थियेटर : जरूरी है नाटकों का पुस्तकरूप में प्रकाशन

Updated:
विज्ञापन
WhatsApp चैनल से जुड़ेंगूगल पर प्रभात खबर चुनें

अमितेश रंगकर्म समीक्षक एनएसडी में डिप्लोमा प्रस्तुति करने के लिए हरिशंकर रवि विषय और नाटक की तलाश में थे. शोध और अध्ययन के बाद उन्होंने अपने सहपाठी पल्लव सिंह के साथ तय किया कि वह अपनी डिप्लोमा प्रस्तुति के लिए नया नाटक लिखवायेंगे और पल्लव ने इस प्रक्रिया में ‘ख्वाइश गली’ लिखा. यह उदाहरण है […]

विज्ञापन
अमितेश
रंगकर्म समीक्षक
एनएसडी में डिप्लोमा प्रस्तुति करने के लिए हरिशंकर रवि विषय और नाटक की तलाश में थे. शोध और अध्ययन के बाद उन्होंने अपने सहपाठी पल्लव सिंह के साथ तय किया कि वह अपनी डिप्लोमा प्रस्तुति के लिए नया नाटक लिखवायेंगे और पल्लव ने इस प्रक्रिया में ‘ख्वाइश गली’ लिखा.
यह उदाहरण है उस प्रवृत्ति का, जब नये निर्देशक अपने कथ्य की तलाश में नये नाटकों के लिए नाटककारों तक पहुंच रहे हैं और नाटककार निर्देशक के साथ मिलकर नाटक लिख रहा है. रणधीर कुमार और प्रवीण गुंजन ने भी इसी साल जब नयी प्रस्तुति करने की सोची, तो नाटक लिखने के लिए दो युवा अभिनेता अभिषेक चौहान और कवि सुधांशु फिरदौस पर भरोसा किया.
दोनों ने उनके लिए ‘फाउल प्ले’ और ‘कथा’ नाटक लिखा, जिसका विषय एकदम समकालीन था. इलाहाबाद में प्रवीण शेखर ने ध्रुव हर्ष का नाटक ‘हर्मोफ्रोडाइट’ किया, जो भारतीय और ग्रीक मिथक पर आधारित था. ये सब उदाहरण इस अवधारणा का प्रतिवाद हैं कि हिंदी में नाटक नहीं लिखे जा रहे, जबकि सच यह है कि पर्याप्त नाटक लिखे जा रहे हैं.
दिल्ली में साहित्य कला परिषद् मोहन राकेश की स्मृति में नाट्य लेखन प्रतियोगिता आयोजित करता है, जिसके मंचन की व्यवस्था भी परिषद् ही करता है.
मुंबई में रंगकर्मी रसिका आगाशे और जीशान अय्युब की संस्था बीइंग आर्ट एसोसिएशन संहिता मंच नाम से वर्ष 2017 से ही नाट्य लेखन प्रतियोगिता आयोजित कर रहा है. पुरस्कृत नाटकों के मंचन की व्यवस्था भी संस्था करती है. इस साल इस क्रम में स्वप्निल जैन की ‘रोमियो जुलियट इन स्मार्ट सिटीज ऑफ कंटेंपररी इंडिया’, राहुल राय की ‘कबाब’ और अमित शर्मा की ‘राधेय’ को श्रेष्ठ नाटक के रूप में चुना गया.
जिसका निर्देशन क्रमश: सौरभ अनंत (भोपाल), राजेश सिंह (दिल्ली) और रसिका आगाशे (मुंबई) ने किया और मंचन मुंबई, पुणे, भोपाल और दिल्ली में हुआ. सुखद यह है कि अधिकांश नाटककार रंग समूह के साथ जुड़कर नाटक लिख रहे हैं. इससे निर्देशक, अभिनेता और नाटककार के बीच सहभागिता हो रही है.
हिंदी रंगमंच में नाटकों की समस्या नहीं है, समस्या है नाटक के प्रकाशन की. नये नाटक प्रकाशित करने में प्रकाशकों को रुचि लेनी होगी. आसिफ अली हैदर, सुमन कुमार, विभांशु वैभव जैसे रंगकर्मी लगातार नाटक लिखते हैं, पर उनके ज्यादातर नाटक अप्रकाशित हैं. मृत्युंजय प्रभाकर को अपना नाटक स्वयं प्रकाशित करना पड़ा. संहिता मंच भी नाटकों के समुचित प्रकाशन और वितरण की व्यवस्था की तलाश कर रही है.
प्रकाशन के अभाव में नाटक एक समूह के मंचन तक सिमट जाता है और मंचन बंद होने के साथ ही विलीन हो जाता है, जैसा राजेश चंद्र लिखित ‘जहाजी’ और पुंज प्रकाश लिखित ‘नटमेठिया’ के साथ हुआ. अभिषेक मजूमदार लिखित तीन नाटकों ‘कौमुदी’, ‘इदगाह के जिन्नात’ और ‘मुक्तिधाम’ को एक जिल्द में लंदन के ओबेरॉन प्रकाशन ने छापा और उनके तीनों ही नाटक को संस्थाएं लगातार मंचित कर रही हैं. नाटकों के प्रकाशन से यह सामने आ जायेगा कि हिंदी में नाट्य साहित्य लेखन में भी पर्याप्त सक्रियता है, और हिंदी समाज का भ्रम दूर होगा.
विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola