11 महीने का कार्यकाल, 13 विदेश यात्राएं, जानिये क्या हुआ हासिल

Updated at : 19 Apr 2015 5:34 AM (IST)
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11 महीने का कार्यकाल, 13 विदेश यात्राएं, जानिये क्या हुआ हासिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 11 महीने के कार्यकाल में ही 13 विदेश यात्राएं और कई शासनाध्यक्षों की मेजबानी कर चुके हैं. भारत में निवेश बढ़ाने और तकनीक व कौशल को आमंत्रित करने के उद्देश्य से की जानेवाली इन यात्राओं की हालिया कड़ी में वे फ्रांस, जर्मनी और कनाडा गये थे, जहां उन्होंने सामरिक, आर्थिक और […]

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 11 महीने के कार्यकाल में ही 13 विदेश यात्राएं और कई शासनाध्यक्षों की मेजबानी कर चुके हैं. भारत में निवेश बढ़ाने और तकनीक व कौशल को आमंत्रित करने के उद्देश्य से की जानेवाली इन यात्राओं की हालिया कड़ी में वे फ्रांस, जर्मनी और कनाडा गये थे, जहां उन्होंने सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व के समझौते किये हैं.
इन देशों में मोदी के उत्साहजनक स्वागत और द्विपक्षीय संबंधों की दिशा में हुई पहलों से उम्मीदें बंधी हैं, पर यह भी आवश्यक है कि इस दिशा में निरंतर प्रयास होते रहें. फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद व परमाणु ऊर्जा में सहयोग, जर्मनी से निवेश की आशा तथा कनाडा से यूरेनियम की आपूर्ति और शिक्षा में सहयोग इन यात्राओं की उपलब्धि हैं. त्रिदिवसीय यात्रा का आकलन करती समय की प्रस्तुति..
निवेश और तकनीक हस्तांतरणसे भारत को होगा फायदा
कमर आगा
विदेश मामलों के जानकार
भारत ने काफी समय बाद रेलवे के विकास को प्राथमिकता की सूची में रखा है. फ्रांस और कनाडा से रेलवे के क्षेत्र में कई अहम समझौते हुए. रेलवे के विकास से भारत में विकास की गति को मजबूती मिलना तय है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस, जर्मनी और कनाडा की यात्रा मोटे तौर पर पूर्व विदेश यात्राओं की तरह ही है. उनकी विदेश यात्राओं का दो मकसद है. पहला विदेशी पूंजी निवेश को बढ़ावा देना और दूसरा तकनीक का हस्तांतरण. उनकी स्पष्ट सोच है कि विदेशी कंपनियां भारत में पूंजी निवेश करने के साथ ही यहीं पर उत्पाद बनाये, इससे रोजगार के अवसर बढ़ेगे. यह दीर्घकालिक योजना है.
यूरोपीय देश और अमेरिका भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके पास पूंजी और तकनीक दोनों है.
इसे लाने की कोशिश के तहत ही फ्रांस, जर्मनी और कनाडा की यात्रा की गयी. इन देशों के दौरे के दौरान कई अहम समझौते पर हस्ताक्षर भी किये गये. फ्रांस के साथ वर्षो से लटके राफेल लड़ाकू विमान की खरीद को लेकर समझौता हुआ. 36 राफेल विमान सीधे फ्रांस सरकार से खरीदने पर सहमति बनी. वर्ष 2007 में ही 126 राफेल विमान खरीदने का समझौता हुआ था, लेकिन कीमतों को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी.
फ्रांस सरकार से सीधे विमान खरीदने से इसकी कीमत भी कम होगी और इसे बनानेवाली कंपनी शेष विमान भारत में बनायेगी. फ्रांस परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में काफी आगे है. महाराष्ट्र के जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाने पर सहमति बनी. काफी समय पहले समझौता होने के बावजूद इसे लेकर संशय की स्थिति बनी हुई थी. प्रधानमंत्री ने इसे दूर करने में सफलता हासिल की है.
