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दूरदृष्टि और युवा जोश से पूर्ण थे राजीव गांधी

Updated at : 20 Aug 2014 7:26 AM (IST)
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दूरदृष्टि और युवा जोश से पूर्ण थे राजीव गांधी

1984 में गहरे राजनीतिक उथल-पुथल के बीच जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, उन्होंने करीब डेढ़ दशक पहले ही भारत को 21वीं सदी में ले जाने का सपना दिखाया. देश को तकनीकी रूप से सशक्त बना कर उन्होंने पंडित नेहरू द्वारा रखी आधुनिक भारत की नींव में एक नया आयाम जोड़ा.आज कांग्रेस के सबसे बुरे दिनों […]

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1984 में गहरे राजनीतिक उथल-पुथल के बीच जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, उन्होंने करीब डेढ़ दशक पहले ही भारत को 21वीं सदी में ले जाने का सपना दिखाया. देश को तकनीकी रूप से सशक्त बना कर उन्होंने पंडित नेहरू द्वारा रखी आधुनिक भारत की नींव में एक नया आयाम जोड़ा.आज कांग्रेस के सबसे बुरे दिनों में राजीव गांधी की प्रासंगिकता पर नजर डाल रहे हैं इतिहासकार प्रोफेसर रिजवान कैसर.

।। प्रो रिजवान कैसर ।।

इतिहासकार

जामिया, दिल्ली

हर दौर कुछ खास परिस्थितियों से होकर गुजरता है, जिसमें नेतृत्व करनेवाले को श्रेय मिलना स्वाभाविक है. लेकिन, भारत जैसे एक बड़े लोकतांत्रिक देश में किसी भी एक व्यक्ति, चाहे वह राजनीतिक व्यक्ति हो या फिर किसी और क्षेत्र का कोई कीर्तिस्तंभ, को ही ‘भारत निर्माता’ के रूप में नहीं देखा जा सकता है.

यह नहीं कहा जा सकता है कि ‘उसके’ अलावा कोई दूसरा ‘नेतृत्व’ मुमकिन या सक्षम नहीं हो सकता है. मसलन, पंडित जवाहरलाल नेहरू नहीं रहे, फिर भी देश आगे बढ़ता रहा. उनके वक्त में कई ऐसी महान विभूतियां थीं, जिन्हें भारत निर्माण का श्रेय दिया जा सकता है, लेकिन चूंकि देश का नेतृत्व नेहरू के हाथ में था, इसलिए देश को आगे बढ़ाने को लेकर उनकी नीतियों की हम सराहना करते हैं. उनके बाद की पीढ़ियों पर भी ठीक यही बात लागू होती है.

लेकिन इतना तो जरूर मानना होगा कि नेहरू के बाद भारत के विकास मॉडल में सबसे बेहतर कीर्तिस्तंभ राजीव गांधी ही थे, जिन्होंने देश को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने की तकरीबन मुकम्मल कोशिश की.

राजीव गांधी ने दो बड़े पैमाने पर आधुनिक भारत के दरवाजे खोले. एक है दूरसंचार (टेलीकम्युनिकेशन सेक्टर) और दूसरा है सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी सेक्टर). खास तौर पर दूरसंचार के क्षेत्र में उनके योगदान को भारत के आधुनिक इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकेगा. उनके राजनीतिक योगदान को इस नजरिये से देखा जाये, तो कुछ चीजें स्पष्ट हो जायेंगी. जब वे कहते थे कि भारत को 21वीं सदी में ले जाना है और बहुत ही आधुनिक देश की स्थापना करनी है, तो कुछ लोग उन पर हंसते थे. 1984 का वह दौर था, जब लोग हंसते हुए कहते थे कि भई!

अभी तो 25-26 साल बचे हुए हैं, अभी तो सरकार के पांच साल की बात करिये, देश को अभी 21वीं सदी में ले जाने की बात बेमानी है. लेकिन, अगर आज के दौर को देख कर आप इतिहास के उन पन्नों को पलटें और उन पर गौर करें, तो आप पायेंगे कि राजीव गांधी के उस सपने पर लोगों का हंसना यह साबित करता है कि नेतृत्व का ईमानदार और दृढ़निश्चयी होना राजीव के लिए कितना मायने रखता था.

