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आधार : मुक्ति का मंत्र?

Updated at : 02 Sep 2017 7:04 AM (IST)
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आधार : मुक्ति का मंत्र?

हरिवंश राज्यसभा सांसद 1991 में उदारीकरण या ‘बाजार सब’ कुछ के दर्शन ने भारतीय राजनीति को पलट दिया. विचार, पिछले कई हजार वर्षों से मानव इतिहास के बदलाव में सबसे प्रेरक-प्रभावी तत्व या इंजन रहा है. अब विचार को रिप्लेस (पदच्युत)कर बाजार, नयी ऊर्जा के साथ दुनिया का नया लाइट हाउस (पथ प्रदर्शक रोशनी)बन चुका […]

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हरिवंश
राज्यसभा सांसद
1991 में उदारीकरण या ‘बाजार सब’ कुछ के दर्शन ने भारतीय राजनीति को पलट दिया. विचार, पिछले कई हजार वर्षों से मानव इतिहास के बदलाव में सबसे प्रेरक-प्रभावी तत्व या इंजन रहा है. अब विचार को रिप्लेस (पदच्युत)कर बाजार, नयी ऊर्जा के साथ दुनिया का नया लाइट हाउस (पथ प्रदर्शक रोशनी)बन चुका है.
इस बाजार युग के पीछे असल ऊर्जा है, टेक्नोलॉजी की, पूंजी की, मानव की अनियंत्रित भोग आकांक्षाओं की. लगातार नये वैज्ञानिक खोजों ने मानव नियति को एक नये रास्ते पर डाल दिया है. जीवन, दर्शन, विचार,समाज और संबंध, सब कुछ इस बदलती टेक्नोलॉजी, पूंजी, बाजार और मानव की उपभोक्तावादी अबाध भूख से प्रभावित और पुनर्परिभाषित हो रहे हैं. भारत की राजनीति भी ’91 के पहले की नहीं रही. वह बदल चुकी है.
सत्तर-अस्सी के दशक या इसके पहले के राजनीतिज्ञ, चिंतक, विचारक, विश्लेषक और राजनीति को बदलाव का हथियार मानने वाले हतप्रभ हैं कि इस तेजी से कैसे और कब इस देश की राजनीति बदल गयी, आहट तक नहीं हुई. इस अविश्वसनीय बदलाव में टेक्नोलॉजी समेत इन नये तत्वों की अहम भूमिका है. भावी राजनीति की नयी इबारत और नयी नींव ‘आधार’ जैसे कार्यक्रम लिख व तय कर रहे हैं. इन बदलावों का गहरा असर होनेवाला है. सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, वैचारिक, हर क्षेत्र में. यथास्थिति को हर क्षेत्र में गंभीर चुनौतियां मिलनेवाली हैं. अब इस नये बदलाव की आंधी या गर्भ में क्या-क्या चीजें छिपी हैं, यह तो भविष्य बतायेगा!
संसद, सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़क (जन बहस) तक आधार बहस के केंद्र बिंदु में हैं. एक वर्ग मान रहा है कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार से लड़ने का अब तक का सबसे कारगर (टेक्नोलॉजी) हथियार है आधार. इनकी नजर में हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती, व्यवस्था से बिचौलियों को (दलालोंं, लाबिस्टों) खत्म करना है, जो यह करता है. एक दूसरा वर्ग है, उसकी जेनुइन चिंता है कि आधार निजता (प्राइवेसी) पर प्रहार है.
19 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने आधार के प्रसंग में ही निजता का अधिकार, मौलिक अधिकार है या नहीं, इसकी सुनवाई के लिए नौ जजों की संवैधानिक पीठ बना दी थी, जिसमें खुद उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी थे.
547 पेज में दिये गये इस फैसले की सुनवाई 37 दिनों चली. 1976 में, इसी उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से, इमरजेंसी के दौरान फैसला दिया था कि सरकार, जीवन के अधिकार को निरस्त (सस्पेंड राइट टू लाइफ)कर सकती है. यह फैसला तत्कालीन उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एएन राय के साथ न्यायमूर्ति वाइ वी चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पीएन भगवती और न्यायमूर्ति एमएच बेग ने दिया था.
अकेले न्यायमूर्ति एचआर खन्ना ने इसका तीव्र विरोध किया. वह वरिष्ठतम न्यायाधीश थे. माना गया कि इसी कारण उन्हें मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया.