घरेलू मोरचे पर विरोध को कम करने के लिए फ्रांस की कंपनी अरेवा ने लार्सन एंड टुबरे के साथ समझौता किया है. भारत में स्मार्ट सिटी बनाने और रेल के आधुनिकीकरण में भी फ्रांस सहयोग करेगा. भारत चाहता है कि रक्षा क्षेत्र में उत्पादन हमारे देश के अंदर ही हो. इसे लेकर भी फ्रांस से समझौता किया गया. परमाणु व्यापार के क्षेत्र में कई अहम मुद्दों पर सकारात्मक बातचीत हुई.
भारत के लिए ऊर्जा और रेल काफी अहम हैं. जर्मनी के साथ ऊर्जा, कौशल विकास और विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी. वहीं कनाडा भारत को 3 हजार मिट्रिक टन यूरेनियम देने को तैयार हो गया है. कनाडा रेलवे के आधुनिकीकरण में भी भारत को सहयोग देगा, लेकिन इन मुद्दों पर अभी बातचीत का दौर जारी है.
भारत को तत्काल परमाणु ऊर्जा मिल जायेगी, लेकिन कई क्षेत्रों में सहयोग को लेकर बातचीत का लंबा दौर चलेगा. लेकिन निवेश और तकनीकी हस्तांतरण के बीच इन देशों की भी अपनी मांगें होती है. वे चाहते हैं कि उन्हें भारत में सस्ती जमीन मिले, करों में छूट दी जाये. ये देश कई क्षेत्रों में एफडीआइ की सीमा बढ़ाना चाहते हैं. भारतीय संदर्भ में उनकी मांगों को पूरा करना मुश्किल है.
भारत खेती प्रधान देश है और जमीन को लेकर यहां के लोगों की सोच यूरोपीय देश के लोगों से अलग है. प्रधानमंत्री मोदी इन दिक्कतों को दूर करने की कोशिश करने में लगे हुए है. भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सरकार पेशोपेश में फंसी है, क्योंकि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है. उसी प्रकार श्रम सुधार जैसे जटिल मसले हैं. इसका तात्कालिक समाधान मुश्किल है. इन सबके बीच सरकार विदेशी पूंजी लाने और औद्योगिक विकास को बढ़ाने के लिए काम कर रही है. देश में मैन्युफरिंग क्षेत्र के विकास से रोजगार के मौके बढ़ेगे.
सरकार कई देशों के साथ संबंधों को मजबूत कर बदलाव लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन दिक्कत यह है कि लोकतंत्र में बदलाव आने में समय लगता है. प्रधानमंत्री मोदी की तीन देशों की यात्रा आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक तौर पर सफल कही जा सकती है. तीनों देशों के साथ आर्थिक और सामरिक क्षेत्र में कई अहम समझौते किये गये. प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ के सपने को साकार करने की दिशा में फ्रांस और जर्मनी से सहयोग की उम्मीद बंधी है. पूंजी निवेश के साथ ही तकनीक हस्तांतरण से ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती मिलेगी और भारत मैन्युफैरिंग क्षेत्र का हब बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है.
अच्छी बात यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर आती दिख रही है और यूरोपीय देशों का भरोसा भारतीय बाजार पर बढ़ रहा है. भारत ने काफी समय बाद रेलवे के विकास को प्राथमिकता की सूची में रखा है. फ्रांस और कनाडा से रेलवे के क्षेत्र में कई अहम समझौते हुए. रेलवे के विकास से भारत में विकास की गति को मजबूती मिलना तय है. कुल मिलाकर प्रधानमंत्री की तीन देशों की यात्रा कई मायनों में सफल कही जा सकती है.
