आज भिखारी ठाकुर की जयंती : भिखारी का भरम, करम और मरम
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :18 Dec 2017 6:36 AM (IST)
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आज भिखारी ठाकुर की जयंती है. इधर भिखारी ठाकुर को लेकर उफानी-तूफानी गति से बात हो रही है. सब अपने-अपने तरीके से व्याख्या करने में लगे हैं. भिखारी को लेकर भरम का भंवरजाल भी इधर बढ़ाया जा रहा है. कुछ सिर्फ जातीय खांचे में भिखारी को कैद कर अपने नाम को भिखारी के खोजकर्ता के […]
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आज भिखारी ठाकुर की जयंती है. इधर भिखारी ठाकुर को लेकर उफानी-तूफानी गति से बात हो रही है. सब अपने-अपने तरीके से व्याख्या करने में लगे हैं. भिखारी को लेकर भरम का भंवरजाल भी इधर बढ़ाया जा रहा है.
कुछ सिर्फ जातीय खांचे में भिखारी को कैद कर अपने नाम को भिखारी के खोजकर्ता के रूप में स्थापित करने में लगे हुए हैं तो कुछ भिखारी को नास्तिक के रूप में स्थापित करने में लगे हुए हैं. कुछ ऐसे भी हैं, जो इस भरम के साथ स्वयंभू रूप में उभर रहे हैं, जैसे वे ही भिखारी पर बात करना शुरू किये हैं तो भिखारी को कोई जान पा रहा है. इन्हें यह भी नहीं मालूम कि भिखारी अपने समय में नायक बन चुके थे. उस वक्त महेश्वराचार्य जैसे हिंदी साहित्य सेवी सब छोड़ भिखारी को फॉलो करने लगे थे. महेश्वराचार्य 1935 से ही भिखारी पर लिखते रहे. उपन्यास से पहले उनके निबंधो का समीक्षात्मक संग्रह ‘जनकवि भिखारी ठाकुर’ के रूप में आया.
बाद में महेश्वराचार्य ने भिखारी की चुनिंदा रचनाओं का समीक्षात्मक संग्रह ‘भिखारी’ किताब के रूप में सामने आया. महेश्वराचार्य तब की मशहूर हिंदी पत्रिका सरस्वती के सहायक संपादक थे.
भिखारी के समय में ही जगदीश चंद्र माथुर जैसे चर्चित आईसीएस अधिकारी ने उन्हें क्लोजली फॉलो किया और भिखारी की मृत्यु के बाद सबसे चर्चित आलेख साप्ताहिक हिंदुस्तान में उन्होंने लिखा. भिखारी के समय में ही रांची के संत जेवियर कॉलेज के हिंदी के प्राध्यापक रामसुहाग सिंह ने उन्हें क्लोजली फॉलो किया और जीते जी इकलौता इंटरव्यू किया, रांची से कलकत्ता जाकर. बाद के दिनों में बीरेंद्र यादव, जो अभी बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं, की उद्यमिता से, लगन से और प्रो नागेंद्र सिंह के अथक परिश्रम से भिखारी ठाकुर रचनावली का प्रकाशन हुआ.
भिखारी को लेकर जो भरम के साथ जी रहे हैं और तरह-तरह के भ्रमजाल फैला रहे हैं, उन्हें आज भिखारी की जयंती पर फिर से रामसुहाग सिंह का इंटरव्यू पढ़ना चाहिए. इंटरव्यू पुराना है, लेकिन भिखारी को समझने के लिए एक अहम प्रामाणिक स्रोत है. अभी के समय में यह और प्रासंगिक है. इस इंटरव्यू में भिखारी खुद कई सवालों का जवाब देते हैं, जिसका जवाब आज लोग खुद से तैयार कर रहे हैं.
प्रो सिंह: भिखारी ठाकुर जी, आपकी जन्म तिथि क्या है?
भिखारी ठाकुर : सिंह साहब, 1295 साल पौष मास शुक्लपक्ष,पंचमी, सोमवार, 12 बजे दिन.