संयोग है कि आज 41 वर्षों बाद उच्चतम न्यायालय की जिस पीठ ने यह फैसला दिया है, उसमें न्यायमूर्ति डीवाइ चंद्रचूड़ भी हैं, जिनके पिता न्यायमूर्ति वाइ वी चंद्रचूड़ 1976 के बहुमत फैसले में तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार के निर्णय को (इंडोर्स) सही ठहराया था.
बहरहाल 24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की बेंच, न्यायमूर्ति एके सीकरी और अशोक भूषण ने आधार के प्रयोग के संदर्भ में 155 पेजों में अपना फैसला सुनाया. इस फैसले का मर्म है कि केंद्र सरकार ने आधार पर कानून,अपनी सीमा के तहत बनाया है. इन दोनों जजों ने विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में आधार के प्रयोग को संवैधानिक व सही माना. अब 24 अगस्त के एेतिहासिक फैसले में यह उल्लेख है कि पांच जजों की एक पीठ आधार की वैधानिकता एवं प्रासंगिकता की समीक्षा करेगी.
पर जिस आधार को लेकर इतने बड़े फैसले आ रहे हैं, बार-बार सुनवाई हो रही है, वह आधार है क्या? उसकी उपयोगिता, असर या प्रभाव क्या है? क्यों एक वर्ग में आधार के बढ़ते प्रयोग को ले कर बेचैनी है?
लंबी अवधि के बाद हाल में एक हवाई यात्रा के दौरान एक छोटी फिल्म देखी. फिल्म का टाइटल देखकर उत्सुकता बढ़ी. ‘बुद्धा इन ट्रैफिक जाम’. निदेशक विनोद अग्निहोत्री.
बुद्ध नाम देखकर जिज्ञासा बढ़ी. पाया एक गंभीर सामाजिक मुद्दे पर विचारपरक फिल्म. आदर्शवाद और यथार्थवाद में द्व़ंद्व. एनजीओ, नक्सलवाद, घूस, समाज और सरकार से जुड़े प्रसंग. फिल्म की कथा, प्रस्तुति और मुंबई फिल्म जगत के नक्सली नजरिये को लेकर, बहस हो सकती है. पर फिल्म के सवाल और संवाद मन पर असर छोड़ते हैं. बस्तर की पृष्ठभूमि में फिल्म है. अनुपम खेर, पल्लवी जोशी, गोपाल कुमार, नन्हे सिंह, माही गिल वगैरह के अभिनय, संवाद प्रभावी हैं. फिल्म लगभग सवा घंटे की है. फिल्म की पटकथा लिखनेवाले और निर्देशित करनेवाले विवेक अग्निहोत्री का मानना है कि हमारे समय की यह सबसे प्रासंगिक फिल्म है.
हाल ही में श्री अग्निहोत्री विश्वविद्यालयों में इस फिल्म को लेकर गये थे. यादवपुर (कोलकाता) विश्वविद्यालय में झड़प भी हुई. फिल्म का अंतिम दृश्य, सपनों और हकीकत के बीच द्वंद्व का शिखर बिंदु है. आदर्शवाद से प्रेरित नये दौर का नायक कहता है- हमारे समय की असल क्रांति है, बिचौलियों का खत्म होना. नयी क्रांति का मुक्तिसूत्र (आशय नक्सलवाद से) डीबीटी है, यानी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (जरूरत मंदों के खाते में सीधे पैसे का भुगतान). आधार के माध्यम से टेक्नोलॉजी ने आज इसे संभव बनाया है.
हां, यह टेक्नोलॉजी युग है. धन का युग है. विचार, सिद्धांत, आदर्श और मूल्य इस नये दौर में पीछे पड़े हैं. लगातार होते नये आविष्कार, नये हालात, नयी परिस्थितियां बना रहे हैं.
यह सही है कि देश-काल व परिस्थिति के अनुरूप व्यवस्था को स्वतः रिइनवेंट करना होगा. प्रासंगिक बने रहने के लिए. इस दौर में आधार का प्रयोग अगर निजता पर हमला है, तो उसके लिए नयी सिक्यूरिटी और प्राइवेसी लॉ बने. हाल में नंदन नीलेकणि और आरएस शर्मा ने सही कहा है कि मौजूदा हालात में निजी सूचनाओं की रक्षा के लिए नया और सख्त कानून बने. आठ अगस्त को नंदन नीलेकणि ने पुनः कहा कि हम सब डिजिटल दुनिया में हैं. हमें यह सुनिश्चित करना है कि हमारे सभी सिस्टम सुरक्षित हैं. यह सतत चलनेवाली प्रक्रिया है. यह पूरी दुनिया के लिए चुनौती है.