(विनय तिवारी से बातचीत पर आधारित)
हर दौरे के साथ बेहतर भारत की उम्मीद
शशांक
पूर्व विदेश सचिव
मोदी न सिर्फ राष्ट्राध्यक्षों और राष्ट्र के स्तर पर बेहतर संबंध बना रहे हैं, बल्कि वे वहां के नागरिकों पर भी अपना प्रभाव छोड़ रहे हैं. हरेक दौरे में उनकी कोशिश है कि वहां के नागरिकों के मन में, खासकर विदेशी मूल के भारतीयों के मन में भारत की बेहतर छवि गढ़ी जाये. सरकार हरेक स्तर पर भारत की छवि निखारने की कोशिश कर रही है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फ्रांस, जर्मनी और कनाडा का नौ दिनी दौरा कई मसलों में काफी महत्वपूर्ण रहा है. इन दौरों के कई सकारात्मक पहलू हैं. सबसे बड़ी बात है कि यदि किसी भी देश में कोई भी राष्ट्राध्यक्ष जाता है, इससे यह साफ जाहिर है कि इन देशों के साथ हमारे बेहतर संबंध हैं और मौजूदा संबंध को और बेहतर बनाने की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं.
प्रधानमंत्री के इन देशों के दौरे को देखें तो सामरिक साङोदारी, मेक इन इंडिया, निवेश को बढ़ावा देने, व्यापारिक हितों को आगे ले जाने, स्किल इंडिया बनाने, डिजिटल डिवाइड को पाटने और वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को गढ़ने, मजबूत करने और संवारने के रूप में देखा जा सकता है.
यदि फ्रांस दौरे की बात करें तो दोनों देशों के बीच हुए समझौते हमें आगे चलकर और मजबूती प्रदान करेंगे. वहां राफेल लड़ाकू विमान खरीद को लेकर समझौता हुआ. ऐसा समझौता पहले भी हुआ था, लेकिन कुछ कारणों से समझौते को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका. इस बार के मोदी के दौरे में 36 राफेल विमान सीधे फ्रांस सरकार से खरीदने के लिए दोनों देशों के बीच करार हुआ है.
महत्वपूर्ण यह है कि दोनों देशों की सरकारों में इस बात पर सहमति बनी है, इसलिए अड़चन भी नहीं है और विमानों की कीमत भी कम होगी. इससे मोदी सरकार के महत्वपूर्ण कार्यक्रम मेक इन इंडिया को मजबूती मिलेगी, क्योंकि यह कंपनी भारत में भी विमान का निर्माण करेगी.
इसलिए सैन्य क्षेत्र में और रणनीतिक तौर पर इसे काफी अच्छा कदम माना जायेगा. इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं, जैसे महाराष्ट्र के जैतापुर में परमाणु संयंत्र पर जो गतिरोध था, खत्म हुआ और परमाणु व्यापार के दिशा में हम आगे बढ़ेंगे. स्मार्ट सिटी, रेल आधुनिकीरण, अरेवा के साथ लार्सन टुब्रो समझौते को इस दौरे की उपलब्धि मानी जा सकती है.
अगर हम नरेंद्र मोदी के जर्मनी दौरे की बात करें तो यहां भी मेक इन इंडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही. जर्मनी के साथ ऊर्जा, कौशल विकास और विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी.
साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता, भारत के अफगानिस्तान में हित को आगे बढ़ाने और वहां सुरक्षा संबंधी चिताओं पर सकारात्मक चर्चा को दौरे की सफलता के रूप में देखा जा सकता है.
यदि मोदी के कनाडा दौरे की बात करें तो कनाडा सरकार भारत को 3 हजार मिट्रिक टन यूरेनियम देने को तैयार हो गया है. और हमें इस साल के अंत तक यूरेनियम मिल जायेगा. परमाणु उर्जा के क्षेत्र में आपसी सहभागिता तेजी से बढ़ने की उम्मीद है. वहां के परमाणु उर्जा कार्यक्रमों में हमारे वैज्ञानिक जुड़े हैं. यदि टेक्नोलॉजी का आदान-प्रदान होता है, तो इससे भारत को काफी फायदा होगा.
न सिर्फ परमाणु उर्जा के क्षेत्र में बल्कि हमारे अपने जो उर्जा के संसाधन हैं उसमें भी काफी फायदा होगा. परमाणु तकनीक के साथ परंपरागत कोल ऊर्जा को बेहतर बनाने में काफी मददगार हो सकता है. मोदी जिस तरह से रेलवे के आधुनिकीरण की दिशा में प्रयासरत हैं, उसमें कनाडा ने भारत को रेलवे के आधुनिकीकरण में सहयोग का भरोसा दिया है. पर्यटन के क्षेत्र में वीजा ऑन अराइवल की बात हुई है. इससे पर्यटन बढ़ेगा.
