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सांस्कृतिक धरोहर को बचाने में जुटे हैं दुर्गा मुर्मू

Updated at : 01 Sep 2017 12:29 PM (IST)
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सांस्कृतिक धरोहर को बचाने में जुटे हैं दुर्गा मुर्मू

!!दशमत सोरेन, जमशेदपुर!! गोड़ा-नरवा क्षेत्र के राजदोहा गांव निवासी दुर्गा प्रसाद मुर्मू झारखंड के सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने में लगे हुए हैं. इन्होंने आदिवासी सामाजिक-पारंपरिक, लुप्तप्राय चीजों को संरक्षित करना व उससे लोगों को अवगत करना अपना मिशन बना लिया है. वे पिछले 30-35 सालों से पारंपरिक वाद्ययंत्र बानाम(केंदरी), मांदर, टमाक (नगाड़ा) समेत लोकगीत व […]

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!!दशमत सोरेन, जमशेदपुर!!

गोड़ा-नरवा क्षेत्र के राजदोहा गांव निवासी दुर्गा प्रसाद मुर्मू झारखंड के सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने में लगे हुए हैं. इन्होंने आदिवासी सामाजिक-पारंपरिक, लुप्तप्राय चीजों को संरक्षित करना व उससे लोगों को अवगत करना अपना मिशन बना लिया है. वे पिछले 30-35 सालों से पारंपरिक वाद्ययंत्र बानाम(केंदरी), मांदर, टमाक (नगाड़ा) समेत लोकगीत व संगीत को बचाने की कोशिश में लगे हैं. उनके गाये पारंपरिक गीतों को झारखंड, बंगाल, ओडिशा समेत देश के अन्य हिस्से में काफी पसंद किया जाता है. मुर्मू पारंपरिक लोकगीत-संगीत के गुरु के रूप में जाने जाते हैं. उन्होंने युवाओं की एक मंडली भी तैयार की है. वे बानाम, टमाक, मांदर, चोड़चोड़ी, साकवा समेत अन्य वाद्ययंत्र बजाना सिखाते हैं. उनका मानना है कि युवा ही समाज व संस्कृति के असली वाहक हैं. युवाओं को अपने पारंपरिक धरोहरों से प्रेम करना सिखाना होगा. तभी वाद्ययंत्रों की सुरीली तान लंबे समय तक सुनायी देगी. इसी उद्देश्य से वे युवाओं को इसका प्रशिक्षण देते हैं.

वाद्ययंत्र को जीवन जीने का सहारा बनाया
दुर्गा प्रसाद बताते हैं कि पांच साल की उम्र में बैलगाड़ी से हादसे में पांव में लगी चोट ने उन्हें विकलांग बना दिया. लंबे समय तक इलाज चला, लेकिन कुछ खास लाभ नहीं हुआ. 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने पढ़ाई शुरू की. दसवीं की पढ़ाई के दौरान ही ठान लिया था कि कुछ अलग करना है. मन की बेचैनी दूर करने के लिए वाद्ययंत्र को जीवन जीने का सहारा बना लिया. जीविका के लिए मांदर और बानाम बजाना शुरू किया. वे अपने पैरों पर खड़ा तो नहीं हो सके, लेकिन सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के जुनून को जीवन शैली बना लिया.

दुर्गा प्रसाद मुर्मू का परिचय
बानाम वाद्ययंत्र वादक दुर्गा प्रसाद मुर्मू नाट्यकर्मी, लेखक, गीतकार, संगीतकार और गायक भी हैं. तीन मार्च 1953 को जन्मे दुर्गा प्रसाद ने दसवीं तक की पढ़ाई की है. पंडित रघुनाथ मुर्मू के सहायक रहे दुर्गा प्रसाद मुर्मू का साहित्य में भी योगदान है. उन्होंने चिकि चितर, एलखा, जोड़ तिरियो गुलाछी बानाम, पाराब पुनाई आर बोंगा बुरू, मदाड़िया और जोनोम खोन गोज गुर आदि किताब लिखी है. दुर्गा को भुवनेश्वर में गुरु गोमके रघुनाथ मुर्मू फेलोशिप अवार्ड-2004, राउरकेला में संताली लोक संगीत पुरस्कार-2005 और कोलकाता में बेस्ट संताली आर्टिस्ट-2009 का अवार्ड मिला.

भाई व बेटी भी लोकगीत के कलाकार

दुर्गा प्रसाद मुर्मू का परिवार लोकगीत व संगीत को समर्पित है. उनके छोटे भाई उमापोदो मुर्मू लोकगीत गायक व संगीतकार हैं. बेटी बिंदु सोरेन भी लोकगीत गायिका हैं. दुर्गा प्रसाद मुर्मू समेत उमापोदो मुर्मू, बिंदु मुर्मू के गाये पारंपरिक लोकगीत अक्सर आॅल इंडिया रेडियो से भी सुनने को मिलते हैं.

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