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ओमान पाकिस्तानी बलूचों को नौकरी क्यों नहीं दे रहा

Updated at : 04 Jul 2019 7:34 PM (IST)
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ओमान पाकिस्तानी बलूचों को नौकरी क्यों नहीं दे रहा

<figure> <img alt="जवान" src="https://c.files.bbci.co.uk/10543/production/_107738866_b3759eae-15cc-45be-9522-3884bcfb9b04.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><p>"मैंने अपनी ज़िन्दगी के पाँच साल इस इंतज़ार में गुज़ारे हैं कि कहीं से मेरी नौकरी को लेकर कोई जवाब आएगा. लेकिन अब तक किसी ने कुछ भी नहीं बताया है और ऐसा महसूस कराया जा रहा है जैसे मैं कुछ ग़लत करने जा रहा हूं."</p><p>25 […]

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<figure> <img alt="जवान" src="https://c.files.bbci.co.uk/10543/production/_107738866_b3759eae-15cc-45be-9522-3884bcfb9b04.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><p>&quot;मैंने अपनी ज़िन्दगी के पाँच साल इस इंतज़ार में गुज़ारे हैं कि कहीं से मेरी नौकरी को लेकर कोई जवाब आएगा. लेकिन अब तक किसी ने कुछ भी नहीं बताया है और ऐसा महसूस कराया जा रहा है जैसे मैं कुछ ग़लत करने जा रहा हूं.&quot;</p><p>25 साल के गहराम बलोच का ये बयान ओमानी फ़ौज में भर्ती होने के लिए इंटरव्यू को लेकर है. वो 330 से ज़्यादा के क़रीब बलूच नौजवानों में से एक हैं जो नौकरी के लिए इंटरव्यू के पाँच साल बाद भी जवाब के इंतज़ार में हैं.</p><p>एक पाकिस्तानी शहरी का एक दूसरे देश की फ़ौज में भर्ती का ख़्वाहिशमंद होना शायद आपको अजीब लगे लेकिन पाकिस्तान के सूबे बलूचिस्तान के तटीय क्षेत्र ग्वादर के लोगों के लिए खाड़ी देश ओमान में नौकरी की ख़्वाहिश कोई अजीब चीज़ नहीं है.</p><p>बलूचिस्तान से ओमान जाने वालों में बड़ी संख्या छात्रों और मेहनतकशों की रही है. हालांकि पिछले कुछ सालों में ये प्रक्रिया अपने अंत तक पहुंचती नज़र आ रही है. </p><p>ओमानी अधिकारियों की तरफ़ से बलूच नौजवानों की अपनी फ़ौज में आख़िरी बाक़ायदा भर्ती तो 1999 में की गई थी जबकि उसके बाद 2014 में जिन लोगों के इंटरव्यू लिए गए उन्हें आज तक जवाब नहीं दिया गया. </p><p>इस बारे में वर्ल्ड बैंक की अप्रैल 2019 में प्रकाशित होने वाली रिपोर्ट के मुताबिक़, खाड़ी देशों में दक्षिणी एशिया से मज़दूरों के जाने की प्रक्रिया बहुत हद तक कम हो गई है. </p><p>इन देशों में ओमान का नाम भी लिया गया है जहां रिपोर्ट के मुताबिक़ मेहनतकशों की भर्तियों की प्रक्रिया में कमी की एक वजह वहां पर होने वाली ‘ओमानाइज़ेशन’ है, जिसका मतलब किसी भी तरह की भर्तियां करते वक़्त अपने शहरियों को तरजीह देना है.</p><figure> <img alt="दस्तावेज़" src="https://c.files.bbci.co.uk/12C53/production/_107738867_4b2deb1e-682b-4151-a266-e0636181086f.jpg" height="405" width="304" /> <footer>BBC</footer> <figcaption>पाकिस्तान और ओमान के बीच समझौते में यह तय किया गया था कि बलूच के लोगों को ओमान फ़ौज में भर्ती किया जाएगा</figcaption> </figure><h1>ओमान और ग्वादर के संबंधों का इतिहास</h1><p>बलूचिस्तान और ओमान सल्तनत के संबंध ख़ासे पुराने हैं. एक अनुमान के मुताबिक़, मकरानी बलूच ओमान की आबादी का 25 फ़ीसद हिस्सा हैं और इन्हें वहां अलबलूशी पुकारा जाता है. </p><p>1908 में प्रकाशित