जीएसटी को लेकर चिंताएं बरकरार, क्या जीएसटी दूसरा ‘नियति के साथ करार’ है?

By Prabhat Khabar Digital Desk
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एक जुलाई से लागू वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया में एक बड़ा कदम है. एक ओर जहां इसमें अनेक खूबियां हैं तथा इससे कई उम्मीदें जुड़ी हुई हैं, वहीं इस तंत्र में कमियां भी हैं. सही और सफल तरीके से लागू करने की चुनौतियां भी हैं. इसके दायरे को विस्तार भी दिया जाना है. यह चिंताएं भी जाहिर की जा रही हैं कि इससे असंगठित क्षेत्र को बड़ा नुकसान हो सकता है. जीएसटी से जुड़ी जरूरी चिंताओं का आकलन आज के इन-डेप्थ में...

प्रसेनजित बोस अर्थशास्त्री

यह बात स्पष्ट नहीं है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने की घोषणा का कार्यक्रम आधी रात को संसद भवन में क्यों आयोजित किया गया. इस मुद्दे पर मीडिया में शोर-गुल के बावजूद सच यह है कि बहुसंख्यक भारतीय उत्पादक, व्यापारी और उपभोक्ता जीएसटी के तौर-तरीकों और इसके असर के बारे में अंधेरे में हैं. मेरी नजर में मुख्य चिंताएं इस प्रकार हैं.

1 जब 2000 के दशक के प्रारंभ में जीएसटी की चर्चा शुरू हुई थी, तब इसे पूरे देश के लिए एकल अप्रत्यक्ष कर के रूप में प्रस्तावित किया गया था. एक दशक की लंबी चर्चा के बाद यह समझा गया कि ‘एक देश, एक कर’ का विचार वास्तव में भारत के संविधान में अंतर्निहित संघीय ढांचे के विरुद्ध जाता है.

भारत की संघीय वास्तविकताओं से मेल बैठाने के प्रयास में जीएसटी का अंतिम रूप केंद्रीय जीएसटी, राज्य जीएसटी और इंटीग्रेटेड जीएसटी के एक जटिल संरचना के रूप में हमारे सामने है जिसमें पांच से लेकर 28 फीसदी तक की कई कर दरें हैं. पेट्रोलियम उत्पादों और शराब को इससे बाहर रख गया है, जहां पुरानी दरें ही लागू रहेंगी. अब ऐसे परिणाम के बाद क्या यह कहना अजीब नहीं है कि जीएसटी ‘एक देश, एक कर’ का प्रतिनिधित्व करता है? सवाल यह उठता है कि अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में इसके द्वारा कौन सा सरलीकरण हासिल किया जा सका है.

2 चूंकि जीएसटी नेटवर्क आइटी प्लेटफॉर्म पर आधारित है, इस कारण इसमें अच्छा खर्च आयेगा, खासकर छोटे व्यवसायों के लिए. हर महीने टैक्स रिटर्न भरने में न सिर्फ मध्यम स्तर के उद्यमों और छोटे कारोबारियों को दिक्कतें आयेंगी, बल्कि कई कारोबार ऑनलाइन टैक्स रिटर्न न भर पाने या पेशेवर को हायर करने में मजबूरी की वजह से बंद भी हो सकते हैं.

अनौपचारिक क्षेत्र में जीएसटी लागू होने का बड़ा नुकसान होगा. यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में कम-से-कम 40 फीसदी योगदान करता है. बीस लाख रुपये सालाना के कारोबार की सीमा (पूर्वोत्तर के लिए 10 लाख) अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में बहुत कम है. छोटे आर्थिक तत्व (ज्यादातर स्व-रोजगार में हैं) अभी नोटबंदी की मार से भी उभर नहीं पाये हैं. अब इन्हें जीएसटी के झटके का सामना करना है. ऐसे संभावित पीड़ितों की रक्षा के लिए क्या व्यवस्था की गयी है?

3 जीएसटी लागू होने के अंतिम समय तक दरों को लेकर भ्रम की स्थिति थी. ऐसे में मुद्रास्फीति के अचानक बढ़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, जैसा कि उन कुछ देशों का अनुभव रहा है, जहां ऐसी ही कर व्यवस्थाएं लागू की गयी थीं. यह भी रेखांकित करना जरूरी है कि अनेक वस्तुएं 18 से 28 फीसदी के दायरे में हैं, जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तरों की तुलना में बहुत अधिक है. कपड़ों, यातायात सुविधाएं और मोबाइल सेवाओं के मूल्य में वृद्धि अपेक्षित है. सरकार ने भी कहा है कि मुनाफाखोरी रोकने की व्यवस्था करने में कुछ देर होगी. ऐसे में कुछ समय के लिए उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए क्या उपाय किये हैं?

