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प्रधानमंत्री ने जो कहा, उसे करके दिखाया यह एक हिस्टोरिकल मोमेंट है

स्वतंत्रता आंदोलन के अप्रतिम नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत ताईवान में हवाई दुर्घटना में हुई या नहीं? वे 18 अगस्त, 1945 के बाद सोवियत संघ चले गये या भारत आकर किसी और परिचय के साथ रहने लगे? उनकी मौत दुर्घटना थी, या उनकी गुमशुदगी के पीछे कोई षड्यंत्र था? ये ऐसे सवाल हैं, […]

स्वतंत्रता आंदोलन के अप्रतिम नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत ताईवान में हवाई दुर्घटना में हुई या नहीं? वे 18 अगस्त, 1945 के बाद सोवियत संघ चले गये या भारत आकर किसी और परिचय के साथ रहने लगे? उनकी मौत दुर्घटना थी, या उनकी गुमशुदगी के पीछे कोई षड्यंत्र था? ये ऐसे सवाल हैं, जो आधुनिक भारत की सर्वाधिक उलझी हुई गुत्थियों में शुमार हैं.
इनके जवाब देने की कोशिशें भी कई सवाल पैदा कर गयी. गांव की चौपालों से शहर के नुक्कड़ों तक, इतिहासकारों से सरकारी तंत्र तक ये सवाल छाये हैं. इसलिए सरकारी अलमारियों में बंद नेताजी से संबंधित गोपनीय दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग वर्षों से होती रही है. पिछले वर्ष से बंगाल और केंद्र सरकार ने इस दिशा में ठोस पहल की. इसी कड़ी में शनिवार को प्रधानमंत्री ने बड़ी संख्या में दस्तावेजों को सार्वजनिक किया. प्रक्रिया जारी रहेगी.
इस कदम से न सिर्फ नेताजी के ज्ञात अंतिम वर्षों पर से परदा उठने की आस जगी है, बल्कि आधुनिक भारत के शोधार्थियों और इतिहासकारों के लिए भी ये दस्तावेज नयी सूचनाओं का माध्यम बन सकते हैं. नेताजी की गुमशुदगी और उसके बाबत विभिन्न चर्चाओं तथा दस्तावेजों के सार्वजनिक किये जाने की पहल पर केंद्रित है आज की यह विशेष प्रस्तुति…
रेणुका मालाकर
नेताजी की पौत्री
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 119वीं जयंती पर उनसे जुड़ी 100 गोपनीय फाइलों की डिजिटल प्रतियां सार्वजनिक की गयी हैं. अभी और भी फाइलें हैं, जिन्हें कुछ अंतराल के बाद सार्वजनिक किया जाना है. आज का दिन भारत के लिए एक ऐतिहासिक दिन है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को बता दिया है कि वह जैसा बोलते हैं, वैसा करके दिखाते हैं.
पिछली बार जब प्रधानमंत्री हमारे परिवार से मिले थे, तो उन्होंने आश्वासन दिया था कि वह 23 जनवरी, 2016 को नेताजी की जयंती पर उन फाइलों को सार्वजनिक करेंगे, जिसे लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे हैं. आज जब प्रधानमंत्री से हम लोग पूरे परिवार के साथ मिले हैं, तो उन्होंने कहा है कि यदि आपकी माताजी आज होतीं, तो वह बहुत ही खुश होतीं.
मेरी माताजी नेताजी की भतीजी थीं और वह इन रहस्यों पर से परदा उठने को लेकर व्याकुल थीं. काश! आज माताजी भी साथ होतीं. उनका देहांत एक जनवरी को ही हो गया. यदि आज वह होती तो मोदी सरकार के इस कदम से आज वह बहुत ही खुश होतीं और उन्हें यह सब देख कर काफी खुशी मिलती कि देर से ही सही, नेताजी की मौत के रहस्यों पर से परदा उठ रहा है.
जिन लोगों ने वर्षों तक उनकी मौत को रहस्य रहने दिया, उन्हें यह तो अब स्वीकार करना चाहिए कि नेताजी ने देशके लिए क्या किया और कुछ लोगों ने उनके साथ क्या किया. फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद सिर्फ हम लोग ही नहीं, देश के लोग भी इस विषय में हिसाब मांगेंगे. आखिर इतने दिनों तक नेताजी के रहस्य को छुपाने से किन लोगों को फायदा हो रहा था, अब यह भी लोग जानेंगे.