होने वाली किताब ‘गजेटियर ऑफ़ परशियन गल्फ़, ओमान एंड सेन्ट्रल अरबिया’ अरब और फ़ारस की खाड़ी में काम करने वाले ब्रिटिश दूतावास के कर्मचारियों के लिए इलाक़े के बारे में जानकारी के लिए ख़ासा महत्वपूर्ण समझा जाता था. </p><p>इसके लेखक जॉन लारिमर के मुताबिक़ 18वीं सदी में ख़ान ऑफ़ क़लात नूरी नसीर ख़ान के दौर में ओमान के एक शहज़ादे ‘बाहोट’ बनकर यानी पनाह की तलाश में इनके पास आए थे. </p><p>शहज़ादे ने अपनी सल्तनत वापस हासिल करने के लिए बलूचिस्तान से मदद की गुज़ारिश की थी लेकिन नूरी नसीर ख़ान इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे. </p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/international-48861602?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">पाकिस्तान की नाक में दम करने वाली बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी</a></li> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/sport-48863041?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">इंग्लैंड सेमीफ़ाइनल में, अब पाकिस्तान का क्या होगा?</a></li> </ul><p>बीबीसी से बात करते हुए शोधकर्ता और प्रोफ़ेसर हफ़ीज़ जमाली का कहना था, &quot;ख़ान ऑफ़ क़लात ने उस वक़्त ग्वादर के बंदरगाह जो तब महत्वहीन था उनको तोहफ़े के तौर पर दे दिया ताकि इससे होने वाली आमदनी से वो अपना गुज़ारा कर सकें. फिर ग्वादर बाक़ायदा तौर पर ओमानी सल्तनत का हिस्सा बन गया.&quot;</p><p>हालांकि बलोच राष्ट्रवादी इस बयान को नहीं मानते और उनका मानना है कि ओमानी शहज़ादे को ग्वादर अस्थायी तौर पर उनकी हिफ़ाज़त के लिए दिया गया था और उन लोगों को ग्वादर पर पूरा हक़ हासिल नहीं था. </p><p>बलूचिस्तान के तटीय इलाक़े ग्वादर को देखा जाए तो वहां आज भी ओमानी दौर के क़िले सदियों पुराने शाही बाज़ार में नज़र आते हैं. ये ग्वादर के एक दौर की तस्वीर पेश करते हैं जब सरहदें सिर्फ़ एक लकीर समझी जाती थीं और सफ़र दुश्वार होने के बावजूद लोग काम की वजह से विभिन्न देशों में आते-जाते रहते थे. </p><p>गहराम बलोच के ख़ानदान से संबंध रखने वाले कई लोग भी ऐसे ही ज़माने में वहां चले गए थे जब ओमानी फ़ौज में काम करने के कारण ओमान की नागरिकता मिलना ख़ासा आसान था.</p><p>प्रोफ़ेसर हफ़ीज़ जमाली ने जॉन लारिमर की लिखी हुई बात दोहराते हुए कहा कि ‘जब ओमानी सल्तनत का फैलाव हुआ यानी जब ओमान ने अफ़्रीका और भारत के समुद्र तक अपना क़ब्ज़ा जमाया तो मकरान के बलोच बतौर सिपाही ओमान के फैलाव में एक अहम किरदार निभाते हुए उभरे.'</p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/international-48774100?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">पाकिस्तान की एक बहादुर लड़की की कहानी</a></li> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/sport-48812805?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">मैच के बीच भिड़े अफ़गानिस्तानी और पाकिस्तानी फ़ैंस</a></li> </ul><figure> <img alt="दस्तावेज़" src="https://c.files.bbci.co.uk/17A73/production/_107738869_1b15e8d3-dbc8-440e-9b08-2d3ab3860519.jpg" height="549" width="976" /> <footer>BBC</footer> <figcaption>प्रोफ़ेसर हफ़ीज़ जमाली के मुताबिक़, जब ओमानी सल्तनत का विस्तार शुरू हुआ तो मकरान के बलोचों ने बतौर सिपाही इसमें भाग लिया</figcaption> </figure><p><strong>ओमानी </strong><strong>फ़ौज </strong><strong>में बलोच सिपाही</strong></p><p>जब 1947 के बाद भारत और पाकिस्तान दो आज़ाद देश बने तो पाकिस्तान सरकार ने ओमान की सल्तनत से ग्वादर को अपनी ज़मीन से नज़दीक होने की बुनियाद पर ख़रीदने की बात की. यह अनुबंध सन् 1958 में तय पाया जिसके तहत पाकिस्तान ने ओमान से ग्वादर 84 लाख डॉलर में ख़रीद लिया.