प्रभात खबर विशेष, कुछ सवाल, कुछ सुझाव

Updated at : 15 Jun 2014 4:58 PM (IST)
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प्रभात खबर विशेष,  कुछ सवाल, कुछ सुझाव

संसद के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति के अभिभाषण के माध्यम से नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने भावी एजेंडे को देश के सामने पेश किया. इसमें ‘सबका साथ, सबका विकास’ के वादे के साथ, 2014 के जनादेश की भावना के अनुरूप काम करने और विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की बात कही गयी है. […]

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संसद के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति के अभिभाषण के माध्यम से नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने भावी एजेंडे को देश के सामने पेश किया. इसमें ‘सबका साथ, सबका विकास’ के वादे के साथ, 2014 के जनादेश की भावना के अनुरूप काम करने और विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की बात कही गयी है. इस अभिभाषण पर बहस के दौरान विपक्षी सदस्यों ने जहां सरकार से वादे पूरे करने के तरीके के बारे में सवाल किया, वहीं कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये. पेश है अभिभाषण पर लोकसभा और राज्यसभा में बहस के दौरान विभिन्न दलों के कुछ नेताओं के भाषण का संपादित अंश.

इस बार के जनादेश में कई व्यापक पहलू हैं
।।अरुण जेटली।।
भाजपा सांसद, राज्यसभा
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लोग पांच साल की सरकार चाहते हैं. वे अच्छे शासन वाली सरकार चाहते हैं. वंशवाद, जातिवाद, वोट बैंक की राजनीति गुड गवर्नेस का विकल्प नहीं बन सकती है. लोग असहाय महसूस कर रहे थे. इसलिए यह जनादेश एक खास पार्टी के खिलाफ है और दूसरी पार्टी के प्रति उम्मीद का जनादेश है. राष्ट्रपति का अभिभाषण आनेवाले कई वर्षो के लिए एनडीए सरकार का रोडमैप है. यह केवल एक साल का एजेंडा नहीं, बल्कि एनडीए सरकार के भविष्य की रूपरेखा है और इसलिए जब नयी सरकार आती है तो यह स्वाभाविक है कि सरकार देश और विदेश के समक्ष अपना व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करे.
कुछ दिन पहले ही लोकसभा चुनाव संपन्न हुए हैं और यह विश्व का सबसे बड़ा चुनाव अभियान होता है. हमें इस बात पर गर्व है कि भारत एक सफल लोकतांत्रिक देश है, जहां शांतिपूर्वक सत्ता का हस्तांतरण होता आया है. नेता प्रतिपक्ष ने सही कहा कि हम बिना किसी द्वेष के अपनी जगह बदलते रहे हैं और मतदाताओं द्वारा दी गयी जिम्मेवारी को निभाते हैं. यही भारतीय लोकतंत्र की ताकत है. पांच साल पहले ऐसे मौके पर ही जहां नेता प्रतिपक्ष बैठे हैं, वहां मैं बैठा था और मैंने कहा था कि चुनाव नतीजे हमेशा जीतने और हारनेवाले सामने लाता है. लोकतंत्र की ताकत है कि जीतनेवाले को कभी असंवेदनशील नहीं होना चाहिए.
जीतनेवाले में हमेशा नम्रता होनी चाहिए और उसे यह याद रखना चाहिए कि वह जनादेश का रखवाला है और लोगों की उम्मीदों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है. हारनेवाले में भी कड़वाहट नहीं होनी चाहिए. उसे हार स्वीकार करना चाहिए. कोई भी शासन करने के लिए पैदा नहीं हुआ है और यही कारण है कि जगह बदलती रहती है. कोई भी व्यक्ति, जो चुनाव में सफल नहीं हुआ, उसे हमेशा नम्र होना चाहिए और हार के लिए मतदाताओं को दोष नहीं देना चाहिए.
इस चुनाव परिणाम के गंभीर मायने हैं. अगर हम ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गंभीरता से इन चुनाव परिणामों का विश्लेषण करें तो इसके कई व्यापक पहलू हैं. तीन दशक बाद, यानी 1984 के बाद पहली बार मतदाताओं ने किसी एक पार्टी को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत दिया है. हम एक गंठबंधन सरकार हैं और हम आगे भी गंठबंधन की सरकार चलायेंगे. पिछले तीन दशक में किसी भी चुनाव में किसी भी दल को 272 सीटें नहीं मिल पायी.
हमने सोचा कि हम गंठबंधन के युग में हैं. मेरी पार्टी मानती है कि 282 सीटें मिलने के बावजूद हम गंठबंधन के युग में हैं, क्योंकि गंठबंधन भारत के संघीय चरित्र को प्रदर्शित करते हैं. वे भारत की ताकत का प्रतिनिधित्व करते हैं. हम सहयोगियों को बोझ नहीं समझते. इस चुनाव परिणाम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि तीस साल बाद किसी पार्टी को स्पष्ट या व्यापक बहुमत मिला है. लेकिन इस बहुमत के भीतर बदलते भारत के पहलू को स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है. ऐसे कई उदाहरण है, जहां लोगों ने अपनी क्षमता के मुताबिक शासन नहीं चलाया. उन्होंने सोचा कि बिना अच्छे शासन के भी पार्टी के सामाजिक आधार, जिसे हम राजनीतिक भाषा में जाति आधारित समर्थन कहते हैं, के बूते फिर सत्ता पर काबिज हुआ जा सकता है. पूर्व में ऐसा हुआ है. लेकिन इसका दूसरा सबक यह है कि अगर आप अच्छा शासन नहीं चलायेंगे, तो जाति भी आपको नहीं बचा सकती.
