"ग़रीबों की कला ग़रीब का बोझा उठा सकती है'

Updated at : 16 Jun 2014 3:10 PM (IST)
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"ग़रीबों की कला ग़रीब का बोझा उठा सकती है'

दलजीत अमी चंडीगढ़ से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए सैमुअल जॉन जब शेर और जंगल की कहानी को अपने नाटक के ज़रिए सुनाते हैं तो इसमे दिलचस्पी भी क़ायम रहती है और इसके अर्थ भी बदल जाते हैं. सैमुअल जॉन इस जानी-पहचानी कहानी को अपने अंदाज़ में पेश करते हैं. कहानी सब को मालूम है […]

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सैमुअल जॉन जब शेर और जंगल की कहानी को अपने नाटक के ज़रिए सुनाते हैं तो इसमे दिलचस्पी भी क़ायम रहती है और इसके अर्थ भी बदल जाते हैं.

सैमुअल जॉन इस जानी-पहचानी कहानी को अपने अंदाज़ में पेश करते हैं. कहानी सब को मालूम है जिनमें कहानी का किरदार गधा भी शामिल है.

गधा जान बचाने की लिए शेर को ख़रगोश वाली तर्ज़ पर कुएं तक ले जाता है. जो कहानी दर्शकों से लेकर गधे तक ने सुन रखी है वह शेर ने भी सुन रखी है. इसके बाद गधा भागता है. शेर पीछे है. गधा कमज़ोर, दलित, मज़दूर और ग़रीब की बोली बोलता है. शेर ताक़तवर, सवर्ण जाति, मालिक और अमीर के मुहावरे में बात करता है.

भागते-भागते गधे की दुलत्ती शेर को लगती है. शेर कराह उठता है. गधे को तुरंत अहसास होता है कि उसकी सब से बुरी आदत मानी गई दुलत्ती ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त है.

दुलत्ती के हमलों से गधा सब से ताक़तवर माने गए शेर को मार डालता है. दुलत्ती सिर्फ़ गधे की ताक़त नहीं बल्कि सैमुअल जॉन की कला की भी सबसे बड़ी ताक़त है.

जिसका नाटक उसका

पंजाब के संगरूर ज़िले के गांव चंगाली कलां में सैमुअल जॉन का घर है. तीन कमरों के आगे बांसों की छत है, आगे बांसों की दिवार है. यहीं पर सैमुअल अपने कलाकारों को नाटक का अभ्यास करवाते हैं.

पंजाबी यूनिवर्सिटी पटिआला से थिएटर एंड टेलीविज़न विभाग से एमए करने के बाद अदाकार बनने की लिए मायानगरी मुंबई गए थे. कुछ भी रास नहीं आया तो चंगाली कलां पहुँच गए.

कई सवाल थे जो सैमुअल को परेशान कर रहे थे. जिस दलित समाज में वे पैदा हुआ उसके सवालों, मुद्दों तथा जज़्बात को कला में कैसे पेश किया जाए और यह कला दलित समाज तक कैसे पहुंचे? कौन सा नाटक हो, उसका ख़र्च कौन उठाएगा?

कुछ देर की दुविधा की बाद सैमुअल ने फ़ैसला किया, जिनके लिए नाटक होगा उन्हीं जैसी प्रस्तुती होगी और वही उसका ख़र्च उठाएँगे.

सैमुअल ने अपने पुराने दोस्त कंवलजीत ढींडसा के स्कूल में ओपन एयर थिएटर बनाया और अख़बार में इश्तिहार के पर्चे डाल कर या गांव के गुरुद्वारों के स्पीकर्स द्वारा लोगों तक जानकारी पहुंचाई.

उन दिनों सैमुअल की जेबों में लोगों द्वारा नाटक देखकर दिए हुए पांच-पांच के नोट होते थे. सैमुअल को अभी भी और कुछ करना था, उन्हें अपने नाटक के किरदारों के और पास जाना था.

उन्होंने फ़ैसला कर लिया कि कोई प्रबंधक नहीं और कोई पक्की जगह नहीं, नाटक हर प्रबंध, प्रबंधक और स्थान की सीमा से आज़ाद.

नया सफ़र

इस मोड़ से सैमुअल का वह सफ़र शुरू होता है जो जंगल और शेर की कहानी के नए अवतार तक पहुंच गया है. जाति आधारित भेदभाव, दलितों का बहिष्कार, शोषण आदि मुद्दे सैमुअल के नाटकों का हिस्सा बने.

वो दलित समाज में जाते हैं, नाटक करते हैं और फिर चादर फैला देते हैं. लोग अपनी मर्ज़ी से चादर पर नग़द से लेकर घरेलू सामान तक दे देते हैं, जिसमें आटा, चीनी, चाय पत्ती, नमक और गुड़ जैसी चीज़ें शामिल होती हैं.

सैमुअल इस सामान को अपना सम्मान मानते हैं और सारा सामान चादर में बांध कर घर ले आते हैं.

रोज़ग़ार का ज़िम्मा सैमुअल की जीवन साथी जसविंदर उठातीं हैं जो स्कूल में संगीत पढ़ाती हैं. ये दोनों यूनिवर्सिटी में इकट्ठे पढ़े हैं.

सैमुअल कहते हैं कि उनकी कला पैसे के लिए नहीं बल्कि सामाजिक जागृति के लिए है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई फ़िल्म समारोहों में इनाम जीतने वाली फ़िल्म ‘अन्ने घोड़े का दान’ में सैमुअल ने अहम भूमिका निभाई है. उनकी लघु फ़िल्म ‘आतु खोज़ी’ बहुत चर्चा में रही है.

जूठन

जब बात पसंद की आती है तो सैमुअल कहते है, "ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ और मोहन लाल फिल्लोरीआ की कहानी ‘मोची का पुत्र’ पर आधारित उनके नाटक उनके पसंदीदा हैं."

अभी सैमुअल ने अपने नाटक में कुछ तब्दीली की है. वह ख़ुद बताते हैं, "अभी मैं दलितों के साथ छोटे किसानों के बारे में नाटक कर रहा हूँ. बराबरी वाला समाज इनकी सबसे बड़ी ज़रूरत है जो मेरी कला का उद्देश्य है."

सैमुअल के नाटक में शेर का शिकार गधा करता है और सवाल करता है की उसे बेअक़्ल बना कर पेश करना ताक़तवर की साज़िश है. इस ताक़त का शिकार होने के साथ-साथ इसी साज़िश का हिस्सा होना ख़तरनाक है.

सैमुअल का नाटक शुरू होता है. सारे कलाकार एकसाथ बोलते हैं, "नाटक, नाटक, नाटक; नाटक, नाटक, नाटक." नाटक ख़त्म होता है तो सैमुअल ज़ोर से शुरू करते हैं, "यह नाटक नहीं है. हमारी ज़िंदगी है. इस नर्कनुमा ज़िंदगी को बदलना है."

जब सैमुअल से पूछा जाता है की वह कला के नाम पर सामाजिक तब्दीली की बात करते हैं, लेकिन कला इतना बोझ कैसे उठाएगी?

सैमुअल कहते हैं, "ग़रीब जब इतना बोझा उठा रहा है, तो ग़रीब की कला भी ग़रीब का बोझा उठा सकती है." इतना कहते हुए सैमुअल की आँखों में एक चमक कौंध जाती है.

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