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छठ के लिए चूल्हे बना रहीं रेहाना व आसमां

Updated at : 25 Oct 2014 7:18 AM (IST)
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छठ के लिए चूल्हे बना रहीं रेहाना व आसमां

पटना : दीपावली के बाद छठ की तैयारी शुरू हो गयी है. दारोगा राय पथ की मुसलिम महिलाएं सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं, जो धर्मो के बंधन तोड़ वर्षो से छठ पूजा के लिए चूल्हा बनाने का काम कर रही हैं. 25 वर्षीया नसीमा खातून वर्षो से छठ के लिए चूल्हा बनाने का काम कर […]

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पटना : दीपावली के बाद छठ की तैयारी शुरू हो गयी है. दारोगा राय पथ की मुसलिम महिलाएं सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं, जो धर्मो के बंधन तोड़ वर्षो से छठ पूजा के लिए चूल्हा बनाने का काम कर रही हैं. 25 वर्षीया नसीमा खातून वर्षो से छठ के लिए चूल्हा बनाने का काम कर रही हैं.
इनके बने चूल्हे थोक व्यवसायी ले जाते हैं. वे प्रति वर्ष लगभग 400 से 500 चूल्हे तैयार करती हैं. लेकिन, इस वर्ष वह कम ही चूल्हे बना पायी हैं. पूछने पर उन्होंने बताया कि अब चूल्हे बनाने के लिए करीब एक माह से तैयारी करने पड़ती हैं. मिट्टी भी बाहर से लाने पड़ते हैं. इस व्रत से पूरे परिवार की आस्था जुड़ी हैं. इनकी महिमा से पूरा परिवार जीवन बसर कर रहा है.
वे कहती हैं कि लगभग 35-36 वर्ष से परिवार के सदस्यों द्वारा चूल्हा बनाने का काम किया जा रहा है, हालांकि इसकी मनचाही कीमत भी मिल जाती है. लेकिन, कभी भी मजदूरी से ज्यादा नहीं लेती. बड़े बाबू आते हैं. अच्छे दाम देकर जाते हैं. साथ ही आस्था से जुड़ा होने के कारण मोल-जोल नहीं करती, जो मिलता है रख लेती हूं.
महंगी हुई मिट्टी
रेहाना खातून 25 वर्ष की हैं. वे 10 वर्षो से चूल्हा बना रही हैं. वे कहती है कि मिट्टी भी काफी महंगी हो गयी है.1000-1200 रुपये में एक टेलर केवाल मिट्टी मंगवाते हैं. 10 रुपये किलो कटू (भूसा) आता है. फिर इसे बनाने, सुखाने से लेकर इसकी रंगाई आदि करने में काफी समय लगता है. बावजूद हम चूल्हे बनाने का काम करते हैं. इससे हमारी आस्था जुड़ी हैं. इसे पेशे के रूप में नहीं, लेकिन व्रत के रूप में बनाती हूं.
इसकी महिमा से पूरे वर्ष करती है काम
आसमां खातून का कहना है कि चूल्हा बनाने का काम बहुत पहले से करती हूं. छठ मइया की कृपा से मुङो बेटा है. मैं इस वर्ष 20-22 चूल्हा बनायी हूं. मेरी मां भी चूल्हा बनाने का काम करती थी. जब चूल्हे की कीमत 15-20 रुपये हुआ करती थी, तब से इसे बना रही है. आज इसकी कीमत 50 -60 रुपये है. चूल्हा बनाने में तीन से चार दिन लग जाता है. फिर इसे धूप में अच्छी तरह से सुखाने पड़ते हैं.
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