इसलिए या तो आप काम करें या फिर खत्म हो जायें. कई पार्टियां हैं जो इकाई अंक में सिमट गयीं और कई का खाता भी नहीं खुल पाया. इन पार्टियों को गंभीरता से सोचना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में उनका ऐसा हाल क्यों हो गया. आज लोग बेहतर शासन चाहते हैं, न कि सिर्फ सामाजिक समीकरण. जिन लोगों ने यह सोचा कि अगर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, या उनके खिलाफ सजा मुकर्रर हो चुकी है, वे गंठबंधन राजनीति में अपने पद का प्रयोग कर बचे रह सकते हैं, उन्हें इस चुनाव में गंभीर झटका लगा है. जिन्होंने यह सोचा कि वे गंठबंधन बदल कर जनादेश हासिल कर लेंगे, उन्हें भी जनता ने सबक सिखाया है. जिन्होंने यह सोचा कि राजनीतिक नेतृत्व काबिलियत से नहीं बल्कि परिवार के भीतर ही विकसित होती है और नेतृत्व के लिए केवल वंशवाद पर टिके रहे, उन्हें भी जनता ने नकार दिया. अधिकांश लोग जिन्होंने खास जाति या समुदाय के ध्रुवीकरण, वोट बैंक की राजनीति, रणनीतिक मतदान के बारे में सोचा, उन्हें भी इस चुनाव में मुंह की खानी पड़ी. ये सारे तथ्य क्या प्रदर्शित करते हैं? यह दर्शाता है कि अब भारतीय लोकतंत्र उभर रहा है.
हमने लोकतंत्र को परिपक्व होते हुए देखा है, जहां लोगों ने ऐसा जनादेश दिया, जिसकी कई लोगों को उम्मीद नहीं थी. लोग राजनीतिक अस्थिरता नहीं चाहते हैं. लोग पांच साल की सरकार चाहते हैं. वे अच्छे शासन वाली सरकार चाहते हैं. वंशवाद, जातिवाद, वोट बैंक की राजनीति गुड गवर्नेस का विकल्प नहीं बन सकती है. लोग असहाय महसूस कर रहे थे. इसलिए यह जनादेश एक खास पार्टी के खिलाफ है और दूसरी पार्टी के प्रति उम्मीद का जनादेश है. इसलिए हमारी पार्टी या सहयोगी या गंठबंधन सभी को फायदा हुआ.
हमें सरकार के खिलाफ उपजे गुस्से का लाभ मिला. हमें इसलिए भी लाभ मिला कि हमारे नेता ने लोगों में उम्मीद जगायी. हम इस सच्चई को मानें या न मानें, लेकिन काफी अरसे बाद रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही थी और विपक्षी नहीं समझ पाये कि ऐसा क्यों हो रहा है. ये जमा की हुई भीड़ नहीं थी. वे इसलिए आ रहे थे, क्योंकि उनमें उम्मीद जग रही थी.इसलिए मैं समझता हूं कि हमारी सरकार पर काफी बड़ी जिम्मेवारी है, क्योंकि लोगों की उम्मीद हमारी सरकार से जुड़ी हुई है. आज देश कठिन चुनौती का सामना कर रहा है. 2004 में जब यूपीए की सरकार आयी तो देश की विकास दर 8.5 फीसदी थी. एनडीए सरकार ने आर्थिक मंदी और एशिया संकट के बावजूद अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाये रखा. लेकिन हमें 5 फीसदी आर्थिक विकास दर वाली अर्थव्यवस्था मिली है. अगर भारत में कोई सरकार न भी हो, तो विकास दर 5 फीसदी बनी रहेगी. कम विकास दर, उच्च महंगाई दर, 4.5 फीसदी से अधिक वित्तीय घाटा यूपीए सरकार की देन है. विदेशी निवेशक तो दूर, भारतीय निवेशक भी देश में निवेश करने से कतराने लगे.
निवेश नहीं होगा, तो रोजगार के मौके भी नहीं होंगे.मेरी स्पष्ट सोच है कि किसी भी लोकतंत्र में, खासकर संसदीय लोकतंत्र में, एक दलीय या गंठबंधन की सरकार में एक पद जो सबसे अधिक जबावदेह है वह है प्रधानमंत्री का. प्रधानमंत्री की बात अंतिम होनी चाहिए. मैंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रशंसा पहले भी की है. वे बेहद ईमानदार और विद्वान व्यक्ति हैं. लेकिन जबतक आप ऐसे व्यक्ति को अधिकार नहीं देंगे, सरकार नहीं चल सकती है. आप सरकार के बाहर कैबिनेट से और प्रधानमंत्री से अधिक शक्तिशाली ढांचा खड़ा नहीं कर सकते हैं.