प्रो सिंह : आपका जन्म स्थान कहां है?
भिखारी ठाकुर : कुतुबपुर दियर, कोढ़वापटी, रामपुर, सारण.
प्रो सिंह : आपकी शिक्षा किस श्रेणी तक हुई?
भिखारी ठाकुर : स्कूल में केवल ककहरा तक, मैंने एक वर्ष तक पढ़ा. लेकिन, कुछ नहीं आया. भगवान नामक लड़के ने मुझे पढ़ाया.
प्रो सिंह : आपके पिताजी की आर्थिक स्थिति कैसी थी?
भिखारी ठाकुर-जमीन तथा अन्य संपत्ति बहुत ही कम थी, गरीब थे.
प्रो सिंह : आपके जमींदार कौन थे?
भिखारी ठाकुर : मेरे जमींदार आरा के शिवसाह कलवार थे.
प्रो सिंह : आपके साथ उनका व्यवहार कैसा था?
भिखारी ठाकुर : उनका व्यवहार अच्छा था.
प्रो सिंह : क्या लड़कपन से ही नाच-गान में आपकी अभिरुचि है?
भिखारी ठाकुर : मैं तीस वर्षों तक हजामत करता रहा.
प्रो सिंह : कैसे नाच-गान और कविता की ओर आपकी अभिरुचि हुई?
भिखारी ठाकुर : मैं कुछ गाना जानता था. नेकनाम टोला के एक हजाम रामसेवक ठाकुर ने मेरा गाना सुनकर कहा कि ठीक है. उन्होंने यह बताया कि मात्रा की गणना इस प्रकार होती है. बाबू हरिनंदन सिंह ने मुझे सर्वप्रथम रामगीत का पाठ पढ़ाया. वे अपने गांव के थे.
प्रो सिंह : आपके गुरुजी का नाम क्या था?
भिखारी ठाकुर : स्कूल के गुरुजी का नाम याद नहीं है.
प्रो सिंह : क्या अपने पेशे के समय भी आप नाच-गान का काम करते थे?
भिखारी ठाकुर : तीस वर्ष के बाद से नाच-गान का काम कभी नहीं रुका.
प्रो सिंह : सबसे पहले आपने कौन कविता बनायी?
भिखारी ठाकुर : बिरहा-बहार पुस्तक.
प्रो सिंह : सबसे पहले आपने कौन नाटक बनाया?
भिखारी ठाकुर : बिरहा-बहार ही नाटक के रूप में खेला गया.
प्रो सिंह : सबसे पहले बिरहा-बहार नाटक कहां खेला गया?
भिखारी ठाकुर : सबसे पहले बिरहा-बहार नाटक सर्वसमस्तपुर ग्राम में लगन के समय खेला गया.
प्रो सिंह : क्या आपके पहले भी इस तरह का नाटक होता था?
भिखारी ठाकुर : मैंने विदेशिया नाम सुना था,परदेशी की बात आदि के आधार पर मैंने बिरहा-बहार बनाया.
प्रो सिंह : इस तरह के नाम की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
भिखारी ठाकुर : कोई पुस्तक मिली थी, नाम याद नहीं है.
प्रो सिंह : क्या आप छंद-शास्त्र के नियमों के अनुसार कविता बनाते हैं?
भिखारी ठाकुर : मैं मात्रा आदि जानता हूं, रामायण के ढंग पर कविता बनाता हूं.
प्रो सिंह : आपकी लिखी हुई कौन-कौन पुस्तकेें हैं?
भिखारी ठाकुर : बिरहा-बहार, विदेशिया, कलियुग बहार, हरिकीर्तन,बहरा-बहार, गंगा-स्नान, भाई-विरोधी, बेटी वियोग, नाई बहार, श्रीनाम रत्न, रामनाम माला आदि.
प्रो सिंह : सबसे हाल की रचना कौन है?
भिखारी ठाकुर : नर नव अवतार.