यही वजह है कि उनके आधुनिक भारत के विकास के मॉडल ने एक आयाम स्थापित किया, जो उनसे पहले या बाद की पीढ़ियों में नजर नहीं आया. हालांकि, इंदिरा गांधी ने भी ग्रीन रिवोल्यूशन की मुहिम चलायी और खाद्यान्न की बेशुमार उपलब्धता से देश को आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन इमरजेंसी की विभीषिका ने उनके नेतृत्व पर एक तानाशाह का दाग लगा दिया.

राजीव गांधी के अंदर कहीं न कहीं एक नौजवान प्रधानमंत्री बनने का सपना था. इसलिए जब वे प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने खुद का बहुत ईमानदाराना इस्तेमाल किया. उन्होंने अपने नौजवान सपने के नजरिये को न सिर्फ देश से रूबरू कराया, बल्कि अपनी नेतृत्व शक्ति से दुनिया के बेहतरीन दिमागों को भारत में जमा किया और फिर उन दिमागों की मदद से देश को 21वीं सदी में ले जाने के मिशन को पूरा करने के लिए दिल-ओ-जान से जुट गये.

राजीव गांधी के विकास मॉडल और उनकी राजनीति पर बात करते हुए उन संदर्भो में दो महत्वपूर्ण घटनाओं से होकर गुजरना पड़ेगा. एक तो यह कि 1984 में जो राजीव गांधी को जो भारी बहुमत मिला था, उसमें निश्चित रूप से राजीव गांधी का सशक्त नेतृत्व था और दूसरा यह कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश एक भावुकता के दौर से गुजर रहा था, इन दोनों पहलुओं से होकर ही कांग्रेस ने एक बड़ी ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी.

देश की भावुकता में यह चीज शामिल थी कि इंदिरा की हत्या के मद्देनजर देश के लोगों ने एक तरह का प्रायश्चित किया है और राजीव गांधी के नेतृत्व की बात करें, तो उन्होंने इस सदमे से बाहर आकर कांग्रेस को बड़ी जीत दिलाने के लिए राजनीतिक रूप से अपनी सक्रियता साबित की.

राजीव गांधी अपनी राजनीति, विकास और सत्ता को बैलेंस करके आगे बढ़ते रहे. लेकिन यहीं पर एक सबक भी आता है कि इतनी बड़ी जीत के बाद भी राजीव गांधी 1989 का चुनाव नहीं जीत पाये और उन्हें विपक्ष में बैठना पड़ा. और आज यह विडंबना ही है कि वर्तमान में कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल के रुतबे के लिए जूझ रही है.

कांग्रेस की मौजूदा हालत के मद्देनजर अगर राजीव गांधी आज होते तो वे पार्टी के लिए क्या करते, यह कहना बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि तब राजीव गांधी और बाकी कांग्रेसी नेताओं में जिस तरह की राजनीतिक गंभीरता थी, आज के कांग्रेस नेताओं में बहुत ही कम देखने को मिल रही है. निश्चित रूप से कांग्रेस में राजीव गांधी जैसे नेतृत्व की तलाश है, जिसे राहुल गांधी देने में नाकामयाब रहे हैं.

राजीव गांधी की तरह ही राहुल का दिल साफ है, नीयत साफ है, लेकिन नेतृत्व के स्तर पर थोड़ी कमी है. और शायद यही वजह है कि आज कांग्रेस के लोग प्रियंका गांधी को आगे करने की बात करने लगे हैं, क्योंकि उनमें राजीव गांधी और इंदिरा गांधी दोनों की छवि दिखाई देती है. लेकिन चूंकि राजनीतिक तौर पर प्रियंका अभी आजमायी नहीं गयी हैं, इसलिए यह कहना उचित होगा कि राजीव गांधी जैसे नेतृत्व से फिलहाल कांग्रेस खाली नजर आती है.

राजीव गांधी का जनता से सीधा जुड़ाव था, जो राजनीतिक नेतृत्व के लिए बहुत जरूरी होता है. मौजूदा कांग्रेस में इसी बात की कमी नजर आती है. यही वजह है कि कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में लगातार हाशिये पर जा रही है. यहां सबसे अहम बात यह है कि राजीव गांधी की प्रासंगिकता के मद्देनजर उन्हें सिर्फ याद करने से कांग्रेस या देश को कुछ भी हासिल नहीं होगा. जरूरत इस बात की है कि उनके जैसा कोई ठोस नेतृत्व उभर कर आये.