प्रधानमंत्री ने तीनों देशों के दौरे में न केवल उन देशों के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की दिशा में प्रयास किया है बल्कि वे व्यक्तिगत स्तर पर इन राष्ट्राध्यक्षों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं.
उनकी यह खासियत न सिर्फ तीन देशों के लिए है, बल्कि अब तक जिन भी देशों का दौरा उन्होंने किया है, उसमें उनकी यह कोशिश रही है. ऐसे प्रयासों से आगे चल कर विदेशों में मजबूत नेता के रूप में पहचान विकसित होगी और इसका फायदा निश्चित रूप से देश को मिलेगा.
मोदी न सिर्फ राष्ट्राध्यक्षों और राष्ट्र के स्तर पर बेहतर संबंध बना रहे हैं, बल्कि वे वहां के नागरिकों पर भी अपना प्रभाव छोड़ रहे हैं. हरेक दौरे में उनकी कोशिश है कि वहां के नागरिकों के मन में, खासकर विदेशी मूल के भारतीयों के मन में भारत की बेहतर छवि गढ़ी जाये.
उनकी कोशिश है कि सरकार के साथ बेहतर संबंध के साथ नीतिगत स्तर पर संबधों को मजबूती मिले और नागरिकों के स्तर पर संबंध बढ़ा कर भारत में निवेश को प्रोत्साहित किया जा सके. जब विदेशों में बसे भारतीयों के मन में यह बात बैठ जायेगी कि भारत निवेश के लिए बेहतर जगह है तो वे खुद ब खुद खींचे चले आयेंगे और अपने साथ ही कई अन्य निवेशकों को भी लायेंगे.
कनाडा में 10 लाख भारतीय हैं.
इसलिए इन भारतीयों से बातचीत करते हुए मोदी संबंधों की चर्चा कर रहे हैं. कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़ा निवेशक उसी जगह पर निवेश करता है जहां उसे सारी सुविधाएं मिलें. उसे लाभ हो. जब लाभ की स्थिति होती है तो वह बना रहता है, लेकिन जैसे ही स्थिति विपरीत होती है वह चला जाता है. जबकि विकास के लिए लांग टर्म तक कॉरपोरेट इंटरेस्ट को बनाये रखना जरूरी है. लंबे समय के लिए साङोदारी की दरकार है.
ऐसे में यदि विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोग देश में निवेश करते हैं तो वे निवेशक होने के साथ ही देश के प्रति प्रेम रखनेवाले भी होंगे. वे देश की परिस्थति को अच्छी तरह से समझते हुए बहुआयामी स्तर पर निवेश करेंगे. साथ ही उनका सांस्कृतिक सामाजिक जुड़ाव भी होगा. ऐसे संबंध टिकाऊ होते हैं और इसका व्यापक प्रभाव अर्थव्यवस्था के साथ ही समाज पर होता है.
न सिर्फ कनाडा, जर्मनी, फ्रांस बल्कि दुनिया के कोने-कोने में बसे भारतीय एक निवेशक की तरह और आप्रवासी भारतीय की हैसियत से सरकार का काम आसान कर सकते हैं. यदि ये भारत की ओर देखने लगे तो हमारे देश में न सिर्फ औद्योगिक विकास होगा बल्कि पर्यटन भी बढ़ेगा.
इस तरह से देखें तो द्विपक्षीय रिश्ते हों या बहुपक्षीय, मोदी सरकार अपने विजन में स्पष्ट है. पूंजी निवेश के साथ ही तकनीक हस्तांतरण से मेक इन इंडिया को मजबूती मिलेगी और भारत मैन्युफैरिंग क्षेत्र का हब बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है. सरकार कोशिश कर रही है कि भारत को मैन्युफैरिंग हब बनाकर देश के प्रगति की ओर ले जाया जाये, और अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिले.