मैं किसी राजनीतिक पार्टी या किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लेना चाहती हूं. भारत की जनता समझदार है और अब जनता ही इस विषय पर सवाल करेगी.
इन फाइलों से बहुत सारे सवालों के जवाब मिलेंगे, लेकिन इसमें थोड़ा वक्त लगेगा. आज तो 100 फाइलों को ही सार्वजनिक किया गया है, अभी और 900 फाइलें सार्वजनिक होंगी. निश्चित रूप से इन सभी फाइलों को पढ़ना और उनके आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना इतना आसान नहीं होगा.
जब तक पूरी तरह से इन फाइलों को पढ़ा नहीं जायेगा, तब तक किसी एक-दो फाइलों के आधार पर किसी भी तरह का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी. समझने में थोड़ा वक्त लगेगा ही. हालांकि, हमें यह आशा है कि सारी फाइलों के पढ़ने के बाद घटना की जो सच्चाई है, उस पर लगाये जा रहे कयासों पर विराम लगेगा. फाइलों को पढ़ने के बाद हमें भी एक मार्ग मिलेगा और फिर उसी रास्ते पर हम लोग भी चलेंगे.
जो 70 सालों का रहस्य है, उसे नेशनल अर्काइव में संजोया जाना निश्चित तौर पर अच्छा कदम है. इतने सालों से लोग इस विषय पर चरचा कर रहे थे, लेकिन कुछ ठोस इस पर निकल कर नहीं आया था. जब मोदी जी पिछले साल अक्तूबर में हमारे पूरे परिवार से मिले थे, तब उन्होंने जो कहा था, उसे आज करके दिखाया. बहुत लोग बहुत कुछ कहते हैं, लेकिन उसे अंत तक ले जाना और अपने वायदे को पूरा करना यह साधारण बात नहीं है.
इस विषय में मोदी जी ने कहा कि यह हमारी ड्यूटी है. जब हमलोगों ने इसके लिए तारीफ की, तब भी उन्होंने ऐसा ही कहा कि यह उनका कर्तव्य है. इसलिए यह एक हिस्टोरिकल मोमेंट है. 13 अक्तूबर 2015 को जब मोदी जी हमारी माताजी शीला सेन गुप्ता से मिले थे, तबकी बात उन्हें आज भी याद है. उन्होंने कहा कि आज वह होती तो वह यह सब देखकर कितना खुश होती. पीएम के इस कदम से हमलोग बहुत खुश हैं. उनका शुक्रिया अदा करते हैं. पूरा परिवार उनका आभारी है.
एक बात और मैं बताना चाहूंगी कि इस खुलासे से सिर्फ नेताजी के परिवार को ही लाभ नहीं होगा, बल्कि इस विषय में जितने भी रिसर्चर लगे हैं, उन पर जितने भी आज तक शोध हुए हैं या हो रहे हैं, उन सभी को बल मिलेगा. पहले संदर्भ के नाम पर कुछ नहीं मिलता था. अनुमान के आधार पर बहुत कुछ बोला जाता रहा है, इस पर अब रोक लगेगी. कई गोपनीय फाइलों का हवाला दिया जाता था या फिर विदेश में बहुत सी चीजों के होने की बात बतायी जाती थी. उसी आधार पर रिसर्चर अपनी रिपोर्ट तैयार करते रहे हैं.
लेकिन अब जो चीजें आयेंगी, वह फूलप्रूफ होकर आयेंगी. पहले किसी के लिए यह विश्वास करना मुश्किल होता था कि सच में रिसर्चर जो बातें बता रहे हैं, क्या वह सही है भी या नहीं, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. नेशनल अर्काइव में अब भारत सरकार द्वारा सत्यापित संदर्भ है.
इसलिए मैं बार-बार कह रही हूं कि नेताजी के सच आने के बाद सिर्फ उनका परिवार ही नहीं, बल्कि पूरा देश लाभान्वित हुआ है और आगे भी होता रहेगा.
