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लाल हुआ नेपाल, कम्युनिस्ट दलों की हुई जीत...जानिए कैसे भारत से भिन्न है नेपाल की वामपंथी राजनीति

Updated at : 14 Dec 2017 5:31 AM (IST)
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लाल हुआ नेपाल, कम्युनिस्ट दलों की हुई जीत...जानिए कैसे भारत से भिन्न है नेपाल की वामपंथी राजनीति

वर्षों चले मतभेदों और संघर्षों के बाद नेपाल की आंतरिक सत्ता में संरचनात्मक बदलाव संभव हुआ. इसके बाद संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की नयी व्यवस्था में तमाम विचारधाराओं ने जड़ें जमानी शुरू कर दी. संविधान निर्माण और मुख्यधारा की राजनीति पर तमाम क्षेत्रीय वर्गों के संघर्ष से जूझते नेपाल में हाल ही में संपन्न चुनावों के […]

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वर्षों चले मतभेदों और संघर्षों के बाद नेपाल की आंतरिक सत्ता में संरचनात्मक बदलाव संभव हुआ. इसके बाद संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की नयी व्यवस्था में तमाम विचारधाराओं ने जड़ें जमानी शुरू कर दी. संविधान निर्माण और मुख्यधारा की राजनीति पर तमाम क्षेत्रीय वर्गों के संघर्ष से जूझते नेपाल में हाल ही में संपन्न चुनावों के परिणामों से कई संकेत उभरे हैं.
दरअसल, चीन समर्थक कम्युनिस्ट दलों की जीत भारत और चीन ही नहीं, बल्कि समूचे दक्षिण एशिया के लिए दीर्घकालिक प्रभाव की आहट दर्शा रही है. नेपाल में उभरी वाम राजनीति और नये सत्ता प्रतिष्ठान के साथ भारत के संबंधों के आकलन के साथ प्रस्तुत है आज का इन-डेप्थ…
पुष्परंजन
ईयू–एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक
चुनाव परिणाम प्राप्त होते ही चीन से सबसे पहली प्रतिक्रिया यह थी, ‘केपी शर्मा ओली नेपाल के प्रधानमंत्री बनेंगे. उनके पदभार के बाद नेपाल में चीनी निवेश की गति तेज होगी.’ शंघाई में ‘इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस’ में रिसर्च फेलो प्रोफेसर हू छियोंग यह प्रतिक्रिया दे रहे थे. चीन की जो कुछ आधिकारिक लाइन होती है, उसे किसी विशेषज्ञ के माध्यम से वह कहलवा देता है. प्रोफेसर हू छियोंग का यह बयान ‘ग्लोबल टाइम्स’ में प्रकाशित हुआ है.
प्रोफेसर हू का मानना है कि ‘चीन के वन बेल्ट वन रोड’ महाभियान को दक्षिण एशिया में रोकने की खातिर भारत जिस तरह से प्रयासरत था, इस चुनाव परिणाम ने उस पर पानी फेर दिया है.’ चीन, क्यूबा, लाओस, उत्तर कोरिया, वियतनाम के बाद लगता था कि दुनिया में वामपंथी सरकार का बनना बंद हो जायेगा, लेकिन नेपाल ने इस धारणा को ध्वस्त कर दिया है.
पेइचिंग ने लिखी पटकथा!
इस बार के आम चुनाव में जो कुछ नेपाल में हुआ, ऐसा प्रतीत होता है, जैसे उसकी पूरी पटकथा पेइचिंग में लिखी गयी हो. मगर, वोट नेपाल की जनता ने किया है, मतादेश से यही संदेश गया है कि नेपाल में वामपंथियों की स्थिर सरकार का विकल्प लोगों ने चुना, और नेपाली कांग्रेस से मोहभंग हुआ है.
