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बाढ़ प्रबंधन : नदी प्रबंधन के सिवाय कोई चारा नहीं

Updated at : 21 Aug 2017 6:30 AM (IST)
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बाढ़ प्रबंधन : नदी प्रबंधन के सिवाय कोई चारा नहीं

मानवजनित कारणों से उपजी त्रासदी ज्ञानेंद्र रावत अध्यक्ष, राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा समिति बाढ़ एक ऐसी आपदा है, जिसमें हर साल सिर्फ करोड़ों रुपयों का नुकसान ही नहीं होता, बल्कि हजारों-लाखों घर-बार तबाह हो जाते हैं, लहलहाती खेती बर्बाद हो जाती है और अनगिनत मवेशियों के साथ इंसानी जिंदगियां पल भर में अनचाहे मौत के मुंह […]

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मानवजनित कारणों से उपजी त्रासदी
ज्ञानेंद्र रावत
अध्यक्ष, राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा समिति
बाढ़ एक ऐसी आपदा है, जिसमें हर साल सिर्फ करोड़ों रुपयों का नुकसान ही नहीं होता, बल्कि हजारों-लाखों घर-बार तबाह हो जाते हैं, लहलहाती खेती बर्बाद हो जाती है और अनगिनत मवेशियों के साथ इंसानी जिंदगियां पल भर में अनचाहे मौत के मुंह में चली जाती हैं. अक्सर माॅनसून के आते ही नदियां उफान पर आने लगती हैं और देश के अधिकांश भू-भाग में तबाही मचाने लगती हैं. जब-जब बाढ़ ने विकराल रूप धारण किया, नदियों के किनारे बसी बस्तियां बाढ़ के प्रकोप का शिकार होकर खत्म हो गयीं. नदियों के प्रवाह क्षेत्र में हरे-भरे खेत जो भी आये, उसकी चपेट में आकर तबाह हो गये.
असल में बाढ़ की समस्या मुख्यतः गंगा के उत्तरी किनारे वाले क्षेत्र में है. गंगा बेसिन के इलाके में गंगा के अलावा यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी, सोन और महानंदा आदि प्रमुख नदियां हैं, जो मुख्यतः उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार सहित मध्य एवं दक्षिणी बंगाल में फैली है. इनके किनारे घनी आबादी वाले शहर बसे हुए हैं और यहां की आबादी का घनत्व 500 व्यक्ति प्रति किमी का आंकड़ा पार कर चुका है. उसका दबाव नदियों के प्रवाह क्षेत्र पर बेतहाशा बढ़ रहा है.
उसके ‘बाढ़ पथ’ पर रिहायशी कालोनियों का जाल बिछता जा रहा है. नदी किनारे एक्सप्रेस वे का निर्माण इसका सबूत है कि सरकारें इस दिशा में कितनी संवेदनहीन हैं.
हिमालय से निकलनेवाली वह चाहे गंगा नदी हो, सिंध हो या ब्रह्मपुत्र या फिर कोई अन्य या उसकी सहायक नदी, उनके उद्गम क्षेत्रों की पहाड़ी ढलानों की मिट्टी को बांधकर रखनेवाले जंगल विकास के नाम पर तेजी से काटे गये.
वहां बहुमंजिली इमारतों के रूप में कंक्रीट के जंगल, कारखाने और सड़कों के जाल बिछा दिये गये. नतीजतन इन ढलानों पर बरसनेवाला पानी झरनों के माध्यम से जहां बारह महीने इन नदियों में बहता था, अब वह ढलानों की मिट्टी और अन्य मलबे आदि को लेकर मिनटों में बह जाता है और अपने साथ वहां बसायी बस्तियों को खेतों के साथ बहा ले जाता है. इससे नदी घाटियों की ढलानें नंगी हो जाती हैं. उसके दुष्परिणाम रूवरूप भूस्खलन, भूक्षरण, बाढ़ आती है और बांधों में गाद का जमाव दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है.