मुझे लगता है कि जब तक कांग्रेस में राजीव गांधी जैसा कोई नेतृत्व उभरेगा, तब तक कट्टर ताकतें काफी मजबूत हो चुकी होंगी, जो सिर्फ कांग्रेस के लिए ही नहीं, बल्कि देश-समाज के लिए भी चिंता की बात होगी. हालांकि यह उम्मीद भी है कि ऐसी ताकतों की हरकतों से ही कांग्रेस को मजबूती मिलेगी और आम जनता फिर से कांग्रेस की ओर रुख करेगी. जिस तरह से इंदिरा की हत्या के बाद राजीव ने कांग्रेस को संभाला था, ठीक उसी तरह से आज 50 से भी कम सीटों पर सिमट जानेवाली कांग्रेस को संभालने के लिए शायद प्रियंका अपनी भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन यह उनके व्यक्तिगत फैसले पर निर्भर है. अब देखना यह है कि कांग्रेस को राजीव गांधी जैसा नेतृत्व गांधी परिवार से मिलता है या बाहर से!

(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)

पर्यावरण और विकास

पर्यावरण को विनष्ट करनेवाला विकास अंतत: उस विकास का भी विनाश करता है, लेकिन पर्यावरण का संरक्षण करनेवाला विकास उसके सुपरिणामों को भी सुनिश्चित करता है. संरक्षण और वृद्धि में कोई द्वंद्व नहीं है, लेकिन इन दोनों के बीच संतुलन साधना आसान काम नहीं है.

पर्यावरण पर विकास के असर के बारे में या नुकसान की भरपाई करने के तरीकों के बारे में हम बहुत अधिक नहीं जानते हैं. हमें उत्तरोत्तर ज्ञान और जागरूकता से दोनों (पर्यावरण और विकास) के अधिकतम संयोग को हासिल करने की कोशिश करते रहना चाहिए.

पर्यावरण की रक्षा और सतत विकास के बीच साहचर्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के हम साक्षी हैं. संसद में मौजूद पर्यावरण समूह यह मांग करने लगे हैं कि बड़ी परियोजनाओं की मंजूरी से पहले पर्यावरण की सुरक्षा की गारंटी दी जाये. आज हमारे जैसे विकासशील देशों में प्राथमिक चिंता धनिकों की जीवनशैली को लेकर नहीं, बल्कि सबसे गरीब लोगों को लेकर है.

जब कुएं और तालाब सूख जाते हैं या जंगल घटने लगते हैं, तो इसका सर्वाधिक कुप्रभाव गरीबों पर ही पड़ता है तथा वही लोग प्रदूषण से होनेवाली बीमारियों के सबसे अधिक शिकार भी होते हैं. हमारे गरीब हमेशा प्रकृति के साथ सद्भाव से रहते आये हैं. समस्या बड़े पैमाने पर होनेवाले व्यावसायिक शोषण के कारण होती है, जो धनिकों को लाभ और गरीबों को नुकसान पहुंचाती है.

प्रभावी होने के लिए संरक्षण की प्रक्रिया मानवीय होनी चाहिए. यह चुनौती हमारे सामने है. बड़ी संख्या में जंतु और पेड़-पौधे गंभीर खतरे में हैं. स्वास्थ्य और जीवन रक्षा से जुड़ी समस्याओं के निदान जीन-पूल रिजर्व की अभी तक रहस्य बनी सूचनाओं में संभवत: मिल सकते हैं. भारत में हम प्रदूषण-नियंत्रण तथा पर्यावरण क्षरण को रोकने के लिए व्यवस्था विकसित कर रहे हैं, लेकिन हमारे ज्ञान में अभी अनेक कमियां हैं. विशेषज्ञों में मतभेद हैं और सर्वेक्षणों के नतीजे भिन्न होते हैं.