मेरा मानना है कि कोई भी सरकार अगर देश को आगे ले जाना चाहती है, तो उसे सभी दलों से सर्वसम्मति बनानी चाहिए. अगर आप सोचते हैं कि विपक्षी दलों से आप जांच एजेंसियों के सहारे निबट लेंगे, तो वे उन्हें परेशान कर सकते हैं, लेकिन इससे चुनाव नहीं जीता जा सकता है. ऐसा कर आप सर्वसम्मति की प्रक्रिया को समाप्त कर देते हैं. इससे हमने यह सीखा कि सरकार क्रियाशील होनी चाहिए. सरकार को चलानेवाली प्रमुख संस्था है कैबिनेट़ अगर प्रधानमंत्री को कहीं भ्रष्टाचार दिखता है तो उन्हें तत्काल हस्तक्षेप कर रोकना चाहिए. उन्हें ऐसे मामलों में कठिन निर्णय लेना चाहिए. विकास योजनाओं में राज्यों से सलाह-मशविरा किया जायेगा. मैं एक बात साफ करना चाहूंगा कि पड़ोसी देशों के साथ हमारे रिश्ते देश के सामरिक हितों के आधार पर बेहतर करने की कोशिश की जायेगी.
अब चुनाव हो चुके हैं, तो हमें आपसी भेदभाव और कड़वाहट भुला देना चाहिए. हम चुनाव में पांच साल बाद मिलते हैं. इन पांच वर्षो में बेहतर प्रयोग से हम देश को मजबूत बनाने की कोशिश करेंगे.
16वीं लोकसभा में भारत की समृद्ध विविधता का दर्शन नहीं
।।सुगत बोस।।
लोकसभा सांसद, तृणमूल कांग्रेस
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16वीं लोकसभा में भारत की समृद्ध विविधता का दर्शन नहीं हो रहा है. इसे देखते हुए हमारी विशेष जिम्मेवारी है कि प्रतिनिधित्व नहीं पा सके अल्पसंख्यकों को मजबूत आवाज दें. रवींद्रनाथ टैगौर ने हमें पहले ही चेताया है कि जहां उचित मतभिन्नता हो, उसे उचित सम्मान देना चाहिए और उचित जगह पर उसका विरोध कर ही एकता हासिल की जा सकती है. एकता केवल कानूनी बातें कह कर हासिल नहीं की जा सकती है.
अपने हृदय में भारत की लौ लिये मैं अपनी मातृभूमि की सेवा करने के लिए इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर विदेश से भारत आया हूं. मैं प्रधानमंत्री द्वारा अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाने के लिए धन्यवाद देता हूं. हमें अपने पड़ोसी देशों के प्रति एक ऐसे उदार विदेश नीति की जरूरत है, ताकि क्षेत्रीय समस्याएं वैश्विक स्तर पर भारत को प्रमुख भूमिका निभाने से रोक नहीं पायें. 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती है भारत और चीन का शांतिपूर्वक अपने उभार का प्रबंधन करना. हम चीन के विकास की बात कर रहें हैं, लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि चीन में एक पार्टी की तानाशाही सरकार है. ऐसे में हमारे विकास की राह लोकतंत्र पर आधारित होनी चाहिए. मैं सरकार की इस बात से सहमत हूं कि जापान विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रर निर्माण में हमारा प्रमुख सहयोगी हो सकता है.
यह सही है कि पिछले कुछ सालों में नीतियों में संघीय भावना की घोर अनदेखी हुई है. राजशाही का युग खत्म हो चुका है और लोकतंत्र में केंद्र सरकार को सरकार की तरह काम करने के बारे में सीखना चाहिए. हम नयी सरकार के राज्यों के साथ सहयोग के वादे का स्वागत करते हैं. जब केंद्र सरकार राज्यों का अधिकतर पैसा कर्ज के ब्याज के तौर पर वसूल कर लेती है, तो निश्चित तौर पर यह संघीय भावना का उल्लंघन है. मैं केंद्र सरकार से आग्रह करता हूं कि कर्ज के बोझ से दबे राज्यों को राहत पहुंचाने के लिए वह अपनी नीतियां बताये.
पूर्व की सरकारों की गलतियों की सजा मौजूदा सरकार को नहीं दी जा सकती है. राज्यों की अपनी गलती के बिना, जिसमें मेरा राज्य भी शामिल है, गरीबी मिटाने के उसके विकासात्मक एजेंडे को रोका नहीं जा सकता. यह विचार पहली बार महान गुजराती नेता दादाभाई नौरोजी ने 19वीं शताब्दी में दिया था. मैं सरकार के इस दावे का घोर विरोध करता हूं कि वह देश के पश्चिमी हिस्से जैसा विकास पूर्वी क्षेत्र में करेगी. यहां इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि देश का पश्चिमी और उत्तरी हिस्सा मानव विकास सूचकांक, खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में दक्षिण और पूर्वी हिस्से से काफी पीछे है.
हमारी सबसे बड़ी चिंता घुसपैठ और अवैध प्रवासी नागरिकों पर सरकार की सोच को लेकर है. यह काफी संवेदनशील मुद्दा है और इसका पड़ोसी देशों से रिश्तों पर असर पड़ सकता है. इस मामले में कोई कदम उठाने से पहले सरकार को संबंधित राज्यों से सलाह-मशविरा करना चाहिए. हम इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे कि इस मुद्दे को अल्पसंख्यक विरोधी भाषा के तौर पर प्रयोग किया जाये.हम यह भी जानता चाहते हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में राज्य सरकार क्या और कैसे सहयोग कर सकती है. युवाओं के विकास के हित के लिए राज्य और केंद्रीय विश्वविद्यालयों की फंडिग में असमानता को दूर किया जाना चाहिए. मैं इससे सहमत नहीं हूं कि सभी राज्यों में आइआइटी, आइआइएम खुलना चाहिए, बल्कि हमें प्राथमिक, माध्यमिक शिक्षा की मजबूत नींव पर विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों के गठन पर ध्यान देना चाहिए.
सरकार का गंगा को स्वच्छ करने का इरादा स्वागतयोग्य है. ऐसा कहा जाता है कि पापी से पापी व्यक्ति के पाप गंगा में डुबकी लगाने से दूर हो जाते हैं. जिस प्रकार बनारस के लोगों के लिए गंगा मां है, उसी तरह बंगाल के लोगों के लिए भी मां है. सुषमा जी ने ‘हाहाकार’ शब्द का प्रयोग किया है. अगर हम गंगा क्षेत्र में दलित महिला के साथ हुए अत्याचार के ‘हाहाकार’ को नहीं सुन पा रहे हैं, तो हम सही मायने में लोगों के जनप्रतिनिधि होने का दावा नहीं कर सकते हैं.इसके अलावा पुणो में एक युवा मोहसिन शेख की मौत पर दुख है. वह सरकार के अच्छे दिन लाने के दावे को देखने के लिए जीवित नहीं है. खेल की दुनिया में जिस हॉकी स्टिक से भारत को गर्व मिली उसी स्टिक का हथियार बना कर भावना की अभिव्यक्ति का कत्ल कर दिया गया.16वीं लोकसभा में भारत की समृद्ध विविधता का दर्शन नहीं हो रहा है. इसे देखते हुए यह हमारी विशेष जिम्मेवारी है कि प्रतिनिधित्व नहीं पा सके अल्पसंख्यकों को मजबूत आवाज दें.
90 फीसदी काम तो पहले ही हो चुके हैं
।।गुलाम नबी आजाद।।
राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष
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यदि आप श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं, तो आपका जो डाक्यूमेंट्स है, उसमें इस तरह की कोई चीज नहीं है. दूसरा, आपका ‘सबका साथ, सबका विकास’ तो आपने डॉ मनमोहन सिंह के इन्क्लूसिव डेवलपमेंट का अनुवाद कर दिया है. मिनिमम गवर्नमेंट का मतलब तो यही है कि एक आदमी सरकार चलाये और सभी काम वही करे.
कांग्रेस पार्टी इस देश की एक रिस्पांसिबल पार्टी है और दुनिया की चंद पुरानी पॉलिटिकल पार्टी में से एक है. चाहे आज हमको उतना बहुमत या जनादेश नहीं मिला है, जितना हमारे साथियों को मिला है, लेकिन हमारे आदर्श, हमारी नीतियां और हमारे कार्यक्रम हमेशा भारत की जनता के लिए थे, हैं और रहेंगे. हमारी लीडर और यूपीए चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधीजी की लीडरशीप और डॉ मनमोहन सिंहजी की प्राइम मिनिस्टिरशिप में हमने पिछले 10 सालों में जो काम किये हैं, उनका हमें गौरव है और गौरव रहेगा. हम विपक्ष में रह कर विरोध या बुराई नहीं करेंगे. हम एक कंस्ट्रक्टिव विपक्ष का रोल अदा करेंगे.
सरकार जो भी काम देश के हित में करेगी या जो भी नीतियां वह गरीब लोगों के लिए, पिछड़े वर्गो के लिए, अल्पसंख्यकों के लिए, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए, किसानों, मजदूरों, महिलाओं के लिए, युवकों के लिए बनायेगी, उनमें हमारा बराबर का समर्थन और सहयोग रहेगा. हां, जहां खामियां, कमियां या कमजोरियां रहेगी, उनको हम जरूर सदन के अंदर और सदन के बाहर उठायेंगे और हमारा जो दृष्टिकोण होगा, उसको हम जनता के सामने हमेशा लाते रहेंगे. हालांकि राष्ट्रपति के अभिभाषण में सरकार ने हमारे प्रोग्राम्स की नकल की है. लेकिन नकल के लिए भी अकल होनी चाहिए थी, वह इस सरकार में नहीं है. कई जगहों पर सिर्फ अनुवाद कर हमारे प्रोग्राम्स को, जिनको हमने 90 प्रतिशत तक लागू कर दिये हैं, उन सब को अलग नाम बना कर शामिल कर लिया गया है.