मेरा मानना है कि यह खुलासा, मीडिया, रिसर्चर, देश, आम जनता सभी के लिए बहुत ही अच्छा कदम है. मेरे नाना जी सुरेशचंद्र बोस ने 1956 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा था कि हमें बताइये कि नेताजी के विषय में आपको क्या पता है और आप कैसे मान रहे हैं कि वह जीवित हैं? तब जवाहर लाल नेहरू जी ने नाना जी के पत्र के जवाब में लिखा था कि उनके पास कुछ परिस्थितजन्य साक्ष्य हैं, जिसके आधार पर वह उनके जीवित न होने की बात मान रहे हैं.
लेकिन अन्य साक्ष्यों के लिए कांग्रेस ने इतने वर्षों तक सरकार में रह कर भी कुछ नहीं किया. आखिर क्यों? और आज जब नेताजी की 100 फाइलें सार्वजनिक होती हैं, तो कांग्रेस सार्वजनिक करने पर ही आरोप लगा रही है. कांग्रेस के इस आरोप पर मुझे कुछ भी नहीं कहना है. हमारा पूरा परिवार इस बात से खुश है कि नेताजी से जुड़े दस्तावेज को सार्वजनिक कर प्रधानमंत्री मोदी ने रहस्यों पर से परदा उठाने का काम किया है. इन दस्तावेजों का खुलासा करना कोई छोटीबात नहीं है.
जब मेरे नाना जी बोस पर एक किताब लिख रहे थे, तब उनके ऊपर दबाव बनाया गया था. जो सच नहीं था उस पर भी उनके हस्ताक्षर कराने के लिए दबाव बनाया गया था. निश्चित तौर पर पीएम मोदी के ऊपर भी दबाव रहा होगा, क्योंकि बार-बार यह बताया जाता था कि इन खुलासों के बाद विदेशों से संबंध खराब हो सकते हैं आदि. इसीलिए इसका क्रेडिट तो नरेंद्र मोदी को मिलना ही चाहिए.
बाकी दस्तावेजों के सामने आने के बाद स्थिति खुद-ब-खुद स्पष्ट हो जायेगी कि नेताजी ने देश के लिए क्या किया और देश के कुछ नेताओं ने उनके साथ कैसा सलूक किया. अब जनता खुद ही एक्सपलानेशन मांगेगी. क्योंकि पहले तो साफ तौर पर कह दिया जाता था कि आपको पता ही नहीं, लेकिन अब तो साक्ष्य उपलब्ध हो गया है.
मीडिया और जनता अब खुद ही सवाल करेगी. हम लोग बोस फैमिली की तीसरी पीढ़ी के हैं. इसीलिए घर में मौत से जुड़े रहस्य कब खुलेंगे, इसे लेकर बचपन से सुनते रहे हैं. आज उसका खुलासा हुआ है, तो हमें कितनी खुशी हो रही है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है.
– रेणुका मालाकार के नाना सुरेश चंद्र बोस सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई थे़ इनकी माताजी शीला सेन गुप्ता नेताजी के भतीजी थीं.
(अंजनी कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित)
नेताजी से जुड़ी फाइलों का सार्वजनिक होना
23 जनवरी, 2016
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय अभिलेखागार में नेताजी से संबंधित 100 फाइलों की डिजिटल कॉपी सार्वजनिक की. साथ ही, भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार ने नेताजी से संबंधित 25 फाइलों की डिजिटल प्रतियों को हर महीने सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराने की योजना बनायी है. इससे इन फाइलों को सुलभ कराये जाने के लिए लंबे समय से चली आ रही जनता की मांग पूरी हुई. साथ ही, इससे विद्वानों को नेताजी पर आगे और अनुसंधान करने में भी सुविधा होगी.
4 दिसंबर, 2015
प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा नेताजी से जुड़ी 33 फाइलों की पहली खेप सार्वजनिक की गयी और भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार को सौंप दी गयी. इसके बाद गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय ने भी अपने पास मौजूद संबंधि‍त संग्रह में शामिल नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया शुरू कर दी, जिन्हें बाद में भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार को स्थानांतरित कर दिया गया.
18 सितंबर, 2015
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नेताजी से जुड़ी 64 फाइलें सार्वजनिक कीं. इसी के बाद केंद्र सरकार के पास रखी फाइलों को भी सार्वजनिक करने की मांग तेज हो गयी थी.