पर्यावरण संरक्षण महज राष्ट्र तक सीमित कार्य नहीं है. नदियों और समुद्रों में जहर घोलने से हम सभी दुनिया भर में प्रभावित होते हैं. वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का जमाव और ओजोन परत के खतरे से निदरेष और प्रदूषण फैलानेवाले दोनों ही प्रभावित होते हैं. इन सबमें सबसे बुरा प्रदूषण और पर्यावरण को नुकसान पहुंचानेवाले तत्वों को अपनी सीमा से बाहर भेजने का रवैया है.

समस्या के समाधान में सभी प्रभावितों की बराबर भागीदारी होनी चाहिए. पृथ्वी के पर्यावरण का संरक्षण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकतांत्रिक विमर्श और निर्णय से सुनिश्चित किया जाना चाहिए तथा देशों के बीच असमानता को दूर करने के लिए गंभीर अंतरराष्ट्रीय प्रयास होने चाहिए. वैश्विक आर्थिक तंत्र, जिसमें अंतरनिर्भरता का तत्व नहीं है, अन्यायी और अक्षम दोनों है.

..लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचानेवाली सभी चीजें परमाणु हथियारों के जमा होते जखीरे के सामने गौण हो जाती हैं. सभी तरह के परमाणु हथियार नष्ट कर दिये जाने चाहिए. पर्यावरण के मसले शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, निरस्त्रीकरण और विकास के बड़े मामलों के साथ गहरे से जुड़े हुए हैं.

पर्यावरण एक अंतरराष्ट्रीय मसला है, जिसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सभी पहलुओं के द्वारा इसका संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके. संरक्षण हर देश की जिम्मेवारी है, लेकिन इस जिम्मेवारी को परस्पर सहयोगी विश्व-व्यवस्था के आवरण में ही ठीक से पूरा किया जा सकता है.

(19 अक्तूबर, 1987 को संयुक्त राष्ट्र में दिये राजीव गांधी के भाषण का अनुदित अंश)

सहज जीवन का आडंबर रहित सारथी

।। नटवर सिंह ।।

पूर्व विदेश मंत्री

मैं राजीव के साथ इससे पहले कभी अकेला नहीं रहा था. वे हमेशा भीड़ से घिरे रहते थे. मार्च, 1990 में नामीबिया की स्वतंत्रता के अवसर पर आयोजित समारोह में भाग लेने जाने की यात्रा में वे मेरे साथ पांच दिन बिताने के लिए अभिशप्त थे. मैं जितने लोगों से मिला हूं, उन सब में वे सबसे अधिक सहज, खुशमिजाज और आडंबर से दूर रहनेवाले व्यक्ति थे.

कोई पक्षपात नहीं, किसी बात को घुमा-फिरा कर कहने की कोई कोशिश नहीं, कोई दिखावा नहीं, बेहतरीन हंसमुख स्वभाव, कोई घमंड नहीं. वे अपनी उपस्थिति को लेकर मुङो आश्वस्त करते थे. उन्हें अकेला रहना पसंद नहीं था. उन्हें तकनीक से बड़ा लगाव था. वे अपने साथ एक छोटा रेडियो लेकर आये थे, जिसमें एरियल जैसा यंत्र लगा हुआ था. उन्होंने उसे लगाया और हमने बीबीसी पर समाचार सुना.

राजीव का राजनीतिक आचरण

जब हम लुसाका में थे, तो वहां भारतीय उच्चायुक्त एसपी सिंह ने हमें वहां बसे पांच-छह भारतीयों के साथ रात्रि-भोज के लिए आमंत्रित किया. वे सभी अचंभित थे, कुछ देर तक अवाक् भी, लेकिन राजीव ने पुराने दोस्तों की तरह बात करते हुए उन्हें तुरंत ही सामान्य कर दिया. उन्होंने उन भारतीयों के साथ बराबरी का बर्ताव किया. ऐसा एक आत्मविश्वासी और सुसंस्कृत व्यक्ति ही कर सकता था.

प्रधानमंत्रित्व से महज एक सांसद बन जाना किसी खाई में गिरने की तरह है. लेकिन, राजीव नहीं गिरे. एक राजनेता के आचरण की असली परीक्षा विपरीत परिस्थियों में ही होती है.