4 आम तौर पर राजनीतिक दलों ने जीएसटी का स्वागत किया है. उनका मानना है कि इससे राजस्व प्राप्ति बढ़ेगी और आर्थिक वृद्धि तेज होगी. अप्रत्यक्ष कर आधार के व्यापक होने से राजस्व बढ़ेगा.

अब देखना यह है कि यह अपेक्षित राजस्व वृद्धि सभी राज्यों और केंद्र के लिए लाभकारी होगा, या फिर उन्हीं राज्यों को अधिक फायदा होगा, जो उत्पादन से अधिक उपभोग करते हैं, जो कि उनकी कीमत पर होगा जो निर्यातक हैं. यह तर्क कि जीएसटी से निवेश बढ़ेगा, भ्रामक है, खासकर तब, जब निजी निवेश पर अपूर्ण मांग और बैड लोन संकट का ग्रहण लगा हुआ है. जीएसटी से जुड़ी अनिश्चितता निवेश और वृद्धि को

थोड़े समय के लिए कमजोर भी कर सकती है. यदि आर्थिक वृद्धि पर प्रतिकूल असर पड़ता है, तो फिर अधिक राजस्व वसूली को कैसे संभव बनाया जा सकेगा?

हमें मीडिया के अति उत्साह और सरकारी प्रचार से प्रभावित होने की जगह इन आर्थिक चिंताओं को जेहन में रखना होगा और तथ्यों एवं अनुभव के आधार पर जीएसटी से जुड़े दावों का परीक्षण करना होगा. पर एक बात तो निश्चित है कि मोदी सरकार की रणनीति नोटबंदी और जीएसटी के जरिये जबरदस्ती डिजिटाइजेशन थोप कर देश के छोटे व्यवसायों को निरंतर परेशान कर बड़े कॉरपोरेट समूहों के लिए बड़ा बाजार उपलब्ध कराने की है.

अब आगे क्या करना है?

जीएसटी को सफलतापूर्वक लागू करने की चुनौती के साथ कुछ महत्वपूर्ण अपूर्ण कार्य हैं जिन पर आगे सोचने की आवश्यकता है.

1. जीएसटी के दायरे को बढ़ाना- फिलहाल कुछ उत्पादों को जीएसटी से बाहर रखा गया है. शुरुआती दिक्कतों को हल करने और राजस्व प्राप्ति का आकलन करने के बाद उन उत्पादों को जीएसटी प्रणाली में लाया जाना चाहिए, जिन्हें अभी बाहर रख गया है. कच्चा पेट्रोलियम और पेट्रो उत्पाद जीएसटी के हिस्से हैं, पर पांच वस्तुओं- कच्चा तेल, पेट्रोल, डीजल, हवाई जहाज ईंधन और प्राकृतिक गैस- को अस्थायी तौर पर बाहर रखा गया है. कानूनी व्यवस्था के मुताबिक जीएसटी कौंसिल की मंजूरी से इन्हें कभी भी दायरे में लाया जा सकता है.

2. बिजली और रियल एस्टेट को शामिल करना- बिजली एक महत्वपूर्ण वस्तु है, पर राज्य सरकारों के विरोध के कारण इसे शामिल नहीं किया गया है. उनका तर्क है कि इससे उपभोक्ताओं पर बेजा बोझ बढ़ेगा. इसे दायरे में लाने में कोई कानूनी अड़चन भी नहीं है. इससे स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार में भी सहायता मिल सकती है.जीएसटी से रियल एस्टेट को बाहर रखना एक अजीब फैसला है. इसे शामिल करने से जमीन के कारोबार में पारदर्शिता आयेगी तथा काले धन को रोकने में भी मदद मिलेगी. इससे राजस्व भी बढ़ेगा.

3. विवादों का निपटारा- केंद्र और राज्यों के स्तर पर तकनीकी सचिवालय बना कर आसन्न विवादों को निपटाया जा सकता है. मामलों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की तैयारी भी जरूरी है. इन सचिवालयों के आपसी तालमेल से तकनीकी मसलों को सुलझाने में तो मदद मिलेगी ही, साथ ही संघीय ढांचे को भी एक ठोस आधार मिल सकेगा.