जनता के लिए पहले से उपलब्ध
भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार को वर्ष 1997 में रक्षा मंत्रालय से इंडियन नेशनल आर्मी (आजाद हिंद फौज) से संबंधित 990 फाइलें प्राप्त हुई थीं और वर्ष 2012 में खोसला आयोग (271 फाइलें/ आइटम) और न्यायमूर्ति मुखर्जी जांच आयोग (759 फाइलें/ आइटम) से संबंधित कुल 1030 फाइलें/ आइटम गृह मंत्रालय से प्राप्त हुए थे. ये सभी फाइलें/ आइटम सार्वजनिक रिकॉर्ड नियम, 1997 के तहत जनता के लिए पहले से ही उपलब्ध हैं.
14 अक्तूबर, 2015 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नयी दिल्ली में अपने आवास, 7 रेसकोर्स रोड, पर नेताजी के परिवार के सदस्यों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात में घोषणा की थी कि भारत सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करेगी और उन्हें जनता के लिए सुलभ बनायेगी. इस मौके पर नेताजी के परिजनों ने प्रधानमंत्री को नेताजी का एक पोर्टेट सौंपा था.
रेनकोजी मंदिर में नेताजी की अस्थियां!
जापान की राजधानी तोक्यो में स्थित यह एक प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर है. वर्ष 1594 में स्थापित यह मंदिर बौद्ध स्थापत्य कला का दर्शनीय स्थल है. एक मान्यता के मुताबिक, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम सेनानी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां यहां सुरक्षित रखी हुई हैं. 18 सितंबर, 1945 को उनकी अस्थियां इस मंदिर में रखी गयीं थीं. दस्तावेजों के मुताबिक, नेताजी की मृत्यु इससे एक माह पूर्व 18 अगस्त, 1945 को ही ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में हो गयी थी.
अंत्येष्टि के एक माह पश्चात जब सुभाष चंद्र बोस का अस्थिकलश ताईहोकू से जापान लाया गया, तो मंदिर के प्रमुख पुजारी मोचीजुकी ने उसे मंदिर में सुरक्षित रखने का आदेश दिया था. बोस की ये अस्थियां मंदिर परिसर स्थित एक स्वर्णिम पैगोडा में रखी गयी हैं. उसी के बाहर सुभाष की एक छोटी सी प्रतिमा लगा दी गयी है, जिससे आगंतुकों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जा सके. इस तथ्य की पुष्टि भारत सरकार द्वारा गठित जीडी खोसला आयोग की रिपोर्ट में भी हो चुकी है.
बोस के प्रति अपनी निष्ठा रखनेवाले जापान के लोग यहां प्रत्येक वर्ष 18 अगस्त को नेताजी का बलिदान दिवस मनाते हैं और उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. जर्मनी में अपने पति प्रोफेसर फाफ के साथ रह रही सुभाषचंद्र बोस की एकमात्र पुत्री अनिता बोस फाफ के मुताबिक, उनके पिता की मृत्यु ताईपेन्ह में ही हुई थी और रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां उनके पिता की ही हैं.
हिंदू धर्म में दाह संस्कार करने के बाद अस्थियों को किसी पवित्र नदी में विसर्जित करने की परंपरा है. इसके साथ यह मान्यता भी है कि यदि कोई हिंदू किसी ऐसे स्थान पर मरे, जहां आस-पास कोई नदी न हो, तो उसकी अस्थियों को किसी पोटली में बांध कर पीपल के पेड़ पर लटका दिया जाता है या फिर पास के किसी मंदिर में रख दिया जाता है. उसके बाद परिवार के लोग उन अस्थियों को अपनी सुविधानुसार गंगा या किसी अन्य पवित्र नदी में प्रवाहित कर देते हैं. लेकिन, नेताजी के अस्थि-कलश के साथ ऐसा नहीं हुआ.
उनकी मृत्यु विमान दुर्घटना में हुई अथवा नहीं हुई, इस पर विवाद हो गया. इसकी जांच के लिए तीन आयोग बैठाये गये, पर नतीजा कुछ भी नहीं निकला. आखिरी, जस्टिस मुखर्जी आयोग ने 8 नवंबर, 2005 को रिपोर्ट सौंपी. 17 मई, 2006 को संसद में इस पर खूब बहस हुई और बताया गया कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई. साथ ही कहा गया कि रैंकोजी मंदिर में रखी जिन अस्थियों का संबंध सुभाषचंद्र से बताया जाता है, वे उनकी नहीं हैं. हालांकि, बाद में भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की वह रिपोर्ट खारिज कर दी.