युवा मतदाताओं ने नेपाली कांग्रेस को नकारा है, तराई की पट्टी में छह मधेस पार्टियों का गठबंधन राष्ट्रीय जनता पार्टी-नेपाल (राजपा) को फतह मिली है, तो इसका मतलब यह भी है कि वामपंथ के विकल्प को मधेस के मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया है. जो लोग तराई-पहाड़ को बांटकर राजनीतिक लक्ष्य को बुनते हैं, कम-से-कम ऐसे राजनेता खुश हो सकते हैं.
निष्क्रिय रही भारतीय मशीनरी!
नेपाल का चुनाव ऐसे वक्त हुआ है, जब भारत सरकार की पूरी मशीनरी, और लगभग पूरा मंत्रालय गुजरात में कैंप कर रहा था. किसी को फुर्सत नहीं थी कि पड़ोस में हो रहे इतने बड़े बदलाव के बारे में कोई रणनीतिक मदद, चीन विरोधी ताकतों को नेपाल में मुहैया कराये. भारत सरकार की ओर से 50 गाड़ियां और मोटरसाइकिल भेज कर नेपाली चुनाव में मदद की औपचारिकताएं पूरी कर ली गई थीं.
मई, 1991 का चुनाव मुझे याद है. नेपाली कांग्रेस के कृष्ण प्रसाद भट्टराई चुनाव लड़ रहे थे, और उनके विरुद्ध चीन समर्थक मदन भंडारी (जो वर्तमान राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के पति थे) नेकपा-एमाले से चुनाव लड़ रहे थे.
चंद्रशेखर उस समय भारत के प्रधानमंत्री थे. उस दौर में 500 गाड़ियां नेपाल को गिफ्ट की गई थीं, और दूतावास समेत भारत सरकार की पूरी मशीनरी नेपाली कांग्रेस को विजय दिलाने के वास्ते मदद कर रही थी. नतीजन, कृष्ण प्रसाद भट्टराई नेपाली कांग्रेस की सरकार बनाने में कामयाब हुए थे.
देउबा ने रद्द की चीनी परियोजना
प्रधानमंत्री बनने के बाद शेर बहादुर देउबा 23 अगस्त, 2017 को दिल्ली आये थे. इस उम्मीद से कि दिल्ली का सत्ता प्रतिष्ठान आगामी चुनाव में मदद करेगा. पीएम की कुर्सी संभालने से पहले स्थानीय चुनाव के नतीजे देखकर देउबा को गलतफहमी हो गयी थी कि संसदीय और प्रांतीय चुनाव उनकी पार्टी जीतेगी. 18 सितंबर, 2017 को थर्ड फेज के नतीजे जब आये, नेकपा-एमाले पहले नंबर पर, दूसरे स्थान पर नेपाली कांग्रेस और तीसरे स्थान पर प्रचंड की पार्टी ‘नेकपा माओवादी केंद्र’ थी.
देउबा ने वह सब किया, जिसका साहस आमतौर पर नेपाली कांग्रेस के प्रधानमंत्री नहीं करते. ऐसा पहली बार हुआ कि चीन की अढ़ाई अरब डॉलर की परियोजना को देउबा सरकार ने रद्द किया. स्वाभाविक था, ऐसे फैसले से चीन अपमानित महसूस करता. चीन की समझ में यह बात आ चुकी थी कि नयी दिल्ली के इशारे पर यह सब कुछ हुआ है.
ओली का चीन कनेक्शन!
65 साल के केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री रहते 20 मार्च, 2016 को चीन गये थे. उससे एक माह पहले ओली 19 फरवरी, 2016 को दिल्ली आये थे, मगर तब भी नेतृत्व के स्तर पर जो गांठ पड़ी हुई थी, कूटनीतिक मुस्कुराहटों के बीच लोग उसे पढ़ नहीं पाये. ओली के साथ पचास सदस्यीय दल चीन गया, और जिस तरह से पेट्रोलियम, गैस सप्लाई, कई सीमाओं को खोलने, रेल लिंक पर तेजी से काम करने, और पारगमन संबंधी समझौते किये. ओली की चीन के प्रति निष्ठा जगजाहिर हो चुकी थी.