जीएसटी की चुनौतियां

जीएसटी को लेकर व्यापारियों और उपभोक्ताओं के मन में कई सवाल हैं. साथ ही इससे जुड़ी कई चुनौतियां भी हैं. एक नजर उन चुनौतियों पर-

- कई दुकानदार अभी भी पुराने माल को पूर्व जीएसटी दर पर बेच रहे हैं, क्योंकि उनके पास नये मूल्यवाले उत्पाद नहीं हैं. वे अभी भी इस इंतजार में हैं कि निर्माताओं के पास से उनके पास नये उत्पाद आयें. उनके पास जो उत्पाद हैं उन पर पुराने मूल्य छपे हैं. इन उत्पादों में जीएसटी जोड़ कर नहीं बेचा जा सकता है. ऐसा करने से उत्पाद के दाम बढ़ जायेंगे. वहीं दूसरी ओर रेस्तरां जैसे कुछ ऐसे व्यवसाय हैं जहां नयी कर प्रणाली लागू तो कर दी गयी है, लेकिन कीमत से वैट नहीं घटाया गया है. अगर ऐसा ही रहा तो उपभोक्ताओं को बहुत ज्यादा बिल का भुगतान करना पड़ सकता है.

- जीएसटी लागू होने की वजह से देश के कई हिस्सों में दवाइयों की बिक्री पर भी प्रभाव पड़ा है. पुरानी दवाइयों की खपत हो जाये, इसके लिए दवा कंपनियों ने नये माल के उत्पादन को धीमा कर दिया है. दूसरे, दवा विक्रेताओं द्वारा अपने सॉफ्टवेयर को वैट से जीएसटी में अपडेट नहीं करने से भी बिक्री पर प्रभाव पड़ा है. मुंबई में तो इस वजह से 30 प्रतिशत तक दूकाने बंद हो गयी हैं. अगर ऐसा ही रहा तो आनेवाले समय में उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. इतना ही नहीं, जीएसटी की चार दरों के कारण भी व्यवसायियों को परेशानी हो रही है.

- नयी कर प्रणाली लागू होने के बाद 15 अंकाें वाली जीएसटी संख्या लेना अनिवार्य है, इसके बिना व्यापार नहीं किया जा सकता है. लेकिन दूकानदारों की मानें, तो कई दिनों तक प्रयास करने के बावजूद अब तक उन्हें जीएसटी संख्या नहीं मिली हैं. ऐसे में वे अपने व्यापार को लेकर आशंकित हैं. वहीं कई दुकानदार अभी भी मैनुअल बिल ही दे रहे हैं, जिसे लेकर उपभोक्ता पेशोपेश में हैं. कई ऐसे मामले भी सामने आये हैं, जहां दुकानदारों द्वारा गणना में चूक होने के बाद उपभोक्ताओं को गलत बिल पकड़ा दिये गये.

- बदलाव काे लेकर व्यापारी हमेशा आशंकित रहते हैं. नोटबंदी को लेकर परेशानी झेलने के बाद जीएसटी आने से इनकी परेशानी और बढ़ गयी है. कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां जीएसटी लागू होने के बाद कर दर बहुत ज्यादा बढ़ गयी है. अगर ऑटोमोबाइल सेक्टर की बात करें तो हाइब्रिड कार कंपनियों को जीएसटी और उपकर मिला कर अब कुल 43 प्रतिशत कर चुकाना होगा, जो बहुत ज्यादा है.

- जीएसटी ने मल्टीप्लेक्स, थिएटर सहित मनोरंजन जगत को भी प्रभावित किया है. इस नये कर के तहत 100 रुपये से कम कीमत वाली टिकटों को 18 और उससे अधिक कीमत वाली टिकटों को 28 प्रतिशत के दायरे में रखा गया है.

सिनेमा टिकटों पर जीएसटी के साथ और राज्यों द्वारा कर लगाये जाने को लेकर मल्टीप्लेक्स चलानेवाले खासे असमंजस में हैं. तमिलनाडु सरकार ने तो जीएसटी के अलावा 100 रुपये से अधिक के सिनेमा टिकटों पर 58 प्रतिशत नगरपालिका कर भी लगा दिया है, जो बहुत अधिक है. इससे टिकट के दाम काफी बढ़ जायेंगे. यह महज एक उदाहरण है, ऐसा अन्य राज्यों में भी हो सकता है.

(विभिन्न रिपोर्टों पर आधारित)

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