कुछ बुद्धिजीवियों ने यह सुझाव दिया था कि जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी बोस की अस्थियां भारत मंगा ली जाये और उनकी पुत्री अनिता फाफ का डीएनए टेस्ट करा लिया जाये. इससे नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में हुई या नहीं, इस विवाद का अंत हो जायेगा. साथ ही पिता की अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने की उनकी पुत्री की इच्छा भी पूरी हो जायेगी. एक चैनल को दिये साक्षात्कार में अनिता अपनी यह इच्छा व्यक्त कर चुकी हैं.
कुछ भी नया नहीं है इन गोपनीय फाइलों में
आदित्य मुखर्जी
इतिहासकार, जेएनयू
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु का रहस्य अरसे से चर्चा का विषय रहा है. इस रहस्य से परदा उठाने के लिए समय-समय पर कई जांच आयोगों का गठन भी हुआ और उनकी रिपोर्टें भी आयीं, लेकिन ऐसा कुछ नया निकल कर नहीं आया, जिससे यह कहा जा सके कि रहस्य से परदा उठ गया है. बंगाल सरकार भी नेताजी से जुड़े कई दस्तावेजों काे सार्वजनिक कर चुकी है और केंद्र की माेदी सरकार ने भी नेताजी की जयंती के अवसर पर उनसे जुड़े सौ और दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है. लेकिन, मुझे यह नहीं लगता कि इन दस्तावेजों से भी नेताजी की मौत के बारे में नया कुछ निकलेगा.
नेताजी की बेटी अनीता बोस ने भी पिछले दिनों एक साक्षात्कार में बहुत जोर देकर कहा था कि नेताजी की मौत विमान हादसे में ही हुई थी और जो लोग यह कहते हैं कि नेताजी बाद के दिनों में अरसे तक गुमनामी बाबा बन कर जी रहे थे, यह बेहद ही मूर्खतापूर्ण बात है.
यह भी खबर आयी थी, जिसमें कहा गया था कि पंडित नेहरू नेताजी की वर्षों तक जासूसी करवाते रहे. मैं समझता हूं कि अपने महान नेताओं के बारे में इस तरह की बेतुकी बातें करना, कुछ ऐसे मूर्खतापूर्ण तरीके से इतिहास से छेड़छाड़ करना है, जिससे कि लोगों के बीच में यह संदेश जाये कि हमारे नेता आजादी के अांदोलन के समय अंगरेजों से नहीं, बल्कि खुद से ही लड़ रहे थे.
जिस पंडित नेहरू ने वकील का ड्रेस पहन कर सारे इंडियन नेशनल आर्मी यानी आजाद हिंद फौज के नेताआें का बचाव किया था, भला वह नेताजी की जासूसी क्यों करवायेंगे, यह अचंभे में डालनेवाली और कभी न विश्वास करनेवाली बात है. देश में कुछ ऐसे तत्व हैं, जिन्हें न तो इतिहास की समझ है और न ही उसके संदर्भों की कोई जानकारी है, वही इस तरह की अफवाहें फैला कर महान नेताओं को बदनाम करने की कोशिश करते रहते हैं.
ये ऐसे शातिर लोग हैं, जिनके हिसाब से यही लगता है कि पूरा का पूरा राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के हमारे महान नेता आपस में ही लड़ रहे थे. खैर, इनकी समझ पर अफसोस ही किया जा सकता है.
एक इतिहासकार होने के नाते मेरा मानना है कि बीते जमानों की सभी फाइलें हम सबके बीच खुली होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक इस्तेमाल के लिए किसी फाइल को किसी खास दिन-तारीख में सार्वजनिक किया जाना या उसे राजनीतिक नजरिये से देखना उचित नहीं है.
नेताजी से जुड़े इन दस्तावेजों को सार्वजनिक किया ही जाना चाहिए, या कहें तो अच्छा होगा कि इन्हें बहुत पहले ही सार्वजनिक हो जाना चाहिए था, ताकि किसी को इतिहास से छेड़छाड़ करने का कोई मौका न मिले. अभी जो केंद्र सरकार का कदम है, यह बेहद गैरजरूरी और राजनीतिक इस्तेमाल वाला कदम लगता है, क्योंकि अभी तक कोई फाइल ऐसी नहीं निकली, जिसके बारे में इतिहासकारों को न पता हो. ऐसा इसलिए भी कि पिछली तमाम जांचों में ये तमाम बातें पहले ही आ चुकी हैं. यह इतिहास का विषय है और इस पर शोध एवं चर्चाएं होनी चाहिए, लेकिन हमारी राजनीतिक विडंबना यह है कि इस पर निरर्थक और बेमतलब की राजनीति हो रही है.
