फ़िल्म रिव्यू: 'फ़गली'

Updated at : 14 Jun 2014 11:35 AM (IST)
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फ़िल्म रिव्यू: 'फ़गली'

कोमल नाहटा वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक रेटिंग: * ‘फ़गली’ कहानी है चार दोस्तों की. एक पुलिस अफ़सर से मिलने के बाद कैसे उनकी ज़िंदगी में बड़ा ख़तरनाक बदलाव आ जाता है, यही फ़िल्म की मूल कथावस्तु है. देव (मोहित मारवाह), देवी (किरारा आडवाणी) , गौरव (विजेंदर सिंह) और आदित्य (आरफ़ी लांबा) चार दोस्त हैं. एक दिन, […]

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रेटिंग: *

‘फ़गली’ कहानी है चार दोस्तों की. एक पुलिस अफ़सर से मिलने के बाद कैसे उनकी ज़िंदगी में बड़ा ख़तरनाक बदलाव आ जाता है, यही फ़िल्म की मूल कथावस्तु है.

देव (मोहित मारवाह), देवी (किरारा आडवाणी) , गौरव (विजेंदर सिंह) और आदित्य (आरफ़ी लांबा) चार दोस्त हैं.

एक दिन, एक शख़्स (नुनु अग्रवाल) देवी से छेड़छाड़ करता है. जिससे नाराज़ होकर चारों दोस्त उसे सबक सिखाने के लिए उसका अपहरण कर लेते हैं.

(ये है अक्षय की ‘फ़गली’)

चारों जब नुनु को लेकर कार में घूम रहे होते हैं तभी उनका सामना पुलिस इंस्पेक्टर चौटाला (जिमी शेरगिल) से हो जाता है. जवानी के जोश में वो चौटाला से बदतमीजी कर बैठते हैं और तब चौटाला उन्हें सबक सिखाने की ठान लेता है.

जिस शख़्स का चारों दोस्त ने अपहरण किया होता है वो उसकी हत्या कर देता है और धमकी देता है कि अगर उसे एक लाख रुपए नहीं दिए गए तो वो चारों को उस हत्या के आरोप में फंसा देगा.

(रिव्यू : ‘हॉलीडे’)

उसके बाद क्या होता है? चारों, अपने आपको बचाने के लिए क्या करते हैं, उन्हें किन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ता है, यही फ़िल्म की कहानी है.

बेदम कहानी, बेतुका स्क्रीनप्ले

राहुल हांडा ने अपनी कहानी में बहुत कुछ बताने की कोशिश की है लेकिन कई बातें गले नहीं उतरतीं और इसी वजह से पर्दे पर कहानी में दम नज़र नहीं आता.

चारों दोस्त बेगुनाह होने के बावजूद अपने परिवार वालों की मदद क्यों नहीं लेते, जबकि वो धनी और प्रभावशाली परिवारों से आते हैं. ये बात समझ से परे है.

(रिव्यू : ‘सिटीलाइट्स’)

संजय कुमार का स्क्रीनप्ले भी बेदम है. मुश्किलों में फंसे होने के बाद चारों दोस्त एक के बाद एक बेवकूफ़ाना हरकतें करते हुए फंसते चले जाते हैं.

इस वजह से दर्शकों की सहानुभूति उन्हें नहीं मिल पाती. इस सारे सस्पेंस ड्रामे की शुरुआत होती है देवी के साथ हुई छेड़छाड़ की घटना से.

उबाऊ फ़िल्म, बोर क्लाईमेक्स

कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है ये घटना कहानी के सस्पेंस के हिसाब से महत्तवपूर्ण नहीं लगती है.

ये चारों दोस्त कहानी के हीरो हैं. वो फ़िल्म के मुख्य किरदार हैं. लेकिन उनकी हरकतें दर्शकों के मन में ज़रा भी हमदर्दी नहीं जगा पाती.

कहानी के हीरोज़ के साथ ही दर्शकों का जुड़ाव नहीं है, ये फ़िल्म का सबसे नकारात्मक पहलू है.

(रिव्यू : ‘कोचेडियान’)

फ़िल्म का क्लाइमैक्स भी बड़ा नीरस है. एक सस्पेंस ड्रामा में जो रोमांच होना चाहिए वो फ़िल्म से नदारत है.

फ़िल्म के प्रोमोज़ ने उम्मीद जगाई थी कि ये एक मौज मस्ती से भरपूर, युवा दर्शकों को लुभाने वाली फ़िल्म होगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. ये एक बेहद गंभीर और उबाऊ फ़िल्म है जिसमें फ़न एलीमेंट ही नहीं है.

(रिव्यू : ‘हीरोपंती’)

फ़गली का टाइटल ट्रैक, जिसमें अक्षय कुमार और सलमान ख़ान जैसे सुपरस्टार मौजूद हैं, वो फ़िल्म में रखा ही नहीं गया है. इससे दर्शकों को और निराशा होगी.

अभिनय

अभिनय की बात करें तो मोहित मारवाह ने बॉलीवुड में बड़ी औसत शुरुआत की है. उनके चेहरे के भाव सीन के हिसाब से बदल ही नहीं पाते.

उन्हें अपने हाव-भाव, एक्टिंग और बॉडी लैंग्वेज पर भरपूर काम करना होगा. किरारा आडवाणी अपनी पहली फ़िल्म में प्यारी लगी हैं.

(रिव्यू : ‘द एक्सपोज़े’)

सुंदर होने के साथ-साथ उन्होंने अभिनय भी अच्छा किया है.

बॉक्सिंग रिंग के बादशाह विजेंदर सिंह एक्टिंग रिंग में बेदम नज़र आए. उनकी संवाद अदायगी में हरियाणवी शैली साफ़ सुनाई पड़ती है. उनके हाव-भाव भी बिलकुल सपाट हैं.

जिमी शेरगिल ने अच्छा अभिनय किया है. लेकिन उनका रोल बड़ा ‘प्रिडिक्बल’ किस्म का है.

कुल मिलाकर ‘फ़गली’ बेहद औसत किस्म की फ़िल्म है. फ़िल्म लो बजट की है इस वजह से शायद अपनी लागत वसूल कर ले.

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