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बुरा ना मानो होली है

Updated at : 06 Mar 2015 6:48 AM (IST)
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बुरा ना मानो होली है

दो पाटन के बीच ‘होली’ दिलों की तमाम दूरियां मिटा कर गले मिलने का पर्व है होली. इस मिलन में हंसी-ठिठोली में लिपटे रंग और गुलाल हैं, तो प्रेम और उलाहना का रस-राग भी है. इसलिए तो कहते हैं ‘बुरा न मानो होली है.’ रंगों के इस त्योहार से ठीक पहले हम आपके लिए लेकर […]

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दो पाटन के बीच ‘होली’
दिलों की तमाम दूरियां मिटा कर गले मिलने का पर्व है होली. इस मिलन में हंसी-ठिठोली में लिपटे रंग और गुलाल हैं, तो प्रेम और उलाहना का रस-राग भी है. इसलिए तो कहते हैं ‘बुरा न मानो होली है.’ रंगों के इस त्योहार से ठीक पहले हम आपके लिए लेकर आये हैं थोड़ा-सा व्यंग्य और थोड़ी-सी फुहारें, जो आपको गुदगुदायेंगे और हंसायेंगे भी. पढ़ें होली के मौके पर फैमिली की यह खास पेशकश.
रंग न रंगोली, इस बार अपनी होली बैरंग ही आगे-आगे होली. अट्ठाइस को अच्छे दिन का बजट था, छह की होली, आठ को महिला दिवस! हमारा छह न आठ हो पाया न अट्ठाइस, बस तीन-तेरह हो कर रह गया. दो पाटों के बीच फंसी हमारी स्थिति संत कबीर समान थी. गनीमत बस इतनी थी कि हम साबुत बच गये. दरअसल, हमारे फागुन का नास तो बजट आते-आते ही हो गया था. थोड़ी बहुत जो कसर बाकी थी, वह महिला दिवस ने पूरी कर दी. हमारे सूर्यमुख पर ग्रहण-सी उदासी थी और चंद्रमुखी पत्नी के चंद्रमुख पर महिला दिवस की खुमारी. होली को आना था वह आयी, उसने न राहू ग्रसित हमारे मुख की परवाह की और न ही पत्नी दिवस की खुमारी की.
बावजूद तमाम विषम परिस्थितियों के, फागुन की बयार ने हमारे अंतर्मन को झकझोरा, उसने करवट बदली, अंगड़ाई ली और हमें समझाया, ‘उदासी छोड़ मनुआ, होली है.’ बजट की उदासी कब तक ओढ़े रहोगे, उतार फेंको, होली है. अच्छे दिन आयें या न आयें, इससे फर्क क्या पड़ता है! ‘फील गुड’ के समान ‘अच्छे दिन’ फील तो कर ही सकते हो! कुछ न होते हुए भी सम्राट होने का अहसास तो किया ही जा सकता है! बचुआ, अहसास मन का भाव है, अहसास करो! अंतर्मन की बात हमारे बाह्य उदास मन को नहीं भायी. ‘बजट ने अपना बजट बिगाड़ दिया है, होली का रंग फीका पड़ गया है.’ उसने अपनी बात बतायी. अंतर्मन हंस दिया, अरे इसमें नया क्या है? बजट अच्छे दिन का हो या बुरे दिन का, आता ही बिगाड़ने के लिए है. बजट का अर्थ ही बिगाड़ना है. तू उदासी छोड़ होली खेल. अंतर्मन की बात सुन कमबख्त बाह्य मन बहकने लगा, होली के रंग में रंगने लगा.
