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घुमंतू जिंदगी के रूबरू

Updated at : 08 Dec 2019 6:09 AM (IST)
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घुमंतू जिंदगी के रूबरू

ऐश्वर्या ठाकुरआर्किटेक्ट एवं ब्लॉगरआगे-आगे भेड़-बकरियों के रेवड़ और पीछे हट-हट कहते हुए लाठी हांकते चरवाहे, पहाड़ों की दृश्यभूमि के ये रूटीन किरदार होते हैं. गद्दी, गड़रिये, अहीर, गुज्जर, बकरवाल जैसे कितने ही नामों से ये चरवाहे जाने जाते हैं. पहाड़ी चरवाहों की कमर पर बंधी रस्सी, उस पर ओढ़ा हुआ ऊनी लबादा और सर पर […]

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ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट एवं ब्लॉगर

आगे-आगे भेड़-बकरियों के रेवड़ और पीछे हट-हट कहते हुए लाठी हांकते चरवाहे, पहाड़ों की दृश्यभूमि के ये रूटीन किरदार होते हैं. गद्दी, गड़रिये, अहीर, गुज्जर, बकरवाल जैसे कितने ही नामों से ये चरवाहे जाने जाते हैं. पहाड़ी चरवाहों की कमर पर बंधी रस्सी, उस पर ओढ़ा हुआ ऊनी लबादा और सर पर सजी रंगीली टोपी इनकी खास पहचान होती है. गड़रिये प्रायः भेड़-बकरियां ही चराते हैं, मगर इस समुदाय के अन्य वर्गों में गाय-भैंस पालना भी आम है.

गड़रिया समुदाय का जीवन अपनी घुमंतू जीवनशैली के चलते हमेशा से ही कहानी-कविताओं का विषय रहा है. कश्मीर के ‘मर्ग’ हों, उत्तराखंड के ‘बुग्याल’ हों या हिमाचल के ‘धार’ हों, इन सभी हरियाली चरागाहों की रौनक तो गड़रियों की मौजूदगी से बहाल रहती है.
इनका जीवन इनके पशुधन के साथ ऐसे गुंथा होता है, जैसे पेड़ की शाखा के साथ रम जाती है हरी बेल. गड़रिये गर्मियों में ऐसे ऊंचे पहाड़ी स्थानों पर रहते हैं, जहां भेड़ बकरियों के चरने के लिए घास के मैदान हों और सर्दियों में बर्फ पड़ने से पहले ही अपने पशुधन के साथ निचले स्थानों पर आ जाते हैं, हरे चारे की तलाश में. यह ऋतु-प्रवास इनके जीवन में रवानी कायम रखता है. आड़े-तिरछे पहाड़ी दर्रे पार करते हुए ये गड़रिये अपने मवेशियों के साथ सामान-समेत सफर करते रहते हैं.
कृषि के साथ भी गद्दियों (पहाड़ी गड़रिये) का यह ऋतु-प्रवास बहुत करीब से जुड़ा हुआ है. गांवों में गद्दी खेतों के किनारे डेरा डालते हैं और बदले में किसानों को मिलती है भेड़-बकरियों के मल की खाद. दूसरी ओर इनकी बीवियां घरों में अपने गद्दी के लौटने का इंतजार करती हुई महीनों ऊनी चादरें और कंबल बुनती रहती हैं और फिर सतलज किनारे लगनेवाले ‘लवी’ के मेले में ये ऊनी असबाब बेच आती हैं.
भेड़ियों, भालुओं और तेंदुओं से अपनी भेड़-बकरियों को बचाते हुए चरवाहे कभी पहाड़ों की ओट लेते हैं, कभी अतिक्रमण के चलते सिमटती चिरांदों के निशान तलाशते हुए हाईवे के किनारे से गुजरते हैं.
अखबारों में अक्सर घुमंतू वेलफेयर-बोर्ड गठित होने की खबर आती है और रोज कोई एनजीओ इनकी जरूरतों से जुड़े मसले उठाते हैं, मगर इनके डेरों तक कभी नहीं पहुंच पाती कोई स्कीम या बेनेफिट. एंथ्रोपोलॉजी और संस्कृति विभाग के शोध में बारहा इनका जिक्र आता है, मगर किसी भी दस्तावेज में चरागाहों के कम होते दायरे हेडलाइन नहीं बन पाते. गड़रियों के बेटे-बेटियां अब नहीं चराना चाहते हैं भेड़-बकरियां, क्योंकि नयी पीढ़ी के मन तक शहरों का विस्तार फैल गया है.
संकरे पथरीले रास्तों और ढलानों पर उतार-चढ़ाव से ज्यादा मुश्किल है चरवाहों के भविष्य की डगर, जिसमें अनिश्चितता की कंटीली तार ने रोजगार के हरे चरागाह को कब्जा लिया है. शामलातों की गैर-वाजिब सौदेबाजी में चरवाहों की गर्त होती आजीविका की सुध लेनेवाला न कोई अफसर है, न कोई छायाकार और न कोई लेखक.
घुमंतू जिंदगी की हकीकत से उठते पर्दों के बावजूद अमरनाथ से लेकर बेथलेहम तक, कृष्ण से लेकर यीशू तक, ईसप से लेकर रांझे तक चरवाहों की कहानियां हमेशा से जिंदा रही हैं और रहेंगी.
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