लेकिन निवेशकों की अपनी आशंकाएं भी होती हैं. जैसे भूमि अधिग्रहण के मसले पर सरकार अभी कोई निर्णय नहीं ले पायी है. इसको आगे बढ़ाने में सरकार को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पर रहा है.
इसके साथ ही दोहरे कराधान का मामला है. इन बुनियादी सवालों पर बाहरी देश भारत को देख रहे हैं, और विदेशों में बसे भारतीय नागरिक भी. मोदी अपनी ओर से हरसंभव प्रयास भी कर रहे हैं, यदि उनका प्रयास सफल होता है तो भारत में तीव्र प्रगति होगी.
भारत को यूएन में स्थायी सदस्यता दिये जाने पर भी कई देश आगे आ रहे हैं. लेकिन ये बातें इतनी जल्दी हल नहीं होती. जर्मनी और जापान के मामले में क्विक फिक्स हुआ था, लेकिन आगे जाकर खत्म हो गया. अगर सुरक्षा परिषद का विस्तार होगा तो उसमें और भी देशों को जगह दिया जाना है.
विदेश नीति कई स्तरों पर चलती है. उसमें द्विपक्षीय स्तर की वार्तायें होती हैं और बहुपक्षीय स्तर की वार्ता भी. सरकार हरेक स्तर पर अपने हितों को बिना प्रभावित किये विदेशों से बेहतर संबंध बनाने का लगातार प्रयास करती रही है. नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ अपने द्विपक्षीय स्तर के विदेशी दौरों में, बल्कि विदेशों से जुड़े मंचों जैसे आसियान इंडिया फोरम, ब्रिक्स जी 20 में पहचान बनायी है. कुल मिला कर सरकार हरेक स्तर पर भारत की छवि निखारने की कोशिश कर रही है.
(संतोष कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित)
कनाडा यात्रा (14 से 16 अप्रैल)
– कनाडा ने भारत को दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति पर सहमति दी है. 280 मिलियन डॉलर मूल्य का परमाणु ईंधन करार.
– ऊर्जा क्षमता बढ़ाने, तेल व गैस विकास और गैर-पारंपरिक ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना.
– भारत में स्वास्थ्य-संबंधी पांच अनुसंधानों के लिए 2.5 मिलियन कनैडियन डॉलर के निवेश पर सहमति.
– एअर कनाडा ने टोरांटो से नयी दिल्ली के लिए सीधी हवाई सेवा की घोषणा की है. माना जा रहा है कि यह निर्णय मोदी की यात्रा के बाद ही हुआ है.
– दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद और हिंसक अतिवाद के विरुद्ध संघर्ष में सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया है.
– भारत और कनाडा के बीच कृषि, वाहन उद्योग, उड़ान, कंस्ट्रक्शन, स्वास्थ्य सेवा, हाइड्रोकार्बन और सूचना तकनीक के क्षेत्र में कौशल-विकास के लिए भारत के राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद तथा 13 कनाडाई शैक्षणिक संस्थाओं व संबंधित कौशल परिषदों के बीच 13 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं.
रॉकस्टार की छवि ही काफी नहीं
कनाडा के दृष्टिकोण में मोदी का आधुनिकीकरण, विकास और विदेशी निवेश की पक्षधरता का एजेंडा भारत को प्रमुख व्यापारिक सहयोगी बना सकता है, बशर्ते वे अपने देश के केंद्र-निर्देशित और अतिशय संरक्षित अर्थव्यवस्था में खुलापन लाने के अपने वादे को पूरा कर सकें और आधिकारिक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकें.
भारत एक बहुत बड़ा बाजार है. उसकी जनसंख्या 1.2 बिलियन है, 350 मिलियन मध्यवर्ग है, ऐसी अर्थव्यवस्था है जो हमारी तुलना में तीन गुनी तेज गति से बढ़ रही है और वहां हमारे द्वारा बेची जानेवाली तकनीक और संसाधनों की बड़ी मांग की संभावना है. इस मांग में सूचना व संचार तकनीक, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर, तेल एवं गैस उत्पादन और बिजली उत्पादन के क्षेत्र में कनाडाई विशेषज्ञता शामिल हैं. महत्वपूर्ण कनाडाई संसाधनों में खाद्य, फर्टिलाइजर, खनिज आदि हैं. और अब इसमें यूरेनियम भी शामिल हो गया है.