उदासी त्याग, हमने पत्नी संग चिरौरी करने का मन बनाया. होली ‘गुलाल और गाल’ का त्योहार है, अत: हाथों में गुलाल लिये हम पत्नी के गालों की तरफ अग्रसर हुए और बोले,‘प्रिय होली है!’ पत्नी ने आंखें तरेरीं, आंखों ही आंखों में अखियन ते क्रोध की पिचकारी छोड़ी. हम सहम गये, सहसा ही अतीत के रंग में डूब गये. अरे, यह क्या! पिछली होली पर तो पत्नी ने ‘मोरी रंग दे अंगिया, कर दे धानी चुनरिया’ फाग का राग सुनाया था. इस बार क्यों ऊंगली छुआते ही चार सौ चालीस का करंट मारने लगी. होली पर भी क्यों आंखें दिखने लगी. हमने फिर साहस किया, हाथ आगे बढ़ाया, विरह और मिलन के मिश्रित रस में पगी पक्तियां गुनगुनायीं, ‘गुल हैं, चिराग रोशन कर दो. उदास फिजाओं में फागुन भर दो. कट न जाये यह रात यूं ही तन्हा, तन्हा रातों में यौवन भर दो.’ पत्नी ने फिर धमकाया,‘देखो जी! महिला दिवस है अब शोषण नहीं चलेगा. महिलाएं जागृत हो गयी हैं, अब हमारा हुकुम चलेगा. तुम्हारा नहीं.’ भूखे श्वान-समान हमने पत्नी के मुख की ओर निहारा.
पिछली होली तक पलाश के खिले फूलों के समान लगनेवाले पत्नी के गाल हमें दहकते अंगारों के समान प्रतीत हुए. हमारा सिर चकराया. सावधान की मुद्रा में स्तब्ध-से खड़े-खड़े हम सोचने लगे, ‘अरे, महिला दिवस आता तो प्रत्येक वर्ष था, किंतु, हमारा आशियाना उसके वॉयरस से प्राय: अछूता ही रहता था. लेकिन, इस बार स्वाइन फ्लू वॉयरस के समान उसके वॉयरस हमारे घर में भी प्रवेश कर गये.’
सोचते-सोचते माथे पर उतर आयी चिंता और विषाद की लकीरें पोंछी और अल्पमत की सरकार की तरह हम समझौते पर उतर आये और मिमियाते सुर में बोले, ‘झगड़ा किस बात का, प्रिय! हम न सही, तुम ही हमारा शोषण कर लो, किंतु जैसे भी हो होली के इस पावन पर्व पर हमारा जीवन धन्य कर दो!’
पत्नी जवाब में हमें खरबूजे और छुरी की कहावत सुनाने लगी. फिर घरेलू हिंसा विरोधी कानून के पहाड़े पढ़ाने लगी. हमें अचानक ही यह महिला दिवस ‘त्रिया दिवस’ जैसा नजर आने लगा. और धीरे-धीरे होली का बुखार भी उतरने लगा.
बुङो मन से हम पत्नी से कहने लगे, प्रिये! महिला दिवस आज ही क्यों, जब से तुमने हमारी कुंडली में प्रवेश किया है, हमारे जीवन में तो उसी पुण्य दिवस से महिला दिवस छाया है. कभी दहेज विरोधी कानून, तो कभी घरेलू हिंसा विरोधी कानून. प्रत्येक कानून हमारे वैवाहिक जीवन में राहू की मानिंद छाया है. तुम समान अधिकार की मांग करती हो, कंधे से कंधा मिला कर चलने का दंभ भरती हो. भूले से भी कंधे से कंधा छू जाये तो ईव टीजिंग का आरोप लगाती हो. अरे, पुरुष-पुरुष का दुश्मन हो गया है. पुरुष प्रधान समाज में पुरुष हो कर स्त्री प्रधान कानून बनाता है! अरे, विश्व के पुरुषों एक हो जाओ, भ्रूण हत्या रोको, महिलाओं की संख्या बढ़ाओ. खुद अल्पमत हो जाओ और फिर अल्पमत होने का लाभ उठाओ, प्रतिदिन होली मनाओ. बुरा न मानो होली है!
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