जंगलों के कटान के बाद बची झाड़ियां और घास-फूस चारे और जलावन के लिए काट ली जाती हैं. इसके बाद ढलानों को काट-काट कर बस्तियों, सड़कों का निर्माण व खेती के लिए जमीन को समतल किया जाता है. इससे झरने सूखे, नदियों का प्रवाह घटा और बाढ़ का खतरा बढ़ता चला गया. हर साल बढ़ता बाढ़ का प्रकोप इसी असंतुलन का नतीजा है.
यह कड़वा सच है कि नदियों के जलागम क्षेत्र की जमीन जंगलों के कटान के चलते जब नंगी हो जाती है, तब मिट्टी गाद के रूप में नदी की धारा में जमने लगती है. मैदानी इलाकों में यह गाद नदियों की गहराई को पाट कर उनको उथला बना देती है. नतीजतन बरसात के पानी का प्रवाह नदी की धारा में समा नहीं पाता और फिर वह आस-पास के इलाकों में फैलकर बाढ़ का रूप अख्तियार कर लेता है.
नदी की धाराओं में मिट्टी के जमने और उनमें गहराई के अभाव में पानी कम रहने से वे सपाट हो जाती हैं. फिर अब नदियों के किनारे न तो हरियाली बची, न पेड़-पौधे. जब पेड़-पौधे रहेंगे ही नहीं, तो उनकी जड़ें मिट्टी कहां से बांधेंगीं. और जब बारिश आती है, तो बरसात का पानी नदी की धाराओं में न समाकर आस-पास फैलकर बाढ़ का विकराल रूप धारण कर लेता है.
हमारी सरकार हर साल आनेवाली बाढ़ के कारणों और जल, वायु, जमीन व जंगल की नियंत्रक प्रवृत्ति के विज्ञान को समझने में नाकाम रही है.
आखिर सरकार ढांचागत विकास में जल निकासी की अनदेखी क्यों करती है, जो बेहद जरूरी है? बाढ़ के दौरान इसकी अहमियत और बढ़ जाती है. चेन्नई की बाढ़ से भी उसने कोई सबक क्यों नहीं लिया. विकास की राह में हाइवे का निर्माण गांवों के स्तर से ऊंचा रखने पर क्यों बल देती है? नदियों में गाद की समस्या का समाधान करने में क्यों विफल रही है? जबकि यह जगजाहिर है कि नदियों में गाद बाढ़ का प्रमुख कारण है.
अभी तक हमारे यहां नदी प्रबंधन के नाम पर बांधों, बैराजों, पुश्तों का निर्माण और सिंचाई के लिए नहरें निकालने का काम तीव्र गति से हुआ है.
इस मामले में हमारा देश चीन, पाकिस्तान आदि अन्य देशों के मुकाबले शीर्ष पर है. जहां तक नदी किनारे तटबंधों के निर्माण का सवाल है, वह नदी की धारा को रोके रखने में नाकाम साबित हुए हैं. कोसी और केन के तटबंध-छोटे-छोटे बंध इसके उदाहरण हैं, जो इन नदियों के रौद्र रूप को बांधे रखने में नाकाम रहे हैं. इसलिए जरूरी है कि मौसम के बदलाव को मद्देनजर रख नदियों की प्रकृति का सूक्ष्म रूप से विश्लेषण-अध्ययन किया जाये. उसी के तहत नदी प्रबंधन की तात्कालिक व्यवस्था की जाये. इसके सिवाय कोई चारा नहीं है. दुख है कि आज तक इस दिशा में कुछ नहीं किया गया. नतीजन हर साल बाढ़ के तांडव का सामना करने को जनता विवश है.
बाढ़ महज मानवजनित कारणों से उपजी एक भीषण त्रासदी है. इसलिए प्रशासनिक तंत्र को चुस्त-दुरुस्त बनाना बेहद जरूरी है, तभी इस विभीषिका पर किसी हद तक अंकुश संभव हैं. सरकारें तो बाढ़ के आने पर हर साल राहत का ढिंढोरा पीट कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं.
इन हालात में नदी प्रबंधन अभी दूर की कौड़ी है. जब तक ऐसा नहीं होगा, हर साल राहत राशि से अपनी तिजोरियां भर नेता-नौकरशाह-अधिकारी मालामाल होते रहेंगे. उनके लिए बाढ़ तो उनके विकास का जरिया है.
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