अब जीएसटी लागू हो चुका है. नंदन नीलेकणि ने विस्तार से इसका असर बताया है. उनका अनुमान है कि इससे हर माह दो बिलियन इलेक्ट्रानिक इनवॉइस जेनरेट होंगे. आज हम चाहें या न चाहें, ऑनलाइन कारोबार इस आधुनिक टेक्नोलॉजी के दौर की मजबूरी है. जीएसटी के बाद पहली बार सत्तर लाख करदाता, जो एक्साइज या सर्विस टैक्स या वैट राज्य सरकारों को देते हैं, वे एक प्लेटफार्म (यूनिफाइड प्लेटफार्म) पर होंगे.
उनके सभी रिटर्न डिजिटल फाइल होंगे. हमें समझ लेना चाहिए कि टेक्नोलॉजी के इस दौर ने दुनिया को उसकी अर्थव्यवस्था को डिजिटाइजेशन के लिए मजबूर कर दिया है. दूसरा विकल्प नहीं है. भविष्य का यह एकमात्र रास्ता है. इस रास्ते बड़े पैमाने पर डाटा जेनरेट होंगे, तो उनकी सुरक्षा कैसे हो? निजता की रक्षा कैसे हो? इसके लिए अलग-अलग कैसे कानून बनें, श्रेष्ठ टेक्निकल विशेषज्ञों व कानूनी जानकारों को लगाकर ताकि डाटा और अधिक सुरक्षित रह सके.
20 जुलाई को यह खबर भी आयी कि भारत सरकार ने डाटा सुरक्षा के संबंध में ‘फुल प्रूफ’ व्यवस्था, करने का फैसला किया है. गृह मंत्रालय, कानून मं़त्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनीक विभाग, यूआइडीएआइ वगैरह को इस संबंध में कानून ड्राफ्ट करने के निर्देश भी दे दिये गये हैं.
हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि आज दुनिया में जो परिवर्तन हो रहे हैं उसमें, एक भूमिका या पक्ष सरकार की है, पर इससे अधिक भूमिका, टेक्नोलॉजी और लोगों की है. भारत के संदर्भ में ही देखें. जीएसटी, आधार और डिमोनेटाइजेशन सरकार की पहल हैं, पर फोन में जीपीएस, फिटबिट में हेल्थ वगैरह क्या हैं? स्मार्टफोन में निजी सूचनाएं भरी हैं.
ये सब ग्लोबल इंटरनेट कंपनियों की चीजें हैं. साफ है कि अब कोई चाहे या न चाहे भारत के ये आंकड़े देश के बाहर जा रहे हैं. हम सेंसर का इस्तेमाल भी कर रहे हैं. इंटरनेट ई-मेल वगैरह जीवन का हिस्सा बन गये हैं. हम चाहें या न चाहें, दुनिया एकसूत्र में बंध रही है. टेक्नोलॉजी संचालित इस धारा को न हम मोड़ सकते हैं, न पीछे ले जा सकते हैं. यह प्रकृति के नियम जैसा है. हां, इसमें बड़ी चुनौतियां हैं. इस नये दौर में निजता कैसे बचे? स्टेट सर्विलेंस निजी जीवन में न हो?
बड़ी कंपनियों के प्रचार या डाटा बैंक या अनचाहे एसएमएस या अनावश्यक ई-मेलों से कैसे बचे रहें, यह बड़ी चुनौती है. पर, आज व्यवस्था की सबसे गंभीर चुनौती है कि भ्रष्टाचार-लीकेज कैसे रुके? पिछले 70 वर्षों में आजादी के बाद, भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर कितनी बार सत्ता बदली? नये निजाम आये, पर भ्रष्टाचार बदस्तूर आंधी, तूफान से सुनामी बनता गया.
नब्बे के दशक की बात है, प्रभात खबर में रविवार के दिन पहले पेज की खबर चुन रहा था. तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विभाग सचिव एनसी सक्सेना के जयपुर से दिये एक बयान पर निगाह गयी.
एक आयोजन में उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के विकास के लिए, जो कल्याणकारी योजनाएं चला रही है, उन्हें बंद कर यह कुल राशि लगभग बयालीस हजार करोड़ (स्मृति के आधार पर ही इस आंकड़े का उल्लेख कर रहा हूं.) अगर मनीआर्डर से सीधे गरीबों के पास भेज दें, तो दस वर्षों में गरीब, गरीबी-रेखा से ऊपर उठ जाएंगे. साफ था कि विकास योजनाओं में हो रही लूट व लीकेज की पीड़ा वह व्यक्त कर रहे थेे.