5 मई, 2016 को छह उप-प्रधानमंत्रियों वाली ओली सरकार का तख्ता पलट तय हो चुका था. नये समीकरण की परिकल्पना उस समय 597 सदस्यीय संसद में सबसे ताकतवर 207 सदस्यों वाली नेपाली कांग्रेस के सभापति शेर बहादुर देउबा, और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक मधेसी फ्रंट के बूते प्रचंड ने कर ली थी. लेकिन यह सबकुछ चीनी दबाव के कारण टल गया था.
बाद के हफ्तों में ओली बार-बार चीनी दूतावास के जरिये दबाव बनवाते रहे कि राष्ट्रपति शी चिनफिंग के नेपाल दौरे तक शक्ति परीक्षण टाला जाए. मगर, नौ माह पुरानी ओली की नवजात सरकार चल नहीं पायी. ओली सरकार से मधेसी जनाधिकार फोरम और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल ने समर्थन वापसी की घोषणा कर दी.
24 जुलाई, 2016 को खड्ग प्रसाद शर्मा ‘ओली’ ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. तब ओली ने गोली दागते हुए कहा था, ‘मेरी सरकार को गिराने के लिए भारत ने माओवादियों, और तराई की पार्टियों का इस्तेमाल किया. इसे हम भूलेंगे नहीं.’
‘नेकपा-एमाले’ का गठन 1991 में हुआ था. उस समय यूनाइटेड लेफ्ट फ्रंट, नेकपा (मार्क्सवादी) और नेकपा (लेनिनवादी) का विलय कराया गया था. 1991 के आम चुनाव में नेकपा एमाले दूसरे नंबर की पार्टी बन गयी. 1994 में पहली बार नेकपा-एमाले की सरकार बनी. 1998 में नेकपा-एमाले में टूट हो गयी, जिसका खमियाजा 1999 के चुनाव में उसे भुगतना पड़ा.
दुरभिसंधि की तरह है नेपाल का वाम गठबंधन!
इस दौर में नेपाल का वाम गठबंधन एक तरह की दुरभिसंधि ही है. इससे जुड़े नेताओं का इतिहास देखिये, तो उनकी महत्वाकांक्षा देर-सवेर टकराती दिखती है. माओवादी खेमे का ही दो बार टूटना लोगों ने देखा है.
1994 में स्थापित इस पार्टी से 2012 में मोहन वैद्य किरण, राम बहादुर थापा ‘बादल’, चंद्र प्रकाश गजुरेल, देव गुरूंग जैसे 44 केंद्रीय कमेटी के सदस्य अलग हो गये. पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर बाबूराम भट्टराई कभी नेकपा-माओवादी में वाइस चेयरमैन हुआ करते थे. 25 सितंबर, 2015 को दूसरी बार संविधान सभा (संसद) के गठन के बाद बाबूराम भट्टराई ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. 21 जनवरी, 2016 को बाबूराम भट्टराई ने ‘नयां शक्ति पार्टी नेपाल’ के गठन की घोषणा की.
भारत से भिन्न है नेपाल की वामपंथी राजनीति
सारी टूटन के बावजूद, नेपाल की वामपंथी राजनीति केरल और त्रिपुरा से भिन्न है. यह बात बीजेपी के विदेश मामले को नियंत्रित करने वाले नेताओं को समझने की आवश्यकता है.
वाम एकता का चीनी प्रयोग फिलहाल नेपाल में सफल हुआ है. उसके विस्तार से भारत कैसे अछूता रह सकता है? इस सवाल पर नयी दिल्ली को सोचना होगा. कुछ समय तक भारत में लाल गलियारे की चर्चा को विराम लगा हुआ था, नेपाल में वाम एकता की सरकार बनने के बाद तरह-तरह की कहानियां आरंभ हो जायेंगी!
