भारतीय इतिहास का काला अध्याय

Updated at : 26 Jun 2014 7:03 AM (IST)
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भारतीय इतिहास का काला अध्याय

।। शिवानंद तिवारी ।। 26 जून 1975 देश के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन है और रहेगा. आज की नौजवान पीढ़ी ने इमरजेंसी का दौर नहीं देखा है. वह इमरजेंसी की कारगुजारियों से अवगत नहीं है. उन्हें अवगत कराने की जरूरत भी नहीं महसूस की जा रही. जबकि लोकतंत्र को कायम रखने और मजबूत बनाने […]

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।। शिवानंद तिवारी ।।

26 जून 1975 देश के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन है और रहेगा. आज की नौजवान पीढ़ी ने इमरजेंसी का दौर नहीं देखा है. वह इमरजेंसी की कारगुजारियों से अवगत नहीं है. उन्हें अवगत कराने की जरूरत भी नहीं महसूस की जा रही. जबकि लोकतंत्र को कायम रखने और मजबूत बनाने के लिए नौजवान पीढ़ी को उस दौर की जानकारी होनी बेहद जरूरी है.

26 जून 1975 की सुबह रेडियो से राष्ट्र को संबोधित करते हुए इंदिरा गांधी ने कहा था कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए यह कदम है. उन्होंने आरोप लगाया कि गरीबों के हक में उन्होंने जो काम किये हैं, उन्हें पटरी से उतारने के लिए देश में अराजकता का माहौल पैदा किया जा रहा है, इसलिए मजबूरन उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है.

इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाने की परिस्थिति पैदा करने की पूरी जवाबदेही जेपी और उनके आंदोलन पर डाल दिया. लेकिन सवाल है कि क्या सचमुच इमरजेंसी जेपी और उनके आंदोलन के दबाव में लगायी गयी थी? हकीकत है कि उस समय तथा इमरजेंसी के बाद सामने आये तथ्यों ने इंदिरा गांधी के दावे को सफेद झूठ साबित कर दिया.

मुङो याद है 12 जून को जेपी के साथ ही हमलोगों ने पीरो (भोजपुर) के डाकबंगला में जगमोहन लाल सिन्हा द्वारा दिया गया इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सुना था. इस फैसले में राजनारायण जी की चुनाव याचिका पर सुनवाई करते हुए इंदिरा गांधी द्वारा अपने चुनाव में भ्रष्टाचार का सहारा लेने के आरोप को सही पाते हुए उसे अवैध घोषित कर दिया गया. जेपी भोजपुर के नक्सल प्रभावित इलाके में दो दिन के दौरे पर थे. उस क्षेत्र में अपनी दो सभाओं में उन्होंने इस फैसले का जिक्र तक नहीं किया, जबकि हमलोग उनकी प्रतिक्रि या जानने के लिए बेचैन थे. दूसरे दिन आरा के रमना मैदान की सभा में जेपी ने इंदिरा गांधी से नैतिकता के आधार पर प्रधान मंत्री के पद से इस्तीफा देने की मांग की.

उसके बाद देश भर से इस्तीफे की मांग शुरू हो गयी. दरअसल प्रधानमंत्री की कुर्सी को बचाना ही इमरजेंसी की एकमात्र वजह थी, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द नहीं किया. जस्टिस कृष्ण अय्यर ने उनको अंतरिम राहत दी. उन्होंने कहा इंदिरा गांधी संसद में जा सकती हैं, लेकिन न तो बहस में भाग लेंगी और न वोट डाल पायेंगी. इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद ही इमरजेंसी की योजना पर विचार शुरू हो गया था. इंदिरा जी की दोस्त पुपुल जयकर ने लिखा है कि गिरफ्तारी की लिस्ट बनायी जाने लगी.

खुद इंदिरा जी उस लिस्ट को बना रहीं थीं. इमरजेंसी की घोषणा पर राष्ट्रपति जी के दस्तखत के पहले ही इमरजेंसी के प्रावधानों के अंतर्गत गिरफ्तारी शुरू हो गयी. जेपी, मोरारजी देसाई सहित तमाम बड़े नेता 25 जून की आधी रात से लेकर अगली सुबह तक गिरफ्तार कर लिये गये. जबकि इमरजेंसी की घोषणा पर राष्ट्रपति का दस्तखत 26 जून को सुबह दस बजे के लगभग हुआ था और दोपहर में वह गजट में आया. 25 जून को दिल्ली में बिजली आपूर्ति करने वाले प्राधिकरण के जीएम को रात दस बजे इंदिरा जी की ओर से आदेश मिला कि रात दो बजे से दिल्ली के तमाम समाचारपत्रों की बिजली आपूर्ति बंद कर दी जाए. जीएम उस वक्त दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर के घर उनसे मिलने गये थे. उन दोनों ने इमरजेंसी के बाद गठित शाह कमीशन के सामने अपनी गवाही में यह बात कही है.

इमरजेंसी और उसके दरम्यान देश भर में मीसा तथा डीआइआर में 1,11,000 लोग गिरफ्तार किये गये थे. उनमें कई यातना के शिकार भी हुए थे. खुद जेपी की किडनी नजरबंदी के दरम्यान खराब हो गयी थी. कर्नाटक की मशहूर अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ स्नेहलता रेड्डी जेल से बीमार हो कर निकलीं और उसके बाद उनकी मौत हुई. अपनी जेल डायरी में उन्होंने जेल यातनाओं के बारे मेंलिखा है.

इन कहानियों को बार-बार याद करने और बराबर चौकस रहने की जरूरत है, ताकि देश को दुबारा कभी वैसे काले दिन का सामना नहीं करना पड़े. साथ ही साथ कोई सत्तारूढ़ दल वैसी हरकत करने की कोशिश नहीं कर सके, इसके लिए भी निरंतर सजगता जरूरी है.

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