बाद में श्री सक्सेना, योजना आयोग के सेक्रेटरी बने. वह देश के प्रामाणिक, ईमानदार और सक्षम अफसरों में गिने जाते थे. उन दिनों का उनका एक और उल्लेखनीय बयान स्मृति में है. कहा, ऊपर से यानी केंद्र से एक रुपया नीचे भेजने में चार या पांच रुपये खर्च होते हैं. इस बयान का अर्थ था कि ऊपर से गरीब को एक रुपया भेजने में व्यवस्थागत खर्च (नौकरशाही वगैरह) चार से पांच रुपये हैं. बाद में श्री सक्सेना, यूपीए शासन के दौरान श्रीमती सोनिया गांधी के करीबी सलाहकारों में रहे.
राष्ट्रीय सलाहकार समिति के सदस्य के तौर पर. श्री सक्सेना के इन दोनों बयानों के ठीक सात-आठ वर्ष पहले 1985 में राजीव गांधी ने कांग्रेस के सौ वर्ष पूरे होने पर मुंबई में आयोजित एक ऐतिहासिक जलसे में कहा कि केंद्र से गांवों के विकास के लिए हम यदि सौ रुपया भेजते हैं, तो वहां 15 रुपये ही पहुंचते हैं. बीच में बिचौलिये पचासी रुपये हजम कर लेते हैं. राजीव गांधी की यह ईमानदार स्वीकारोक्ति हमेशा याद की जायेगी. इस बयान से तूफान खड़ा हो गया.
सबसे पहले उन्हीं के दल के नेता उनके खिलाफ हो गये. दरअसल आजादी की लड़ाई का ताप उतरने लगा था. साठ और सत्तर के दशकों से भ्रष्टाचार की जो आंधी भारत की व्यवस्था में आयी, वह लगातार तूफान और सुनामी का रूप लेती गयी. सड़कें नहीं बनी, पैसे निकल गये. बांध कागजों-फाइलों पर खुदे. नहरों का प्रवाह महज कागज के नक्शों तक सीमित रहा. तालाब कभी जमीन पर खुदे नहीं और देश का अरबों-खरबों पैसा सीधे लूट के समुद्र में बहता गया.
स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर फर्जी, विधवाओं के नाम पर लूट, वृद्धों के नाम पर सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग, स्कॉलरशिप में धांधली, विकास राशि में खुली डकैती. देश और समाज का कोई क्षेत्र नहीं बचा, जहां लूट की यह दुर्गंध न पहुंची हो.
पढ़ाई में, बीमारी में, सेवानिवृत पेंशन में (पेंशनधारी दशकों पहले शरीर छोड़ चुके हैं, फिर भी पेंशन निकल रहा है). चौतरफा दुर्गंध. उसी दौर में भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए जेपी (जयप्रकाश नारायण) का बिहार आंदोलन शुरू हुआ. उस आंदोलन का मुख्य नारा था- ‘भ्रष्टाचार मिटायेंगे नया समाज बनायेंगे’. जेपी अक्सर उन दिनों संथानम कमिटी की बात करते-याद दिलाते घूमते थे.
आजादी की आंच बुझ रही थी, पर शास्त्री जी की लौ बची थी, तभी भ्रष्टाचार की इस आंधी के स्वरूप-प्रवृति को समझने और इसके अध्ययन के लिए केंद्र सरकार ने संथानम कमिटी बनायी. इस कमिटी ने भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए तरह-तरह के सुझाव दिये, पर कोई कदम नहीं उठा. जेपी ने कमिटी को अपनी राय दी थी. बाद में तो भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए, कालेधन से निजात के लिए निरंतर कमिटियां बनती गयी. पर मर्ज बढ़ता गया. गहराता गया. अब तो कैंसर बन गया है.
हमारी पीढ़ी की स्मृति में होगा कि इस भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए समाज की ईमानदार ताकतें (वाम या दक्षिण) हमेशा सक्रिय रहीं. पर कारगर नहीं हो सकीं.
कुछेक महीनों पहले हमने देखा, डिमोनेटाइजेशन (विमुद्रीकरण) के ठीक पहले, ब्लैकमनी नियंत्रण के लिए पिछले चालीस सालों में लगभग चालीस से अधिक कमिटियां, केंद्र सरकार ने बनायी. इधर कमिटियां और कमीशनों की संख्या बढ़ती गयी, उधर ब्लैकमनी का आकार-प्रकार बढ़ता गया.1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी. बड़ी उम्मीद थी कि एक नयी सुबह होगी, पर सिस्टम ताकतवर साबित हुआ. मुझे याद आता है, प्रो जयदेव सेट्ठी का एक लेख.