देंग (जिआओपिंग) ने राजीव से कहा, ‘मैं आपके नाना और मां से उनकी चीन यात्रा के दौरान मिला था. तब मैं हमारी पार्टी का महासचिव था.’ वहां मौजूद चीनी और भारतीय मीडिया दोनों नेताओं के हरेक शब्द और हाव-भाव पर नजर जमाये हुए था. चीनी नेता का हर शब्द पहले से तय और सावधानीपूर्वक कहा गया था.

दोनों के हाथ मिलाने ने (45 सेकेंड तक दोनों नेताओं के हाथ जुड़े रहे थे) जबर्दस्त माहौल बना दिया था. दशकों तक निष्प्राण अमित्रता कुछ ही मिनटों में बह गयी. राजीव ने वह हासिल कर दिखाया, जो नेहरू और इंदिरा कर पाने में असफल रहे थे. वहां उपस्थित लोगों के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण था.

हम आगे बढ़ चुके हैं

राजीव ने देंग को भारत में विकास के मसले पर भरोसे में लिया. आधुनिकीकरण की राह बनाते हुए पुरानी बाधाएं और अवरोध गिरा दिये गये. यह हमारी अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन में दृष्टिगोचर हुआ. शाम को मैंने राजीव से पूछा कि देंग से उनकी मुलाकात कैसी रही. उन्होंने मुङो बताया, ‘हम आगे बढ़ चुके हैं.

1962 बहुत पीछे छूट गया है.’ उन्होंने मुझसे कहा कि चीनी नेता से बात करते हुए उन्हें हमारे विचारों में समानता दिखी. देंग-राजीव मुलाकात ने न सिर्फ भारत और चीन में, बल्कि दुनिया भर हंगामा मचा दिया था.

यह शानदार यात्रा राजीव की विदेश नीति की असाधारण जीत थी. यह तथ्य कि भारत-चीन सीमा पर 25 वर्षो से कायम शांति उनकी देन है. मेरे लिए यह एक ऐतिहासिक परिघटना थी, जिसमें मैंने साधारण भूमिका निभायी थी. (दिसंबर, 1988 में राजीव की चीन यात्रा के बारे में)

1987 आते-आते राजीव गांधी सरकार अपनी ऊर्जा खो चुकी थी. राजीव जल्दबाजी में थे. अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में जो उन्होंने हासिल किया, वह बहुत महत्वपूर्ण है. वे बड़ी संख्या में भारतीयों की मानसिकता को बदलने में सफल रहे और देश को 21वीं सदी के लिए तैयार किया. कभी-कभी अविवेक दिखाते हुए, वे समझते थे कि कठिन समस्याओं का समाधान महज शाब्दिक अभिव्यक्ति से हो सकता है. स्वाभाविक रूप से, इसके कई परिणाम सामने आये, जिनकी पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी.

अज्ञानियों की टीम पर निर्भरता

1984 से 1989 के बीच उन्होंने अपने मंत्रिपरिषद में दो दर्जन से अधिक बार फेरबदल किया. एक मात्र मंत्री जिसने कैबिनेट में अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया, वे थे रेल मंत्री माधवराव सिंधिया. उनके प्रधानमंत्रित्वकाल में विदेश मंत्रलय में चार कैबिनेट और छह राज्यमंत्री आये. संक्षेप में, मंत्री अपने काम में न ही जम सके और न ही कोई दीर्घकालिक नीतियों का मसौदा तैयार कर सके. अपने कार्यकाल के पहले 18 महीने में वे लगभग पूरी तरह से घमंडी अज्ञानियों की एक टीम पर निर्भर थे. वे सभी तेजतर्रार, लेकिन ढीठ थे. एक अपने को समाजवादी होने का दावा करता था, तो दूसरा एक अयोग्य राजनीतिक चालू-पुर्जा था. उनमें तीसरा हर बात में नाक घुसेड़नेवाला सरदर्द था. सामूहिक रूप से, यह एक गैर-जिम्मेवार समूह था, जिसमें वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों और सरकारी नियमों के प्रति अत्यंत कम सम्मान था. इन्होंने राजीव की प्रतिष्ठा और राजनीतिक छवि को बहुत ही नुकसान पहुंचाया.

(हाल में प्रकाशित बहुचर्चित आत्मकथा ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ से चुनिंदा अंश)

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