जनादेश मिला है, इसके लिए बधाई, लेकिन जनादेश अपने साथ जिम्मेदारियां भी लाता है. यह जो जन आदेश का बोझ है, इस बोझ को उठाने के लिए कंधे बड़े मजबूत होने चाहिए. आप तो 284 सीटों का ही जन आदेश लेकर आसमान से बातें करने की बात करते हैं, हम तो लोकसभा में 414 सीटों का भी जनादेश ले चुके हैं. 282 से सवा सौ से भी ज्यादा सीटें होती है. इसलिए जनादेश पर, आंकड़ों पर, संख्या पर और पैसे पर अगर किसी ने गुरूर किया तो वह गया. इसीलिए इसको हम अहंकार न समझें. यह जनादेश लेकर यदि आप लोगों के उत्थान के लिए, गरीबी कम करने के लिए काम करेंगे, तो हम आपके साथ हैं. एक पॉलिटिकल स्टूडेंट के नाते हम एक ही भारत को जानते हैं, जिसे हम हिंदुस्तान, इंडिया या भारत कहते हैं. लेकिन इन 15 दिनों में ही एक अलग भारत कहां से आ गया. यदि आप श्रेष्ठ भारत की बात करते हैं, तो आपका जो डाक्यूमेंट्स है, उसमें इस तरह की कोई चीज नहीं है. दूसरा, आपका ‘सबका साथ, सबका विकास’ तो आपने डॉ मनमोहन सिंह के इन्क्लूसिव डेवलपमेंट का अनुवाद कर दिया है. मिनिमम गवर्नमेंट का मतलब तो यही है कि एक आदमी सरकार चलाये और सभी काम वही करे. यदि इसका मतलब यही है तो आपको मुबारक. कई देशों में यह सिस्टम भी है, लेकिन हमारे देश में नहीं है.
इस देश की दो तिहाई आबादी देहात में रहती है. देहात और शहर को मिलाकर आपने एक नया शब्द रूर्बन (रूरल-अरबन) किया है, जिसके तहत सरकार गांवों की क्वालिटी इंप्रूव करेगी. वह पंचायती राज के साथ-साथ सड़कें, बनायेगी, बिजली पहुंचायेगी, पीने का पानी पहुंचायेगी और रूरल तथा अर्बन के बीच जो फासला है उसे कम करेगी. लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि इनमें से 90 प्रतिशत प्रोग्राम्स हमने पहले से ही शुरू कर दिये हैं. पंचायती राज की बात की, तो उसे 73वें और 74 वें संविधान संशोधन कर किसने लाया, राजीव गांधी ने. पंचायती राज में 33 फीसदी महिलाओं के लिए आरक्षण किसने लाया, राजीव गांधी ने. पीएमजीएसवाई, मनरेगा, इंदिरा आवास आदि योजनाओं के तहत 1000 से लेकर 250 आबादी वाले ज्यादातर गांवों को जोड़ चुके हैं. इसी तरह ऊर्जा के क्षेत्र में, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना और जवाहर लाल नेहरू सोलर मिशन के तहत एक लाख से ज्यादा गांवों का विद्युतीकरण किया जा चुका है. दो करोड़ बीपीएल हाउसहोल्ड्स को पहले ही हमने फ्री इलेक्ट्रिसिटी दे दी है. कितना बड़ा गैप है. जिस काम को हमलोगों ने शुरू कर दिया है, उस प्रोग्राम के विषय में आज अभी आप सोच ही रहे हैं. शिक्षा पर सर्वशिक्षा अभियान के तहत 60 लाख स्कूल गांवों में खोल गये हैं. इसलिए नयी सरकार जो भी प्रोग्राम्स लेकर आयी है, उस पर पिछले 10 सालों में 90 फीसदी काम हो चुके हैं. ऐसे प्रोग्राम हम पहले ही कर चुके हैं, जो आपके लिए रास्ता है.
किसानों को जितना मिनिमम सपोर्ट प्राइस यूपीए सरकार ने दी है, उतना कभी नहीं दिया गया है. मिनिमम सपोर्ट प्राइस को 630 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ा कर 1400 रुपये प्रति क्विंटल किया गया. पैडी को 550 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ा कर 1300 रुपये प्रति क्विंटल किया गया. यही कारण है कि आज हमारे यहां फूड ग्रेंस का रिकार्ड उत्पादन हुआ. इसी तरह से हॉर्टीकल्चर और एनीमल हस्बैंड्री का जिक्र किया गया है. लेकिन हमें खुशी है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश, वेजीटेबल के मामले, में है. एनीमल हस्बैंड्री पर ध्यान देने के कारण ही आज भारत दुग्ध उत्पादन में विश्व में पहला स्थान रखता है. फिशरीज पदार्थो के उत्पादन में दुनिया में दूसरा स्थान है. जहां तक उच्च शिक्षा का सवाल है, तो हमने पिछले 10 सालों में 17 से बढ़ाकर 44 सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनायी है. पहले केवल सात आइआइटीज थे, अब 16 हैं. पहले छह आइआइएम्स थीं, आज 13 हैं.अंत में यही कहूंगा कि हिंदुस्तान की एकता, अखंडता और हमारी सीमाओं की रक्षा हम सब के लिए जरूरी है. सरकार के अच्छे कामों का जहां साथ देंगे, वहीं गरीब और आम जन विरोधी नीतियों का विरोध करेंगे.