1980 के आसपास, उन्होंने दो किश्तों में ‘द ट्रिब्यून’ में लिखा था, लेख का मूल मर्म था कि भारत के शासक वर्ग में तब बीस से पच्चीस लाख लोग ऐसे थे, जो एक पैसे का श्रम नहीं करते थे. किसी किस्म के उत्पादन या पूंजी सृजन में उनका योगदान नहीं था, पर वे पांचसितारा जीवन जीते थे. उनके लेख का मूल सवाल था कि बिना किसी आमद-श्रम के यह तबका कैसे सबसे संपन्न जीवन शैली में रहता है? स्पष्ट था कि यह सब भ्रष्टाचार की उपज है.
यह था, भारत में दलालों का (पॉवर ब्रोकर्स), लाबिस्टों का उदय, साम्राज्य एवं ताकत. खासतौर से दिल्ली के पांचसितारा होटलों में इन्हीं लाबिस्टों या पॉवर ब्रोकरों का राज रहा. मनीषी राजगोपालाचारी के शब्दों में कहें तो यह सब लाइसेंस, कोटा, परमिट राज का परिणाम था. आज कम लोगों को याद होगा कि प्रो जयदेव सेट्ठी शायद पहले देशज अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने 1972 के राजनीतिक संकट का पहले ही संकेत दे दिया था. 1972-74 के आसपास की उनकी चर्चित पुस्तक है ‘इंडिया इन क्राइसिस’. बाद में वह जनता पार्टी शासन में योजना आयोग के सदस्य बने. फिर मशहूर पुस्तक लिखी ‘गांधी टुडे’. यह सब व्यवस्था को भारतीय नजर से समझने वाले लोग थे.
इन्होंने भ्रष्टाचार के भयावह अंदरूनी रूप और हमारी व्यवस्था की दयनीयता को देखा, परखा, लिखा और लोगों को जगाया. इसके पहले 1960 में ही नक्सलबाड़ी से चिनगारी निकली, संपूर्ण बदलाव की. क्रांति और तख्तापलट के सपनों के साथ. उस दौर के अनेक ईमानदार और प्रतिबद्ध नक्सली नेताओं के अनुभव पढ़े. पग-पग पर भ्रष्टाचार की दुर्गंध.
खुद जयप्रकाश नारायण, जो गांधी के नहीं रहने पर उन्हीं के आदर्शों और सिद्धांतों पर चलनेवाले अनोखे राजनेता हुए, नक्सलियों के बीच गये. शायद वह भारत के पहले और अंतिम राजनेता थे, जिन्होंने नक्सलियों से सीधे बात की. उनकी बेचैनी को समझा, फिर एक पुस्तिका लिखी ‘फेस टू फेस’(हिंदी में भी है ‘आमने-सामने’’ नाम से).
इस पुस्तिका में ‘जेपी’ ने सरकारी योजनाओं की लूट-भ्रष्टाचार पर निजी अनुभव लिखा है. इस मुद्दे पर उन्होंने नक्सलियों की बात को सही माना. मुझे एक निजी प्रसंग उल्लेख करने की इजाजत दें. प्रभात खबर में काम करते समय अलग झारखंड बनने के बाद हर 15 नवंबर को, झारखंड स्थापना दिवस पर इस अखबार का विशेष अंक निकलता था. एक तरह से प्रतिवर्ष सरकार के कामों का ऑडिट. साथ में दूसरी चीजें भी होती थीं.
यह लगभग अस्सी से सौ पेज का अखबार होता था. इसमें भ्रष्टाचार के ऊपर अध्ययन का एक खास सेक्शन (हिस्सा) था. 2004 में नवंबर के सप्ताह के आसपास एक दिन अचानक प्रो रजनी कोठारी (देश-दुनिया के जाने-माने समाज वैज्ञानिक और सीएसडीएस के संस्थापक) ने फोन किया. उन्होंने कहा मैंने किसी समाचारपत्र को इतना साहसिक, जमीनी और और आवश्यक काम करते नहीं देखा है. उन्होंने बहुत उत्साह बढ़ाया. मेरी पीढ़ी ऐसे लोगों से प्रेरित होती थी.
उत्साह बढ़ा और झारखंड बनने के बाद हर विकास योजनाओं में इस अबाध लूट के प्रामाणिक और जमीनी अध्ययन हम छापते रहे. बाद में प्रो विवेक देबरॉय ने (जो अब नीति आयोग के सदस्य हैं) भ्रष्टाचार पर अध्ययन कर एक किताब ‘करप्शन इन इंडिया : द डीएनए एंड आरएनए’ लिखी. इसमें प्रभात खबर के इस अध्ययन का पर्याप्त उल्लेख है.
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