</p><p>इस अनुबंध में यह भी तय किया गया था कि बलूचिस्तान के लोगों को ओमानी फ़ौज में भर्ती किया जाएगा. इस नियम पर अमल भी हुआ लेकिन 1958 के बाद नियम सिर्फ़ नियम भर रह गया. </p><p>इसकी वजह प्रोफ़ेसर हफ़ीज़ जमाली ने बताई, &quot;ओमानी सल्तनत पहले जिन लोगों को भर्ती करती थी वो आस-पास के इलाक़ों को जीतने के इरादे से करती थी जिसमें उन्हें प्रशासन संभालने के लिए लोगों की ज़रूरत पड़ती थी. 1958 के बाद तो ओमानी सल्तनत ख़ुद खाड़ी द्वीप तक सीमित रह गई तो अफ़्रीक़ी इलाक़े मुमबासा और ज़ेनजीबार जहां बलोच सिपाहियों ने जाकर ओमानियों की तरफ़ से व्यवस्था संभाली वो इनसे अलग हो गए क्योंकि उस समय दुनिया भर में तब्दीलियां आई थीं.&quot;</p><p>इस स्थिति में ओमान को बलोच सिपाहियों की ज़रूरत नहीं रही लेकिन प्रतीकात्मक बुनियादों पर कम संख्या में भर्तियां जारी रहीं.</p><p>हफ़ीज़ जमाली ने बताया, &quot;उस दौरान बलोच सिपाहियों की एक ख़ास तादाद की ज़रूरत उस समय पेश आई थी जब 1970 के दशक में ओमान में स्थानीय बग़ावत हुई थी. इस बग़ावत से निपटने के लिए लोगों की भर्तियां करनी पड़ी थीं लेकिन ये वक़्ती भर्तियां थीं जो इस मसले के हल के बाद ख़त्म हो गई थीं.&quot;</p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/sport-48781591?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">सरफ़राज़ को ‘मोटा…’ कहने पर पत्नी ने क्या किया</a></li> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/international-48701605?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">पाकिस्तान में पोलियो के ख़िलाफ़ आख़िरी जंग</a></li> </ul><figure> <img alt="ग्वादर के किले" src="https://c.files.bbci.co.uk/43F1/production/_107739371_fc1b078e-a5e4-4ee7-b7a9-3f9f4ae1eaf9.jpg" height="549" width="976" /> <footer>BBC</footer> <figcaption>ग्वादर में आज भी ओमानी दौर के क़िले मौजूद हैं</figcaption> </figure><h1>बलूचिस्तान का विद्रोह और ओमान में नौकरियां </h1><p>जब 1970 के दशक में तेल की खोज हुई और तो ग्वादर और मकरान के लोगों की दिलचस्पी ओमान जाने में और बढ़ गई. इस पर ओमाम की तरफ़ से प्रतिबंध लगाई गई कि अब नए लोगों को नागरिकता नहीं दी जाएगी. </p><p>प्रतीकात्मक बुनियादों पर ओमानी फ़ौज में भर्तियां बहुत हद तक कम होने की एक वजह बलूचिस्तान में विद्रोह से जुड़ी है. </p><p>बलूचिस्तान के इलाक़े कैच में ओमानी फ़ौज में भर्ती होने के लिए आस लगाए बैठे लोगों में बलिख शेर भी हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि ‘इंटरव्यू के दौरान मुझ से सैन्य प्रवक्ता ने कहा कि अगर हम आपको ओमान जाने देते हैं तो क्या आप वहां पर ली गई फौजी ट्रेनिंग पाकिस्तान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल तो नहीं करेंगे?'</p><p>बलिख शेर का कहना था कि ‘मेरे पास इस बात का जवाब नहीं था, सिवाए हैरानी ज़ाहिर करने के क्योंकि मैं सिर्फ़ नौकरी के लिए वहां जाना चाहता हूं. मुझे इंटरव्यू से ज़्यादा तफ़्तीश लग रही थी. अब मैं ज़्यादा ख़ौफ़ज़दा हूं.'</p><p>शोधकर्ताओं का मानना है कि कहीं न कहीं ये शक हर देश में पाया जाता है. शोधकर्ता अमीम लुत्फ़ी की रिसर्च ओमानी बलोच और खाड़ी देशों में उनके रिहाइश के गिर्द घूमती है.</p><p>बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि ‘इसकी वजह दुबई, शारजा, मस्कट और बहरैन में चंद ऐसी जगहें हैं जो अलगाववादी सोच रखने वाले लोगों के गढ़ कहलाते हैं.'</p><p>अमीम का कहना था कि ‘इनमें से जो गिरोह ईरान विरोधी हैं उनका खाड़ी देश भी साथ देते हैं लेकिन साथ ही इस बात का भी ख़ास ख्याल रखते हैं कि पाकिस्तान विरोधी प्रोपेगंडा को पनपने न दें.'</p><p>इसकी एक और वजह फ़ौजी फाउंडेशन का भर्तियों के मामले में पेश होना है. सन् 2010 में फ़ौजी फाउंडेशन के विदेशों में भर्तियों के लिए एक फ़र्म बनाई थी ताकि बलूचिस्तान और अन्य इलाक़ों के बेशुमार लोग निजी संबंध के बजाए इनके ज़रिए बाहर जाएं.</p><p>लेकिन अमीम के मुताबिक़ ‘इस अमल का मक़सद विदेशी फ़ौज में भर्तियों को ख़त्म करना था जो बहुत हद तक हो चुका है.'</p><p>जानकारों के मुताबिक़ इस समय दुनिया भर में मॉडर्न मिलिट्राइज़ेशन का रूझान देखने में आ रहा है जिसके नतीजे में खाड़ी देशों और ख़ासकर ओमान ऐसे लोगों को भर्ती करना चाह रहा है जो सही तरीक़े से प्रशिक्षित हो वर्ना वो अपने लोगों पर संतोष करना चाहता है. </p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/international-48715355?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भारत के एक बड़े झटके से बचा पाकिस्तान पर खेल अभी बाक़ी है</a></li> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/international-48728681?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">पाकिस्तान के पास हैं भारत से ज़्यादा परमाणु बम</a></li> </ul><figure> <img alt="ब्लूचिस्तान" src="https://c.files.bbci.co.uk/9211/production/_107739373_12e5fa25-b153-452d-8b46-1cfd6ec1fa5a.jpg" height="549" width="976" /> <footer>AFP</footer> <figcaption>सन 1958 में पाकिस्तान ने ओमान से ग्वादर 84 लाख डॉलर में ख़रीदा था</figcaption> </figure><h1>’हम जहां हैं, वहीं ठीक हैं'</h1><p>ओमान के शहर मस्कट के देशी इलाक़े वादिये हतात में ज़्यादातर आबादी तिरबत और ग्वादर से आने वाले लोगों की है. </p><p>गहराम और बलिख शेर के ज़्यादातर रिश्तेदार इसी इलाक़े से संबंध रखते हैं लेकिन अब गहराम ओमान जाने के बारे में उम्मीद नहीं रखते. अब वो बच्चों को पढ़ाकर अपना गुज़ारा करना चाहते हैं.</p><p>इनके मुताबिक़ ‘दूसरे देश की फौज में भर्ती होकर मैं अपने देश में रहने वाले अपने मां-बाप और रिश्तेदारों को रूस्वा नहीं करना चाहता. मैं इसके लिए तैयार नहीं हूं. मैं जहां हूं, वहीं ठीक हूं.'</p><p>इधर बलिख शेर का कहना था कि ‘हम दुनिया के किसी भी मुल्क चले जाएं हमें शक की निगाह से ही देखा जाता है. इसकी एक वजह हमारे देश का हमारे ख़िलाफ़ पक्षपाती रवैया है.'</p><p><strong>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां </strong><a href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi">क्लिक</a><strong> कर सकते हैं. आप हमें </strong><a href="https://www.facebook.com/bbchindi">फ़ेसबुक</a><strong>, </strong><a 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