किस दल के कितने सांसद
पिछले संसद ‘प्रतिनिधि सभा’ में 593 सदस्य थे. इनमें नेपाली कांग्रेस के 225, नेकपा-एमाले के 181, नेकपा (माओवादी केंद्र) के 85, राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल के 24, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के 19, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी डेमोक्रेटिक के 18, फेडरल सोशलिस्ट फोरम नेपाल के 15, नेकपा-माले के पांच, नेपाल वर्कर्स पीजेंट्स पार्टी के चार, राष्ट्रीय जनमोर्चा के तीन, नेपाल परिवार दल के दो, अन्य पार्टियों के 10, और निर्दलीय दो सांसद सदन में थे.
कैसे चुने जाते हैं नेपाल में सांसद
नेपाल में हर चार साल पर संसदीय चुनाव का प्रावधान है. 601 सदस्यीय संसद के लिए 335 सदस्य समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर चुने जाते हैं, बाकी 26 सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री को करना है. 275 सदस्यीय निचला सदन ‘प्रतिनिधि सभा’ में दो-तिहाई बहुमत के लिए 184 सीट आवश्यक है. इसमें 165 सांसदों का चुनाव ‘फर्स्ट पास्ट पोस्ट प्रणाली’ (एफडीटीपी) के जरिये और बाकी 110 सांसदों को ‘पार्टी लिस्ट प्रपोर्शनल रिप्रजेंटेशन’ के माध्यम से चुनने का प्रावधान है.
‘एफडीटीपी’ के 165 में नेकपा-एमाले को 80, नेकपा-माओवादी केंद्र को 36, नेपाली कांग्रेस को 22, राष्ट्रीय जनता पार्टी-नेपाल (आरजेपी) को 11, संघीय समाजवादी फोरम को 10, नया शक्ति नेपाल, राष्ट्रीय जनमोर्चा, नेपाल मजदूर किसान पार्टी और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को एक-एक सीटें मिली हैं. एक निर्दलीय जीता है. एक सीट का परिणाम अटका पड़ा है. समानुपातिक प्रतिनिधित्व में भी नेकपा-एमाले लीड ले चुकी है.
साथ हुए विधानसभाओं के चुनाव
सात राज्यों के गठन के बाद, नेपाल में पहली बार विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ हुए. सात प्रांतों में नेपाली कांग्रेस का तीसरे नंबर पर रहना, और छह प्रांतों में नेकपा-एमाले का लीड ले लेना बड़ी बात है.
केवल प्रांत संख्या दो में राष्ट्रीय जनता पार्टी-नेपाल (राजपा) को फतह मिली है. ‘राजपा’ मधेस की छह पार्टियों का गठबंधन है, जिसका नेतृत्व राजेंद्र महतो करते हैं. प्रांत संख्या-दो के अंतर्गत धनुषा, पर्सा, बारा, महोत्तरी, रौतहट, सप्तरी, सर्लाही, सिरहा, कपिलवस्तु, नवलपरासी-पश्चित, रूपनदेही, कैलाली जिलों को शामिल किया गया है, जो तराई के इलाके हैं.
वामपंथियों के सत्ता में आने और खासकर ओली के प्रधानमंत्री बनने पर भारत और नेपाल के कूटनीतिक संबंधों को संभालना ज्यादा कठिन व जटिल हो जायेगा. भारत चाहेगा कि मधेशी और दूसरों को नेपाल की राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व मिले.
– कंवल सिबल, पूर्व विदेश सचिव, भारत सरकार
भारत से भिन्न है नेपाल की वामपंथी राजनीति
सारी टूटन के बावजूद, नेपाल की वामपंथी राजनीति केरल और त्रिपुरा से भिन्न है. यह बात बीजेपी के विदेश मामले को नियंत्रित करने वाले नेताओं को समझने की आवश्यकता है. वाम एकता का चीनी प्रयोग फिलहाल नेपाल में सफल हुआ है. उसके विस्तार से भारत कैसे अछूता रह सकता है? इस सवाल पर नयी दिल्ली को सोचना होगा. कुछ समय तक भारत में लाल गलियारे की चर्चा को विराम लगा हुआ था, नेपाल में वाम एकता की सरकार बनने के बाद तरह-तरह की कहानियां आरंभ हो जायेंगी!
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