दरअसल, केंद्र सरकार का यह कदम ‘नेहरू बनाम नेताजी’ करनेवाला का लगता है. भारत की किसी भी सरकार ने इतिहास में कोई फेरबदल नहीं किया है, लेकिन मौजूदा सरकार कर रही है. क्योंकि, पूरा का पूरा इतिहास इस सरकार में शामिल संघ की विचारधारा वाले लोगों के खिलाफ जाता है.
उनका कोई सकारात्मक इतिहास ही नहीं है, इसलिए वे इतिहास में अपनी जगह बनाने के लिए कभी पटेल बनाम नेहरू तो कभी नेहरू बनाम नेताजी की बातें कह कर लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं. राष्ट्रीय आंदोलन में इनकी कोई भूमिका तो थी नहीं, ले-देकर वीर सावरकर थोड़े सक्रिय थे, लेकिन जेल जाते ही उन्होंने भी अंगरेजों से माफी मांग ली. इसलिए इनको लगता है कि इतिहास को ही बदल दिया जाये.
इसी ऐतबार से उन्होंने इतिहास के महान लोगों को ढूंढना शुरू कर दिया है और उनकी शख्सियत को खराब बताना शुरू कर दिया है. कभी पटेल को ढूंढ लेते हैं, तो कभी भगत सिंह को ढूंढ लेते हैं, और अब उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ढूंढ लिया है, जिसके बहाने वे दूसरे के नेताओं को अपनाने की कवायद कर रहे हैं.
सुभाष चंद्र बोस हमारे देश के नायक थे. देश के लिए खुद को कुर्बान कर देनेवाला नायकत्व था उनका. हालांकि, नेताजी ने देश को आजादी दिलाने के लिए रास्ता गलत चुना था. अंगरेजों से लड़ने के लिए उन्होंने जर्मनी और जापान के साथ मिलकर मोर्चा खोला, जो गलत था. पर उनका उद्देश्य गलत नहीं था. दरअसल, हमने उनकी ऊर्जस्विता और अदम्य साहस को ही नायकत्व मान लिया, उनकी गलतियों पर कोई चर्चा ही नहीं की. लेकिन इतिहास तो इतिहास है, जो घटित हुआ है, उस सच से मुंह नहीं छिपाया जा सकता है.
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
नेताजी की मृत्यु का रहस्य
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी को एक नया रास्ता ढूंढ़ना था. उन्होंने रूस से मदद लेना तय किया था. 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की ओर जा रहे थे. इस सफर के दौरान वे लापता हो गये. पांच दिनों बाद 23 अगस्त, 1945 को जापान रेडियो ने बताया कि सैगोन में नेताजी एक बड़े बमवर्षक विमान से आ रहे थे और 18 अगस्त को ताइहोकू हवाई अड्डे के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया.
विमान में उनके साथ सवार जापानी जनरल शोदेई, पायलट समेत कई अन्य लोग भी मारे गये. बताया गया कि नेताजी गंभीर रूप से जल गये थे, उन्हें ताइहोकू सैनिक अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया. कर्नल हबीबुर्रहमान के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार ताइहोकू में ही कर दिया गया. सितंबर के मध्य में उनकी अस्थियां टोकियो के रैंकोजी मंदिर में रख दी गयीं.
हकीकत का पता लगाने के प्रयास : भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त दस्तावेज के अनुसार, नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में रात 21.00 बजे हुई थी.
आजादी हासिल होने के बाद भारत सरकार ने इस घटना की जांच करने के लिए 1956 और 1970 में आयोग का गठन किया. दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये. लेकिन, जिस ताइवान की भूमि पर यह दुर्घटना होने की खबर थी, उस देश की सरकार से इन दोनों आयोगों ने कोई बात नहीं की. वर्ष 1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया. वर्ष 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटना नहीं हुई थी. 2005 में मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें उन्होंने कहा कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं है.