फिर भी सहयोग के विकास की गति धीमी रही है. वर्ष 2009 में हमने तीन बिलियन डॉलर के थोड़े द्विपक्षीय व्यापार को इस वर्ष तक 15 डॉलर तक ले जाने का संकल्प किया था. ऐसा नहीं हो सका. पिछले वर्ष सिर्फ छह बिलियन का व्यापार ही हुआ, जबकि चीन के साथ यह 77 बिलियन डॉलर का था. और कनाडा-भारत मुक्त व्यापार समझौता अभी भी एक चाहत ही बना हुआ है. कनाडा की एक फील-गुड यात्र से कोई नुकसान नहीं है. लेकिन मोदी और उनकी हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी को व्यापार के लायक परिस्थितियों को बनाना होगा. रॉक स्टार की छवि हमेशा के लिए कारगर नहीं होती.
संपादकीय, द स्टार, कनाडा
जर्मनी यात्रा (12 से 14 अप्रैल)
निवेश के लिए आर्थिक सुधार जरूरी
– दोनों देशों के नेताओं द्वारा यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते का समर्थन
– संयुक्त बयान में शहरी विकास पर एक वर्किंग ग्रुप की स्थापना की जरूरत का उल्लेख
– प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भारत में निवेश के लिए जर्मन कंपनियों की सहूलियत के लिए विशेष व्यवस्था करने का आश्वासन, जैसा कि जापान और अमेरिका के लिए किया गया है.
– शैक्षणिक सहयोग को और सुदृढ़ करने पर बल.
– हैनोवर मेस 2015 में सार्वजनिक क्षेत्र की अनेक कंपनियों ने रूस, बुल्गारिया, जर्मनी और स्विट्जरलैंड की कंपनियों के साथ छह समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं.
फ्रांस यात्रा (9 से 12 अप्रैल)
– एल एंड टी एवं अरेवा के बीच समझौता : जैतापुर परमाणु परियोजना में स्थानीयकरण के द्वारा खर्च में कमी तथा इसकी वित्तीय व्यावहारिकता को बेहतर करने के संबंध में. इसमें तकनीक के हस्तांतरण और भारत के देशी परमाणु ऊर्जा उद्योग के विकास के लिए प्रावधान भी हैं.
– इसरो और सीएनइएस के बीच करार : भारतीय प्रक्षेपण यान पीएसएलवी के द्वारा 12 अक्तूबर, 2011 में छोड़े गये अंतरिक्ष यान से प्राप्त सूचनाओं के साझा उपयोग की अवधि दो वर्ष बढ़ा दी गयी है. इसके अलावा सेटेलाइट रिमोट सेंसिंग, सेटेलाइट कम्युनिकेशन और सेटेलाइट मेटियोरोलॉजी, अंतरिक्ष शोध आदि में सहयोग के लिए सहमति बनी.
– दोनों देशों के खेल एवं युवा मामलों के मंत्रलयों में समझौता- इस समझौता में खेलों को बढ़ावा देने, खेल स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, प्रबंधन की बेहतरी, भारत में फ्रांसीसी खेल संस्थान इंसेप की तर्ज पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स इन इंडिया की स्थापना आदि शामिल हैं.
– गैर-पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग : दोनों देश नवीन एवं गैर-पारंपरिक ऊर्जा के बढ़ाने और तकनीकों के आदान-प्रदान के लिए परस्पर सहयोग करेंगे. इनमें सौर, वायु, बॉयो ऊर्जा, समुद्री लहर व तरंग ऊर्जा क्षेत्र शामिल हैं.
– रेलवे प्रोटोकॉल : दोनों देश अर्ध-उच्च गति रेल और स्टेशनों के पुनरोद्धार के क्षेत्र में परस्पर सहयोग करेंगे.
