने लाखों पाठकों का ध्यान, योग के दर्शन तथा अभ्यास से परिचित करवाया है. इसका लगभग 50 भाषाओं में अनुवाद हुआ है. योग एवं पूर्वी आध्यात्मिक विचार पर यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सबसे पठनीय ग्रंथ बना हुआ है. श्रीमद्भागवत (ईश्वर-अर्जुन संवाद), चारों सुसमाचारों एवं उमर खय्याम की रूबाइयां अौर उनकी अत्यधिक प्रशंसित टीकायें पूर्व और पश्चिम के धार्मिक विश्वासों की अंतनिर्हित एकता पर अभूतपूर्व अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं.
परमहंस योगानंद पहली बार 1920 में बॉस्टन में आयोजित धार्मिक उदारवादियों के एक अंतरराष्ट्रीय सभा में एक प्रतिनिधि के रूप में भारत से अमेरिका पहुंचे. उसी साल उन्होंने भारत के प्राचीन दर्शन और ध्यान के विज्ञान पर अपनी शिक्षाओं को प्रसारित करने के लिए सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप (एसआरएफ) की स्थापना की.
1925 में श्री योगानंद ने लॉस एंजेलिस में निवास किया, जहां उन्होंने अपने संगठन के लिए एक अंतरर्राष्ट्रीय मुख्यालय स्थापित किया. विज्ञान, व्यवसाय और कला क्षेत्र की कई प्रमुख हस्तियां उनके शिष्य बन गये. परमहंस योगानंद का जन्म पांच जनवरी, 1893 को भारत के गोरखपुर में, एक समृद्ध और धर्मपरायण बंगाली परिवार में हुआ था. उनका नाम मुकुंद लाल घोष था.
शुरुआती वर्षों से ही उनके आसपास के लोगों को यह पता चल गया था कि आध्यात्मिकता का उनका बोध एवं अनुभव सामान्य से परे थे. एक युवा के रूप में उन्होंने भारत के कई संतों और दार्शनिकों के दर्शन किये. इस आशा में कि उनकी आध्यात्मिक खोज में मार्गदर्शन करने के लिए उन्हें एक प्रबुद्ध गुरु प्राप्त होगा. 1910 में 17 वर्ष की आयु में उनकी भेंट सम्मानित भारतीय ऋषि स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी से हुई, जिनके आश्रमों में उन्होंने अपने जीवन के अगले दस वर्षों का अधिकांश हिस्सा बिताया. 1915 में कलकत्ता विवि से स्नातक होने के बाद वह भारत के सम्मानित संन्यासी संप्रदाय के एक स्वामी बन गये. उस समय उन्होंने योगानंद नाम प्राप्त किया (जो योग या दिव्य मिलन के माध्यम से आनंद प्राप्त करने का अर्थ देता है).
योगानंद ने 1917 में एक आदर्श-जीवन विद्यालय की स्थापना के साथ अपने कार्य की शुरुआत की, जिसमें आधुनिक शैक्षणिक तरीकों के साथ योग प्रशिक्षण और आध्यात्मिक आदर्श में निर्देश को जोड़ा गया था.
1925 में इस विद्यालय का अवलोकन करने के बाद महात्मा गांधी ने लिखा था कि इस संस्था ने मेरे मन को बहुत प्रभावित किया है. महात्मा गांधी और परमहंस योगानंद एक दशक बाद मिले, जब 1935-36 में योगानंद लौट कर भारत आये. 1930 के दशक के दौरान श्री योगानंद ने व्यापक सार्वजनिक व्याख्यानों से कुछ हद तक स्वयं को दूर करना शुरू किया, ताकि लेखन के लिए समय मिले. सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप मंदिरों तथा ध्यान केंद्रों की स्थापना हो सके.
अपने अध्यक्ष स्वामी चिदानंद के मार्गदर्शन में, योगदा सत्संग सोसाइटी परमहंस योगानंद तथा उनके निकट शिष्यों के लेखनों, व्याख्यानों तथा अनौपचारिक वार्ता को प्रकाशित करती है. श्री योगानंद की शिक्षाओं पर ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग निकलती है. परमहंस योगानंद का निधन लॉस एंजेलिस में सात मार्च 1952 को अमेरिका में भारत के राजदूत डॉ बिनय आर सेन के सम्मान में आयोजित एक भोज में उनके भाषण की समाप्ति पर हुआ.
1977 में परमहंस योगानंद के देहत्याग की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत सरकार ने औपचारिक रूप से उनके सम्मान में एक स्मारक टिकट जारी कर मानवता के आध्यात्मिक उत्थान के लिए उनके उत्कृष्ट योगदान को मान्यता दी. 2017 के मार्च महीने में भारत सरकार द्वारा एक दूसरा स्मारक टिकट जारी किया गया, जो कि योगदा सत्संग सोसाइटी के शताब्दी वर्ष पर इसकी उत्कृष्ट उपलब्धियों का उल्लेख करता है.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात मार्च 2017 को नयी दिल्ली में विज्ञान भवन में आधिकारिक डाक टिकट विमोचन समारोह के दौरान कहा था कि परमहंस योगानंद के जीवन को देखते हुए यह स्पष्ट है कि वह केवल बाहरी स्वतंत्रता के तरीकों पर ही जोर नहीं देते हैं, बल्कि आंतरिक यात्रा पर भी जोर देते हैं. कठोर सिद्धांतों को हटा कर उन्होंने आध्यात्मिकता को इतना सुलभ तथा वास्तविक बना दिया कि उनके द्वारा शुरू किये जाने के इन सौ वर्षों में उनका कार्य एक विश्वव्यापी आंदोलन आध्यात्मिक समझ का एक चिरस्थायी संसाधन बन गया है.
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