लेकिन, भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया.सुने जाते रहे हैं रहस्यमयी किस्से : 18 अगस्त, 1945 को नेताजी कहां लापता हो गये और आगे उनका क्या हुआ, यह भारतीय इतिहास का अनुत्तरित रहस्य बन गया है. देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करनेवालों की कमी नहीं है. फैजाबाद के गुमनामी बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ तक में नेताजी के होने को लेकर कई दावे पेश किये गये, लेकिन इन सभी की प्रामाणिकता संदेह के दायरे में है.
ब्रिटेन की वेबसाइट का नया खुलासा : ब्रिटेन की एक वेबसाइट ने ताइवान के एक अधिकारी द्वारा दिया सबूत जारी किया है, जिसमें दावा किया गया है कि उसने 1945 में विमान हादसे में नेताजी की मौत के बाद उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार कराया था.
यह सबूत यूके फॉरेन ऑफिस फाइल नंबर एफसी 1852…6 में रखा है और यह 1956 में दिया गया सबूत है. यह उन कुछ अंतिम दस्तावेजों में शामिल है, जिन्हें वेबसाइट की ओर से अभी जारी किया जाना है. वेबसाइट की स्थापना यह साबित करने के लिए की गयी है कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को ताइपेई में एक हवाई पट्टी के बाहर विमान हादसे में हुई थी.
मौत के रहस्य से परदा उठाने के लिए गठित जांच समितियां
1. फीगेस रिपोर्ट, 1946
बोस की मौत या लापता होने से संबंधित कई तरह की चर्चाओं के दबाव में लॉर्ड माउंटबेटन के नेतृत्ववाली सुप्रीम एलाउड कमांड, साउथ-इस्ट एशिया ने कर्नल जॉन फिगेस को पूरे मसले की जांच की जिम्मेवारी दी.
इस इंटेलिजेंस अधिकारी ने 25 जुलाई, 1946 को अपनी रिपोर्ट दे दी जो कि गोपनीय रखी गयी. यह रिपोर्ट तत्कालीन भारत सरकार के इंडियन पॉलिटिकल इंटेलिजेंस (आइपीआइ) के तहत दी गयी थी. इतिहासकार लियोनार्ड ए गॉर्डन ने 1980 के दशक में फिगेस का साक्षात्कार लिया था, जिसमें उन्होंने इस रिपोर्ट को लिखने की बात स्वीकार की.
वर्ष 1997 में ब्रिटिश सरकार ने अधिकतर आइपीआइ फाइलों को ब्रिटिश लाइब्रेरी के इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड्स में आम लोगों के देखने के लिए रखा था, पर उनमें फिगेस रिपोर्ट शामिल नहीं था. कुछ समय के बाद किसी अज्ञात व्यक्ति ने यूरोपीय मैनुस्क्रिप्ट कलेक्शन के तहत इस रिपोर्ट की एक फोटोकॉपी उपलब्ध करायी.
इतिहासकार गॉर्डन के अनुसार यह फाइल या तो खुद फिगेस ने दी होगी, जिनकी मत्यु 1997 में हुई, या फिर द्वितीय विश्व युद्ध में भारत में सक्रिय रहे गुप्तचर अधिकारी ह्युग टोये ने उपलब्ध करायी होगी. टोये ने 1959 में इंडियन नेशनल आर्मी और बोस पर एक किताब भी लिखी थी. गॉर्डन ने इस रिपोर्ट के निष्कर्ष को अपनी किताब में लिखा है. इसमें कहा गया है कि प्रत्यक्षदर्शियों और महत्वपूर्ण गवाहों से पूछताछ के आधार पर यह सिद्ध होता है कि 18 अगस्त, 1945 को ताइहोकु मिलिट्री हॉस्पिटल में स्थानीय समयानुसार शाम पांच से आठ बजे के बीच सुभाषचंद्र बोस की मौत हुई थी.
उनकी मृत्यु का कारण जलने और आघात से हृदय का काम करना बंद कर देना था. हवाई दुर्घटना में बचे दो लोगों से गॉर्डन ने भी बात की. फिगेस की रिपोर्ट और लियोनार्ड गॉर्डन के शोध से चार तथ्य सामने आये :
– ताइहोकु एयरपोर्ट पर 18 अगस्त को जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ था और उसमें सुभाष बोस भी एक यात्री थे.