प्रो सिंह : आपकी अधिकांश पुस्तकेें कहां-कहां से प्रकाशित हैं?
भिखारी ठाकुर : पुस्तकों से मालूम होगा.
प्रो सिंह : आपके विचार में सबसे अच्छी रचना कौन है?
भिखारी ठाकुर : भिखारी हरिकीर्तन और भिखारी शंका समाधान.
प्रो सिंह : आप जब कोई पुस्तक लिखते हैं तो क्या दूसरों से भी दिखाते हैं?
भिखारी ठाकुर : मानकी साह गांव के ही हैं. वे अभी जीवित हैं. वे सिर्फ साफ-साफ लिख देते हैं. उन्हें शुद्ध-अशुद्ध का ज्ञान नहीं है. रामायण का सत्संग बाबू रामानंद सिंह के द्वारा हुआ. श्लोक का ज्ञान दयालचक के साधु गोसाईं बाबा से हुआ.
प्रो सिंह : रायबहादुर की उपाधि आपको कब मिली?
भिखारी ठाकुर :रायबहादुर आदि की जो मुझे उपाधियां मिलीं उन्हें मैं नहीं जानता हूं. कब-क्या उपाधियां मिलीं, मुझे कुछ मालूम नहीं है.
प्रो सिंह : क्या आप विश्रामपूर्ण जीवन बिताना चाहते हैं?
भिखारी ठाकुर : मैं इस काम से अलग रहकर जीवित नहीं रह सकता.
प्रो सिंह : आप तो जनता के कवि हैं, इसलिए स्वतंत्रता के पहले और बाद में क्या अंतर पाते हैं?
भिखारी ठाकुर : मैं कुछ कहना नहीं चाहता.
प्रो सिंह : वर्तमान शासन से क्या आप खुश हैं?
भिखारी ठाकुर : उत्तर देना संभव नहीं.
प्रो सिंह : क्या आप पूजा-पाठ, संध्या वंदना भी करते हैं? किन देवताओंकी पूजा करते हैं?
भिखारी ठाकुर : सिर्फ राम-नाम जपता हूं.
प्रो सिंह : आप जो नाटक दिखाते हैं, उसका लक्ष्य धनोपार्जन केअतिरिक्त और क्या समझते हैं?
भिखारी ठाकुर : उपदेश और धनोपार्जन.
प्रो सिंह : स्वास्थ्य कैसा रहता है?
भिखारी ठाकुर- अब तक सिर्फ तीन दांत टूटे हैं.
प्रो सिंह : आप क्या राजनीति में भाग लेना चाहते हैं?
भिखारी ठाकुर- मौन.
प्रो सिंह : पुन: आपका जन्म इसी देश में हुआ तो क्या आप यही कार्य करना चाहते हैं?
भिखारी ठाकुर : कोई निश्चित नहीं.
प्रो सिंह : इस समय आपके अनन्य मित्र कौन-कौन हैं?
भिखारी ठाकुर : अब कोई नहीं है. पहले बाबू रामानंद सिंह थे.
प्रो सिंह : क्या आपकी कोई स्थायी नाट्यशाला है?
भिखारी ठाकुर : कोई स्थायी जगह नहीं है.
प्रो सिंह : अच्छे नाटक या कविता के आप क्या लक्षण समझते हैं?
भिखारी ठाकुर : जनता की भीड़ से.
प्रो सिंह : क्या आपको मालूम है कि इस समय आपका उच्च कोटि के कलाकारों में स्थान है?
भिखारी ठाकुर : जो प्राप्त हुआ है वही मेरे लिए पर्याप्त है.
(भिखारी ठाकुर के 77वें जन्मदिन पर एक जनवरी, 1965 को कोलकाता में यह बातचीत हुई थी, जो भिखारी जन्मशताब्दी वर्ष पर 1987 में प्रकाशित हुआ था. उसी बातचीत का यह संक्षिप्त अंश है.)
– प्रस्तुति : निराला बिदेसिया
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