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साहित्य : अब पाठकों को पसंद आने लगा है कथेतर

Updated at : 05 Jan 2020 7:51 AM (IST)
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साहित्य : अब पाठकों को पसंद आने लगा है कथेतर

पल्लव आलोचक हिंदी की दुनिया का विस्तार हो रहा है. अब हिंदी पढ़नेवाले सिर्फ भारत में ही नहीं हैं और न सिर्फ हिंदी के विद्यार्थी ही हिंदी पढ़ते हैं. यह दुनिया बहुत फैल गयी है. इंटरनेट के आगमन और इ-कॉमर्स सुगम होने के बाद हिंदी पाठक और हिंदी किताबें दुनियाभर में फैले हैं. साधारण पाठकों […]

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पल्लव
आलोचक
हिंदी की दुनिया का विस्तार हो रहा है. अब हिंदी पढ़नेवाले सिर्फ भारत में ही नहीं हैं और न सिर्फ हिंदी के विद्यार्थी ही हिंदी पढ़ते हैं. यह दुनिया बहुत फैल गयी है. इंटरनेट के आगमन और इ-कॉमर्स सुगम होने के बाद हिंदी पाठक और हिंदी किताबें दुनियाभर में फैले हैं. साधारण पाठकों की संख्या में बड़ी वृद्धि हुई है. इस व्यापकता ने हिंदी साहित्य के चरित्र को भी बदला है और इसका विधाओं पर भी गहरा असर पड़ा है.
दूसरी बात यह है कि दुनियाभर में अस्मिता के विमर्शों का बोलबाला भी बढ़ रहा है. स्त्री, दलित, आदिवासी और थर्ड जेंडर को भी अब साहित्य में सम्मानपूर्वक जगह दी जाने लगी है. किताब का प्रचार भी बहुत सुगम हो गया है, इसके लिए धन खर्च करने की जरूरत नहीं, अपितु सोशल मीडिया पर नवाचार का कौशल चाहिए.
इन सब बातों का पहला असर यह हुआ कि विधाओं के रूढ़ ढांचे टूटे. अब कहानी या उपन्यास नहीं, संस्मरण और यात्रा आख्यान अधिक लोकप्रिय विधाएं हैं. इतिहास, राजनीति और भूगोल में पाठकों की दिलचस्पियां बढ़ रही हैं. पिछले साल नेहरू पर लिखी गयी किताब हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय किताब थी. अशोक कुमार पांडे की किताब ‘कश्मीरनामा’ के दो सालों में चार संस्करण आ चुके हैं. तो मेरा विश्वास है कि 2020 में पाठकों की कथेतर साहित्य ही सबसे अधिक पसंद आयेगा.
कथेतर में संस्मरण, निबंध, नाटक, यात्रा आख्यान, रिपोर्ताज, जीवनी, आत्मकथा और साक्षात्कार जैसी अप्रचलित विधाएं हैं. असल में साहित्य में ऐसे लेखकों का आगमन भी बढ़ा है, जो ठेठ साहित्य की पारंपरिक पढ़ाई कर नहीं आये हैं.
ये इंजीनियर, डॉक्टर, खिलाड़ी या ऐसे किसी भी क्षेत्र के हैं, जिनसे लेखक होने की अपेक्षा नहीं की जाती. इसी तरह अस्मिताई विमर्शों के प्रभाव ने स्त्रियों, दलितों और आदिवासियों को लेखन की दुनिया में आने का उत्साह दिया है. पिछले साल राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी की छोटी सी किताब ‘मैं एक कारसेवक था’ आयी और एक महीने में ही उसका पहला संस्करण बिक गया.
जबकि इसे छापनेवाले भी अत्यंत नये और साधनहीन प्रकाशक थे. यह किताब भी किसी सिद्ध लेखक की लेखनी नहीं, बल्कि कच्चापन लिए ईमानदार कोशिश ही थी. इस कोशिश में पाठकों को आत्मीयता, सच्चाई और अनुभव की प्रामाणिकता दिखायी दी, यही कारण था कि किताब एक महीने में ही बिक गयी.
मेरा विश्वास है कि 2020 में प्रचलित सांचे और खांचे से बाहर जो भी किताबें आयेंगी, उन्हें ऐसी ही लोकप्रियता मिलेगी. इधर आयी नयी सरकारों ने किताबों की खरीद कम की है, तो इसका एक दिलचस्प परिणाम यह निकला है कि अब प्रकाशक पुस्तकालयों में किसी भी तरह की किताबें भरकर धंधा करने के बजाय उन किताबों को छापने के लिए विवश हुए हैं, जिन्हें पाठक हाथों-हाथ लें. जाहिर है, ऐसे पाठक सभी तरह के होंगे और सभी किस्म की किताबों (बशर्ते वे गुणवत्ता युक्त हों) को पसंद भी करेंगे.
इस लिहाज से मुझे रजा फाउंडेशन की रजा पुस्तकमाला की आगामी किताबों का इंतजार है, जिसमें 2019 में नागार्जुन और रघुवीर सहाय की जीवनियां आयी थीं. इस पुस्तकमाला ने हिंदी में सर्वथा नये ढंग की किताबें प्रस्तुत की हैं. पुराने बड़े प्रकाशनों से अच्छी किताबें छपी ही हैं, लेकिन नये-नये आये प्रकाशन भी पाठकों का ध्यान खींचने में सफल होंगे, इसका भरोसा है.
साहित्य अकादमी अनुवाद विमर्श पर दो खंडों में बड़ा काम लेकर आनेवाली है और रामविलास शर्मा जैसे मनीषी का रचना संचयन भी इस साल वह प्रस्तुत करेगी.
किताबों के साथ थोड़ी नजर लघु पत्रिकाओं पर डालनी चाहिए, जो साहित्य को आम पाठकों तक पहुंचाने की प्रारंभिक जिम्मेदारी पूरा करती हैं. इस साल प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह पर ‘चौपाल’, दूधनाथ सिंह पर ‘अनहद’ और युवा कहानी पर ‘उद्भावना’ के विशेष अंक आ रहे हैं. इसी तरह कथादेश, वागर्थ, पाखी, नया ज्ञानोदय और हंस जैसी मासिक पत्रिकाओं ने भी निरंतरता से परिदृश्य में हलचल पैदा की है, जो पाठकों को उत्साहित करती है.
नॉटनल जैसी वेबसाइट साहित्य को मामूली दामों में दुनियाभर के पाठकों तक पहुंचाने में सफल हुई हैं, तो किंडल जैसे नये माध्यम भी साहित्य के प्रसार में उपयोगी सिद्ध हुए हैं. कहना न होगा कि पाठकों के न होने का घिसा-पिटा कथन अब अप्रासंगिक हो गया है. नये पाठकों के आगमन से हिंदी पुस्तक संसार नये युग में प्रवेश कर रहा है.
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