– उसी दिन बोस की मत्यु नजदीक के एक सैन्य अस्पताल में हो गयी थी.
– बोस का अंतिम संस्कार ताइहोकु में हुआ था.
– बाद में उनकी अस्थियां टोक्यो ले जायी गयीं.
2. शाहनवाज कमिटी, 1956
अपुष्ट चर्चाओं और अफवाहों को शांत करने के इरादे से भारत सरकार ने 1956 में इंडियन नेशनल आर्मी के वरिष्ठ अधिकारी और तत्कालीन सांसद शाहनवाज खान के नेतृत्व में तीन सदस्यीय कमिटी की स्थापना की.
भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी एसएन मैत्रा (पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा नामांकित) और नेताजी के बड़े भाई सुरेशचंद्र बोस इसके दो अन्य सदस्य थे. इस कमिटी ने 1956 में अप्रैल से जुलाई के बीच भारत, जापान, थाईलैंड और वियतनाम में 67 गवाहों से बात की जिनमें उस जहाज दुर्घटना में बच गये सभी लोग तथा नेताजी का उपचार करनेवाले चिकित्सक भी शामिल थे. जहाज में बोस के साथ बैठे हबीब उर रहमान से भी कमिटी ने पूछताछ की थी.
बंटवारे के बाद रहमान पाकिस्तान चले गये थे. कमेटी के दो सदस्यों-खान और मैत्रा-ने निष्कर्ष निकाला कि बोस की मत्यु हवाई दुर्घटना में हो गयी थी, लेकिन नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस ने प्रारंभिक रिपोर्ट पर हस्ताक्षर के बाद अंतिम रिपोर्ट पर सहमति देने से इनकार कर दिया. उन्होंने असंतोष जताते हुए नोट लिखा. उस नोट में कमेटी के अन्य सदस्यों, कर्मचारियों पर कुछ कागजात छुपाने के आरोप लगायेतथा कमिटी को तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा निर्देशित बताया. उन्होंने बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधानचंद्र रॉय और अन्य सदस्यों पर दबाव डालने का आरोप भी लगाया.
3. खोसला कमीशन, 1970
भारत सरकार ने 1970 में नेताजी के ‘लापता’ होने की जांच के लिए एक नया आयोग गठित किया. पिछली कमिटी के विवाद को देखते हुए इस आयोग में एक ही सदस्य रखा गया.
जांचकर्ता पंजाब उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश जीडी खोसला थे. अन्य व्यस्तताओं के कारण खोसला अपनी रिपोर्ट 1974 में जमा कर सके. इतिहासकार गॉर्डन ने इस रिपोर्ट पर लिखा है कि न्यायाधीश खोसला बताते हैं कि कई संबंधित कहानियां अच्छे उद्देश्यों से प्रेरित नहीं हैं और उनके पीछे निहित राजनीतिक स्वार्थ हैं या फिर वे चर्चा में बने रहना चाहते हैं. शोलापुर स्थित सेंट्रल बैंक के एक एजेंट ने तो यहां तक कहा कि वह अपने बदन को रेडियो की तरह बना लेता है और उसे सुभाष बोस से सीधे संदेश प्राप्त होते हैं.
4. मुखर्जी कमीशन, 1999-2005
एक अदालती आदेश के बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एमके मुखर्जी की अध्यक्षता में आयोग गठित किया, जिसने विभिन्न देशों से जुटायी गयी सैकड़ों फाइलों का अध्ययन किया. जापान, रूस और ताइवान की यात्रा की.
मुखर्जी ने निष्कर्ष दिया कि हवाई दुर्घटना के सिद्धांत को नहीं माना जा सकता. जापानियों तथा हबीब उर रहमान की जानकारी में बोस को सुरक्षित सोवियत संघ ले जाने की एक गोपनीय योजना थी. कमीशन ने यह भी कहा कि तोक्यो के रेनकोजी मंदिर में रखी अस्थियां बोस की नहीं, एक जापानी सैनिक इचिरो ओकुरा की हैं. मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट आठ नवंबर, 2005 को जमा की जिसे 17 मई, 2006 को संसद के पटल पर रखा गया. सरकार ने इस आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया था.
Prabhat Khabar Digital Desk
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