जरूरी है युवाओं का सशक्तीकरण
।।सीताराम येचुरी।।
राज्यसभा सांसद, माकपा
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2009 में सरकार ने कहा था कि हम प्राथमिकता के आधार पर मुद्दों पर काम करेंगे. उन्होंने ऐसा नहीं किया और उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी. इस बार राष्ट्रपति के अभिभाषण में केवल उद्देश्यों की घोषणा है. आपके उद्देश्य कितने भी अच्छे और उचित हों, लेकिन देश जानता चाहता है कि इन्हें कैसे हासिल किया जायेगा?
संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति के अभिभाषण पर मुझे बोलने का मौका मिला है. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मैं अभिभाषण के तथ्यों से पूरी तरह सहमत हूं. हम उन चिंताओं की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं जो जनादेश को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं, कि देश के लोग वास्तविकता में क्या चाहते हैं. सदन के नेता और मेरे मित्र की बात सुनने के बाद मुझे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंगलैंड में हुए चुनाव में मिली हार के बाद विंस्टन चर्चिल का कथन याद आया. वे चुनाव में मिली हार से अचंभित थे. इस हार के बाद चर्चिल ने कहा कि इस परिणाम से मैंने सिर्फ एक सबक यह सीखा कि जीत में उदारता और हार में नम्रता दिखानी चाहिए. लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं दिख रहा है. मैं किसी को दोषी नहीं ठहरा रहा. लेकिन उदारता और नम्रता नहीं दिखने से मुझे दुख हो रहा है. चुनाव खत्म हो चुके हैं. चुनाव में हमने अपने प्रतिद्वंद्वियों से निबट लिया. ऐसे में अब समय है कि भविष्य में क्या हो इस पर बात की जाये. नयी सरकार का गठन हो चुका है. हम उन्हें बधाई देते हैं कि वे लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरें. हमने सदन के अंदर और बाहर भी जनहित के मुद्दों पर सरकार का साथ दिया है और आगे भी ऐसा करते रहेंगे. लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण से वैसा विश्वास पैदा नहीं होता, जैसी उम्मीद थी. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि इसमें चुनाव प्रचार के दौरान नारे समाहित हैं. मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है. सवाल यह है कि आपने जो वादा किया है उसे कैसे पूरा करेंगे? इसके बारे में कोई ब्लूप्रिंट नहीं है.
मुझे नहीं लगता कि गरीबी खत्म होगी
।।डी राजा।।
राज्यसभा में सीपीआइ सांसद
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मैं महिला आरक्षण बिल को पास करने के विचार का स्वागत करता हूं. अब आपको कौन रोकने जा रहा है? लोकसभा में आपके पास पूर्ण बहुमत है. एनडीए के पास पूर्ण बहुमत है. जैसा कि आपने वादा किया है, उसके अनुरूप आप इच्छाशक्ति और दृढनिश्चयता दिखाते हुए महिला आरक्षण बिल पास करें.जयराम रमेश के भाषण को ध्यान से सुनने के बाद इस बात की पुष्टि ही हुई है कि कांग्रेस व भाजपा दोनों ही सरकारें आर्थिक नीतियों व विदेश नीति के मामले में एक तरह की नीतियों का अनुकरण करती हैं. ऐसी स्थिति में कॉरपोरेट पूंजी और विदेशी वित्तीय पूंजी का इन दोनों दलों में काफी प्रभाव है. मुझे ऐसा नहीं लगता कि हम आनेवाले दिनों में गरीबी को कम कर सकते हैं, या पूरी तरह से समाप्त कर सकते हैं.
मैं कई विषयों पर अमेंडमेंट मूव कर रहा हूं, मैं यहां उनकी चर्चा करने में और समय नहीं लगाना चाहता. सरकार ने सही ही चिन्हित किया है कि कृषि उनके सर्वाधिक प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में से एक है. सरकार को राष्ट्रपति द्वारा दिये गये अभिभाषण में किसानों पर बनाये गये राष्ट्रीय आयोग की अनुशंसाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए था. मानव संसाधन विकास मंत्री यहां बैठे हुए हैं. अभिभाषण में एक नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की चर्चा है. पर तथ्य यह है कि भारतीय शिक्षा ज्यादा-से-ज्यादा निजीकरण और व्यवसायीकरण की ओर बढ़ रही है. 12वीं पंचवर्षीय योजना उच्च शिक्षा में पीपीपी मॉडल की बात करती है. आखिर उन छात्रों का क्या होगा, जो गरीब, समाज के निचले तबके के और हाशिये पर हैं. पूववर्ती सरकार ने भी 12वीं पंचवर्षीय योजना को मंजूरी दी. कहा गया कि पीपीपी मॉडल की अनुमति उच्च शिक्षा के लिए दी जायेगी. वर्तमान सरकार भी यही बात कहती है. क्या आप 12वीं पंचवर्षीय योजना पर फिर से विचार करेंगे?
बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल को दीजिए विशेष राज्य का दर्जा
।।केसी त्यागी।।
राज्यसभा सांसद, जदयू
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राष्ट्रपति जी के पूरे अभिभाषण और जो भारतीय जनता पार्टी का फुल फ्लेज्ड मेनिफेस्टो है, उसमें एक भी शब्द ‘बिहार’ का नहीं है. मैं चाहता हूं कि आप नीतीश कुमार जी से लड़ते रहिये, स्कोर तय कीजिये, लेकिन बिहार की गरीब जनता के साथ अन्याय मत कीजिये.
मैं भाजपा को मुबारकवाद देता हूं कि जनता ने उन्हें शासक की भूमिका दी है और हमें प्रहरी की. आप अच्छा काम करेंगे, तो हम आपका भरपूर सहयोग देंगे. आप देरी करेंगे, तो हम याद दिलायेंगे. आप नहीं करेंगे, तो हम आपको चेतायेंगे और आप गलत करेंगे तो हम आपका विरोध करेंगे. चार जनादेश के नतीजे मेरे सामने है और मैं चारों का साक्षी रहा हूं. वर्ष 1971 में कांग्रेस पार्टी को 352, सीपीआइ-सीपीएम को 48 सीटें मिलीं और भाजपा, जो उस जमाने में जनसंघ थी, काफी कमजोर थी. 1973 आते-आते इंदिरा गांधी के इस जनादेश का नतीजा हमने-आपने देखा था, जब गुजरात में आंदोलन हुए और जय प्रकाश जी 1974 में आ गये और 1975 में आपातकाल लग गया.
फिर 1977 में आपकी और हमारी साझा सरकार बनी. कांग्रेस पार्टी का उत्तर भारत में अब से ज्यादा बुरा हाल तब हुआ था. लेकिन उस जनादेश के तीन साल के अंदर ही जनता हमसे और आपसे ऊब गयी. फिर 1980 का जनादेश आ गया, जिसमें कांग्रेस पार्टी को 351 सीटें मिलीं. 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी, तो उसकी संवेदना से फिर एक चुनाव हुआ 1984 का. उसमें कांग्रेस को 414 सीटें मिली थीं. इतनी सीटें तो जवाहर लाल नेहरू को भी नहीं मिली थीं. तब भाजपा को केवल दो सीटें मिली थीं और उसके बड़े-बड़े नेता चुनाव हार गये थे. इसलिए किसी को भी जनादेश पर बहुत इतराने की जरूरत नहीं है. आपको जनता ने गुड गवर्नेस के लिए वोट दिये हैं, खराब करने के लिए नहीं. नकवी कह रहे थे कि धर्मनिरपेक्षता, वोट बैंक, फेक सेकुलरिज्म शब्द नहीं हैं. महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के आंदोलन की जो लड़ाई लड़ी गयी थी, ‘धर्मनिरपेक्षता’ उससे निकला हुआ शब्द है. हिंदू महासभा के नेता और मुसलिम लीग के नेता आजादी नहीं चाहते, अंगरेज रहें तो रहें, कोई फर्क नहीं पड़ता. यहां पर नजमा जी बैठी हुई हैं, इनके परिवार में बड़े-बुजुर्ग मौलाना अब्दुल कलाम आजाद थे. 1947 में मुसलमान गांधीजी के पास गये और कहने लगे कि हम पाकिस्तान नहीं जाना चाहते. गांधीजी के कहने पर मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने लाल किले से भाषण दिया कि लौट आओ तुम्हारे पुरखों की कब्रें यहां पर हैं. यह लाल किला तुम्हारा है. यह जामा मसजिद तुम्हारी है. तुमने गंगा-जमुना के पानी से वजू किया है, वे मुसल्ले तुमको याद कर रहे हैं. जो मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे, हम उन मुसलमानों को रेलों से निकाल कर लाये. वह थी गांधीजी की धर्मनिरपेक्षता. आज आप गांधी पर भी सवाल उठा रहे हैं.
आज एक समाचारपत्र में पढ़ रहा था, जिसमें लिखा था कि यह सावरकर के विचारों की जीत हो गयी और गांधी की हार हो गयी. यह ठीक नहीं है, क्योकि गांधी तो इतना बड़ा है कि स्वीडन के अंदर जो नोबेल पुरुस्कार कमेटी है, उससे पूछा गया कि आपने गांधी को नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं दिया तो उसने कहा कि हम जीजस क्राइस्ट को इन पुरस्कारों से बड़ा मानते हैं. गांधीजी तो इतने बड़े हैं, आप उनको छोटा मत करो. नेताजी सुभाषचंद्र बोस गांधीजी की कई बातों के खिलाफ थे. उनकी जीवनी पढ़ रहा था, उसमें उन्होंने कहा है कि यह मुझको खड़ा हुआ जीसस क्राइस्ट जैसा लगता है और जब बैठ कर भाषण देता है तो गौतम बुद्ध लगता है. आजादी के बाद और आजादी से पहले हमने कोई ऐसा सूरमा पैदा नहीं किया, जिसकी पूरी दुनिया में संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2011 में जन्मदिन की वर्षगांठ मनायी हो.
