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पीड़ितों के उद्धारक अघोरेश्वर भगवान रामजी

Updated at : 29 Nov 2017 12:50 PM (IST)
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पीड़ितों के उद्धारक अघोरेश्वर भगवान रामजी

अशोक मेहता आध्यात्मिक दृष्टि से पूरी दुनिया में भारत की विशिष्ट पहचान रही है. आदिकाल से भारत की भूमि पर ऐसे-ऐसे महान तपस्वी, ऋषि-मुनि, साधु, संत, महात्मा का अवतरण हुआ, जिन्होंने पूरे मानव समाज को नयी दिशा दिखायी. जीने की राह बतायी. ऐसे ही महान सिद्ध संतों में एक प्रमुख नाम है-अघोरेश्वर भगवान रामजी का. […]

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अशोक मेहता

आध्यात्मिक दृष्टि से पूरी दुनिया में भारत की विशिष्ट पहचान रही है. आदिकाल से भारत की भूमि पर ऐसे-ऐसे महान तपस्वी, ऋषि-मुनि, साधु, संत, महात्मा का अवतरण हुआ, जिन्होंने पूरे मानव समाज को नयी दिशा दिखायी. जीने की राह बतायी. ऐसे ही महान सिद्ध संतों में एक प्रमुख नाम है-अघोरेश्वर भगवान रामजी का. आजीवन गरीबों, शोषितों, पीड़ितों, असहायों, दलितों व कुष्ठियों की सेवा में तल्लीन अघोरेश्वर भगवान रामजी को 29 नवंबर, 1992 को अमेरिका में महानिर्वाण प्राप्त हुआ. प्राचीन औघड़ या अघोर परंपरा में उत्तर भारत के प्रसिद्ध चमत्कारी औघड़ बाबा कीनाराम ने यौगिक साधनाओं के माध्यम से जिस प्रकार सामाजिक सेवा, समाज-सुधार का प्रयत्न और अघोर मत को समाज से जोड़ने की प्रक्रिया का सूत्रपात किया, उसे शिखर पर ले जाने का कार्य किया अघोरेश्वर भगवान राम जी ने.

घोर साधना से अघोर : इनका जन्म 12 सितंबर, 1937 में बिहार के भोजपुर जिले के गुंडी ग्राम में हुआ. सात वर्ष की अवस्था होते-होते बालक भगवान ने घर छोड़ दिया. गांव के बाहर अपने खेत में कुटीया बनाकर रहने लगे. मांगकर भोजन करते. कुछ दिनों के बाद गांव भी छोड़ दिया और विरक्त होकर ब्रह्म की तलाश में निकल पड़े. बाल्यावस्था में ही उन्होंने संपूर्ण भारत का पैदल भ्रमण किया और घोर साधना कर अघोर हो गये. महर्षि शुकदेव के बाद बालपन में ही कठोर साधना का उदाहरण अघोरेश्वर भगवान रामजी का ही मिलता है. अघोरेश्वर भगवान रामजी की सार्वजनिक ख्याति सन् 1950-51 में तब हुई, जब मात्र 15 वर्ष की उम्र में सकलडीहा में रुद्रयाग का आयोजन किया.

उसके पूर्व उन्होंने वहां से निकट ही महड़ौरा श्मशान में घोर साधना की थी. ऐसा समझा जाता है कि पूर्ण अघोर सिद्धि वहीं प्राप्त की. उस समय बाबा के निकट जानेवालों को अद्भुत चमत्कारों के दर्शन होते थे.

क्रीं-कुंड में दीक्षा : अघोरेश्वर भगवान रामजी ने लगभग 13 वर्ष की अवस्था में अघोर पीठ क्रीं-कुंड, वाराणसी के तत्कालीन पीठाधीश्वर बाबा राजेश्वर रामजी से अघोर दीक्षा ली. अघोरेश्वर महाप्रभु ने नेपाल, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, सऊदी अरब, मैक्सिको तथा अमेरिका की यात्रएं कीं, किंतु आपकी यात्र का उद्देश्य न तो विदेशों में शिष्यों की भीड़ एकत्र करना था और न धन संग्रह. आडंबरविहीन इन यात्राओं में अघोरेश्वर ने वहां के अघोर सिद्धों तथा सिद्धपीठों से संपर्क स्थापित किये. अघोर साधक हर देश में हैं, भले ही उनके नामों में भिन्नता है. अपनी सिद्धियों की शक्ति से ये संत अपनी-अपनी जगह पर रहते हुए भी आपस में संपर्क बनाये रखते हैं किंतु अघोरेश्वर भगवान राम ने प्रत्यक्ष संपर्क की दिशा में पहल की.

