सैन्य शैली में स्कूली प्रशिक्षण, चीन का एक स्कूल जहां शिक्षा के अलावा हर चीज वजिर्त

Updated at : 16 Jan 2015 5:38 AM (IST)
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सैन्य शैली में स्कूली प्रशिक्षण, चीन का एक स्कूल जहां शिक्षा के अलावा हर चीज वजिर्त

चीन के बारे में हम अक्सर काफी कुछ सुनते-पढ़ते आये हैं. इसी क्रम में आज पढ़ें चीन के एक ऐसे स्कूल के बारे में जहां बड़े विश्वविद्यालयों में प्रवेश दिलाने के लिए बच्चों को तैयार किया जाता है. सेना की शैली में कठोर अनुशासन के दम पर चलनेवाले इस स्कूल में मोबाइल, इंटरनेट समेत हर […]

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चीन के बारे में हम अक्सर काफी कुछ सुनते-पढ़ते आये हैं. इसी क्रम में आज पढ़ें चीन के एक ऐसे स्कूल के बारे में जहां बड़े विश्वविद्यालयों में प्रवेश दिलाने के लिए बच्चों को तैयार किया जाता है.
सेना की शैली में कठोर अनुशासन के दम पर चलनेवाले इस स्कूल में मोबाइल, इंटरनेट समेत हर वह चीज वजिर्त है जो शिक्षा से जुड़ी नहीं है.
चीन के पूर्वी हिस्से में आन्हुई प्रांत स्थित है. इसमें माओ तान चांग नाम का एक छोटा- सा शहर बसा है. बमुश्किल पांच हजार लोगों की आबादीवाले इस शहर की खासियत यह है कि इसे दुनिया के सबसे सघन शैक्षणिक संस्थानों के गढ़ में से एक जाना जाता है.
यहां की स्थानीय जनसंख्या से चार गुणी ज्यादा विद्यार्थियों की संख्यावाले माओ तान चांग हाइ स्कूल के बच्चे रात-दिन की कड़ी मेहनत के साथ ‘गाओकाओ’ प्रतियोगिता के लिए तैयारी करते हैं.
‘गाओकाओ’ चीन में राष्ट्रीय स्तर पर बड़े कॉलेजों में प्रवेश के लिए आयोजित होनेवाली प्रतियोगिता परीक्षा है, जिसके लिए कड़ी तैयारी की जरूरत पड़ती है.
इनमें से अधिकांश विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं और उनके मां-बाप यह भली-भांति जानते हैं कि ‘गाओकाओ’ में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद उनके बच्चों के लिए संभावनाओं के नये द्वार खुल जायेंगे. माओ तान चांग इन बच्चों के प्रयास में पठन-पाठन के अनुकूल माहौल मुहैया करा कर उनके भीतर सघन शिक्षा की भावना को जगाता है. इस प्रयास में स्कूल की रणनीति स्पष्ट है, हर वह चीज जो शिक्षा से जुड़ी नहीं है वह यहां प्रतिबंधित है.
इसलिए यहां के बच्चों के लिए टीवी देखना, इंटरनेट और सेल फोन के इस्तेमाल की मनाही है. और तो और डेटिंग पर भी सख्त पाबंदी है. इस स्कूल के बच्चों के बेडरूम्स में पावर सॉकेट ही नहीं हैं, ताकि कोई बच्च चोरी-छिपे भी कोई गैजेट इस्तेमाल न कर पाये. सिक्योरिटी गार्डस और क्लोज सर्किट कैमरों की नजरें इसके कैंपस पर हर पल पहरा देती हैं.
इस स्कूल में सारे पुरुष शिक्षक ही बहाल हैं, जो बच्चों को सिखाने-पढ़ाने के लिए सेना की शैली में रणनीतियां अपनाते हैं और पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन नहीं करनेवाले विद्यार्थियों को सजा देने में भी कोई संकोच नहीं करते. इन शिक्षकों का वेतन विद्यार्थियों के प्रदर्शन पर निर्भर करता है और इसलिए चीन के अन्य पब्लिक स्कूलों के शिक्षकों के बनिस्पत उनका मानदेय दो से तीन गुणा ज्यादा है.
इस पूरी व्यवस्था में सबसे दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय सरकार भी इस स्कूल के नियम-कानूनों को ध्यान में रखते हुए काम करती है. और ऐसा करते हुए उसने इस क्षेत्र में स्थित सारे मनोरंजक स्थलों को बंद करा दिया है. इनमें इंटरनेट कैफे से लेकर पूल रूम तक शामिल हैं.
यहां तक कि घर पर परिवार के साथ रहनेवाले इस स्कूल के बच्चों को भी टीवी देखने की इजाजत नहीं है और न ही किसी भी तरह की गतिविधि से जुड़ने की, जो शिक्षा से संबंधित नहीं है.
इस स्कूल के लिए की जा रही ये सारी कवायदें अच्छे परिणाम भी दे रही हैं. स्कूल के अधिकारियों की मानें तो 1998 में चीन के शीर्ष विश्वविद्यालयों के लिए इस स्कूल से 98 बच्चे चुने गये थे और 2014 में यह आंकड़ा काफी आगे बढ़ कर 9,132 तक पहुंच गया.
माओ तांग चांग हाइ स्कूल के छात्र रहे जू पेंग 2014 में सिंगुआ यूनिवर्सिटी के लिए चुने जानेवाले एकमात्र विद्यार्थी हैं.
यह यूनिवर्सिटी चीन की सबसे विशिष्ट यूनिवर्सिटी का दर्जा रखती है. इस बड़ी उपलब्धि को पाकर अपने स्कूल के अन्य विद्यार्थियों के बीच में खास पहचान बना चुके जू पेंग अब स्कूल के सख्त माहौल से बाहर निकल चुके हैं. वह बताते हैं कि स्कूल से निकलकर सामान्य जीवन से तारतम्य बिठाना आसान नहीं था.
जू पेंग आगे कहते हैं, जब मैं पहली बार यूनिवर्सिटी पहुंचा तो यह देखा कि मेरे अधिकांश सहपाठी चीन के बड़े शहरों से थे. वे अमीर घरों से ताल्लुक रखते थे, आइफोन का इस्तेमाल करते थे और अमेरिकी टीवी शो देखते थे. वह बताते हैं कि वहां कोई कुछ बोलनेवाला नहीं था कि क्या करें और क्या न करें. कुल मिलाकर, माओ तांग चांग स्कूल के दिनों से तुलना की जाये तो सिंगुआ में अब जिंदगी काफी राहतभरी है.
लेकिन ऐसा नहीं है कि जू पेंग ने पढ़ाई में मेहनत करने में ढीलाई बरतने लगे हैं. आज भी वह कभी-कभी लगातार 48 घंटे की पढ़ाई करते हैं, जिसके बीच में बाथरूम और खाने के छोटे ब्रेक्स होते हैं. वह फिलहाल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं और आगे चल कर अमेरिका से मास्टर्स की डिग्री लेना चाहते हैं.
हालांकि जू पेंग जैसे छात्रों की सफलता की कहानियां माओ तांग चांग के तरीकों को सही ठहराती हैं, लेकिन पढ़ाई का ऐसा दबाव कई बच्चों पर बुरा असर भी डालता है. इसी क्रम में चीन की सरकार बच्चों पर से शिक्षा का जरूरत से ज्यादा दबाव कम करने के लिए शिक्षा सुधार से जुड़ा काम कर रही है. लेकिन अधिकांश ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए ‘गाओकाओ’ एग्जाम आज भी बेहतर जिंदगी की उम्मीद की किरण है.
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