आप कितना भी एजेंडा चलाइये, मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन हिडेन एजेंडा मत चलाइये. हमलोगों ने बड़ी मुश्किल से, बड़ी कुर्बानियां देकर इस मुल्क को इकट्ठा किया है. तब ये शहर बने हैं. आप मुजफ्फर से नगर को, अली से गढ़ को और गाजी से पुर को बनाकर उसको कब्रिस्तान क्यों बनाना चाहते हैं. आपको जनादेश मिला है. आप सड़कें बनाइये, आप इलाज कराइये, आप देश को दुनिया का सबसे उन्नत भारत बनाइये, हम आपके साथ हैं. धारा 370 की बात हो रही है. चुनाव आनेवाले हैं, इसलिए आपने उठा दिया. महाराष्ट्र में चुनाव होनेवाले है, तो आपने पुणो उठा दिया. ये इस समय के मुद्दे नहीं हैं. जनता ने इतने जज्बात के साथ आपको वोट दिया है. हम तो आपसे छह महीने पहले अलग हुए हैं और अरुण जी होते तो मैं उनको जबाव देता. उन्होंने नीतीश कुमार पर कमेंट किया है. जब इतनी पुरानी मित्रता हो. आप वैचारिक तौर पर विरोध करिये. एक जमाना वह था, जब नीतीश कुमार को इसी दिल्ली में पांच-पांच तरह के पुरस्कार मिले हैं. देश के बड़े पूंजीपतियों के संगठन और अखबारों के संगठन ने सबसे उम्दा मुख्यमंत्री का पुरस्कार दिया है. जहां तक इंसेंटिव की बात है, यहां नालंदा से मेरे सांसद मित्र बैठे हुए हैं. नालंदा के दो किसानों ने पूरी दुनिया में प्रति एकड़ सर्वाधिक चावल पैदा करने और सबसे ज्यादा प्रति एकड़ आलू पैदा करने का रिकार्ड बनाया है. लेकिन इस देश में पद्मश्री उनको नहीं बल्कि नाचने-गानेवालों को मिलेगा. अगर आपने उन किसानों को पद्मश्री दे दिया होता तो देश खाद्यान्न के मामले में जितना संपन्न है, उसका सौ गुणा होता, लेकिन आपकी प्राथमिकता दूसरी है.
इस सदन के अंदर जो गरीब लोग आ रहे हैं, चाहे किसी भी पार्टी के हों, उनके राजनीति करने के, चुनाव जीतने के दिन अब सदा के लिए चले गये है. अपने नेता की गुलामी करोगे तो उसकी इच्छा है कि चुनाव लड़ने के लिए पैसा दे या न दे और टिकट तो उसी को मिलेगा जिसके पास माल होगा. इसलिए सबसे ज्यादा करोड़पति इस संसद में आये हैं. आपके नेता ने तो बहुत अच्छी बात कही, हम और आप तो बहुत दिन साथ रहे, याद कीजिये कि एक तरकुंडे कमीशन बना था. जय प्रकाश जी ने खुद इसे बनाया था. उसमें क्या था. उसमें चुनाव सुधार था. चुनाव लड़ना अब आपके बस की भी नहीं है.
भाजपा के मेनिफेस्टो में ‘बिहार’ शब्द का जिक्र ही नहीं है. मैं यह बिहार के लिए नहीं कहना चाह रहा हूं. रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट में ‘बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा, चारों को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाये’ यह मांग की गयी थी. भाजपा के हमारे मित्र सुशील मोदी से लेकर रविशंकर प्रसाद तक, मोदी जी के कान में मंचों पर कहते थे कि ‘विशेष उस’ का जिक्र कर दीजिये, लेकिन मोदीजी ने नहीं कहा. उन्होंने कहा कि बिहार की मदद करूंगा, लेकिन अभिभाषण और भाजपा के मेनिफेस्टो में ‘बिहार’ शब्द नहीं है. मैं चाहता हूं कि आप नीतीश कुमार जी से लड़ते रहिये, स्कोर तय कीजिये, लेकिन बिहार की गरीब जनता के साथ अन्याय मत कीजिये. आप कांग्रेस मुक्त भारत बनाइये, मुझे एतराज नहीं है, लेकिन गांधीजी की और नेहरू जी की जो विरासत है वह बहुत बड़ी है, नेहरू आजादी की लड़ाई में साढ़े 11 साल जेल में रहे, उनकी बहन कृष्णा हथी सिंह ने लिखा है कि ‘हमारा बैग परमानेंटली जेल जाने के लिए तैयार रहता था’. कांग्रेस हटाओ, लेकिन इस देश की गांधी-नेहरू की विरासत को खत्म करने का काम मत करो.
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