औघड़ों के प्रति श्रद्धा जगायी : देश-काल की आवश्यकता के अनुसार प्राचीन औघड़-संतों ने देश और समाज के सामने जो उग्र रूप प्रस्तुत किया था, उससे लोगों के मन में अघोर पथ के प्रति अनेक भ्रांत धारणाएं उत्पन्न हो गयी थीं. ‘औघड़’ शब्द से भय का वातावरण उत्पन्न हो जाता है. अघोरेश्वर भगवान राम ने देश-काल को देखते हुए समाज के सामने ऐसा आदर्श उपस्थित किया, जिससे अब तक फैली भ्रांतियां समाप्त हो गयी. अन्य मतों की तरह अघोर मत भी विभिन्न तरह के मिथ्यावादी प्रदर्शन व आडंबर स्वरूप में देखा जा रहा था. वजर्नाओं और शास्त्रीय मतवादों के अभाव में यह मत विभिन्न प्रकार की विसंगतियों से घिर चुका था. अघोर मत व परंपरा को रूढ़ियों से मुक्त कराने और आधुनिक प्रगतिशील स्वरूप देने का श्रेय बीसवीं सदी के अघोर संतों में भगवान अघोरेश्वर रामजी को जाता है. भय की जगह लोगों के मन में औघड़ों के प्रति श्रद्धा का भाव पैदा हो पाया. स्वयं विधि और निषेध से परे अघोरेश्वर ने मद्य का सेवन न केवल स्वयं पूर्णतया बंद कर दिया, वरन् अपने शिष्यों एवं भक्तों को भी उससे दूर रहने का आदेश दिया. उनके आश्रमों में मद्यपान वर्जित है.

श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना : अघोरेश्वर भगवान रामजी ने साधना की चरमस्थिति को पार कर जो कुछ संग्रह किया, उसका वितरण दलित, पीड़ित और शोषित मानवता के लिए मुक्त हस्त से किया. इसी उद्देश्य से सन् 1961 में जब वे मात्र 24 वर्ष के थे, बाबा भगवान राम ट्रस्ट और श्री सर्वेश्वरी समूह की स्थापना की, जिसकी 130 शाखाएं आज देश के कोने-कोने तथा विदेशों में सक्रिय हैं. समूह की ओर से वाराणसी में पड़ाव स्थित उसके प्रधान कार्यालय पर अवधूत भगवान राम कुष्ठ सेवा आश्रम की स्थापना सन् 1962 में की गयी, जो कुष्ठ रोगियों की सेवा में लगा हुआ है. कुष्ठ सेवाश्रम की शाखाओं का भी विस्तार होता जा रहा है. यह है अर्जन और वितरण का एक अनूठा आदर्श. अघोरेश्वर ने समूह को निरंतर सक्रिय रखने के लिए एक उन्नीस सूत्रीय कार्यक्रम दिया, जिनके अंतर्गत अब तक लाखों पीड़ितों की सहायता की जा चुकी है.

पांडित्यपूर्ण प्रवचन नहीं, दिया व्यावहारिक ज्ञान

अन्य महात्माओं और विद्वानों की तरह अघोरेश्वर ने अध्यात्म और दर्शन के गूढ़ तत्वों पर पांडित्यपूर्ण प्रवचन नहीं किया, जो किसी के पल्ले नहीं पड़ते. उन्होंने व्यावहारिक रूप से किये जानेवाले कार्यों पर सरल और सामान्य ढंग से प्रकाश डाला है. अघोरेश्वर ही एकमात्र ऐसे संत है, जो समारोहों में, विशेषकर महिलाओं के आयोजनों में यह चेतावनी बार-बार देते रहे कि बिना आवश्यकता के अथवा आवश्यकता से अधिक किसी वस्तु की खरीद न करें. इसी प्रकार दहेज-प्रथा को आसुरी बताते हुए अघोरेश्वर का कहना था कि ‘‘क्रय-विक्रय और तिलक-दहेज द्वारा जो विवाह संपन्न होते हैं, उनकी भार्या मैथुन के लिए होती है. क्रीड़ा और मनोरंजन के लिए होती है. उससे जन्मी संतान अर्थ को प्रधानता देती है. धर्म की प्रधानता उसमें कभी नहीं हो पाती. तिलक-दहेज रूपी क्रय-विक्रय के चलते मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता.’’ तिलक-दहेज के उन्मूलन के लिए अघोरेश्वर ने एक अत्यंत सामान्य पद्धति विवाह के लिए दी है, जिसकी ओर लोगों का आकर्षण तेजी से बढ़ता जा रहा है. अघोरेश्वर भगवान रामजी का कहना है कि ‘‘अपना कुकृत्य ही भूत है, जो सदा मन को पीड़ा पहुंचाता रहता है. भूत की चिंता छोड़ो. भविष्य में उस गलती को न दुहराने का निश्चय करो.’’

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