– ऊर्जा क्षमता में वित्तीय सहयोग : इस समझौते में एनर्जी इफिसिएंसी सर्विसेज लिमिटेड को वित्त मुहैया कराने पर सहमति हुई है.
– सांस्कृतिक सहयोग : भारत और फ्रांस के सांस्कृतिक और संचार मंत्रलय सांस्कृतिक विरासत, संरक्षण, विरासत से संबंधित प्रशिक्षण आदि के क्षेत्र में आपसी सहयोग पर सहमति हुई है. पर्यटन को बढ़ावा देने पर भी दोनों देश रजामंद हुए हैं.
– छात्रों को फ्रांस में ठहरने की अवधि में बढ़ोतरी : अब दोनों देशों के 250 छात्र शिक्षा पूरी कर लेने के बाद दो वर्ष तक रुक सकते हैं. इससे उनके रोजगार और प्रशिक्षण में बहुत सहयोग मिलने की आशा की जा रही है.
त्न आयुर्वेद को प्रोत्साहन : भारत का आयुष मंत्रलय और फ्रांस का स्ट्रासबोर्ग विश्वविद्यालय फ्रांस में आयुर्वेद को लोकप्रिय बनाने और अनुसंधान में सहयोग पर सहमत हुए हैं.
– कौशल-विकास के क्षेत्र में समझौता : भारत के नेशनल स्किल डेवेलपमेंट एजेंसी तथा फ्रांस के नेशनल कमीशन फॉर वोकेशनल क्वालिफिकेशन कौशल-विकास के लिए सूचनाओं और ज्ञान के परस्पर आदान-प्रदान और प्रबंधन के लिए सहयोग पर सहमत हुए हैं.
– विज्ञान व तकनीक में परस्पर सहयोग के लिए समझौता : इस समझौते के तहत गणित, भौतिकी, सूचना एवं संचार, जल-संसाधन एवं पर्यावरण, जैव विज्ञान, खगोल शास्त्र, जलवायु, बॉयोटेक्नोलॉजी और ऊर्जा के क्षेत्र में साझा शोध और जानकारियों के आदान-प्रदान पर सहमति बनी है.
फ्रांस के साथ राफेल सौदा एक वरदान
फ्रांसीसी जहाज निर्माता कंपनी दसॉ से कई बिलियन यूरो के 36 लड़ाकू विमानों की भारत द्वारा खरीद पर फ्रांसीसी मीडिया ने राफेल को लेकर उत्साहजनक टिप्पणियां की है. इन तैयार जहाजों के लिए ऑर्डर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले शुक्रवार को अपनी पहली फ्रांस यात्र के दौरान दिया था.
इस घोषणा से इस सौदे के भविष्य को लेकर पैदा हुई आशंकाओं को विराम लग गया है. यह सौदा 2012 में पहली बार तय हुआ था, लेकिन कीमतों को लेकर तथा भारत द्वारा इन अतिविकसित जहाजों के एक हिस्से को भारत में ही एसेंबल करने पर जोर देने के कारण यह लंबित पड़ा हुआ था. ला मोंद ने इसे ‘निर्यात के लिए जबर्दस्त वरदान’ कहते हुए रेखांकित किया कि दसॉ को अपने सबसे बड़े इस सौदे से पांच बिलियन यूरो से अधिक की कमाई होने की उम्मीद है.
ला मोंद की नजर में यह उपलब्धि फ्रांस के लिए बहुत खास है, जो विकास में ठहराव, बढ़ती बेरोजगारी और भारी कर्ज से जूझ रहा है. लिबरेशन को फ्रांसीसी वायु सेना में विकास की संभावनाएं दिख रही हैं. इस अखबार के अनुसार, भारत को राफेल जहाजों की बिक्री से रक्षा मंत्रलय का बजट मिलिट्री प्लानिंग बिल के तहत जून में होनेवाली समीक्षा बैठक में अधिक रखा जायेगा.
विलियम निबा, आरएफआइ, फ्रांस
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