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इंटरनेशनल मीडिया में दुनिया को महिला वैज्ञानिकों की जरूरत पर बहस

Updated at : 06 Oct 2018 1:14 PM (IST)
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इंटरनेशनल मीडिया में दुनिया को महिला वैज्ञानिकों की जरूरत पर बहस

इस वर्ष भौतिकी (फिजिक्स) और केमिस्ट्री (रसायन शास्त्र) का नोबेल पुरस्कार दो महिलाओं ने जीते हैं. फ्रांसिस एच आर्नोल्ड और डोना स्ट्रिकलैंड. वर्ष 2018 में इन दो महिलाओं के विज्ञान का नोबेले जीतने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में एक अलग बहस छिड़ गयी है. दरअसल, यह विवाद स्विट्जरलैंड में धरती के नीचे स्थित दुनिया की […]

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इस वर्ष भौतिकी (फिजिक्स) और केमिस्ट्री (रसायन शास्त्र) का नोबेल पुरस्कार दो महिलाओं ने जीते हैं. फ्रांसिस एच आर्नोल्ड और डोना स्ट्रिकलैंड. वर्ष 2018 में इन दो महिलाओं के विज्ञान का नोबेले जीतने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में एक अलग बहस छिड़ गयी है.

दरअसल, यह विवाद स्विट्जरलैंड में धरती के नीचे स्थित दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला सर्न में काम कर रहे वैज्ञानिक अलेसांद्रो स्त्रुमिया के एक बयान ‘भौतिकी की स्थापना पुरुषों ने की’ के बाद छिड़ा है.

अलेसांद्रो के इस बयान पर वर्ल्ड इनोवेशन फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी (सीइओ) डॉ डेविड भड़क गये. उन्होंने कहा कि उन्हें प्रसन्नता है कि कालटेक की फ्रांसिस एच आर्नोल्ड रसायन शास्त्र के क्षेत्र में वर्ष 2018 का नोबेल जीतने वाली टीम का हिस्सा हैं. उनके अलावा एक और महिला हैं, डोना स्ट्रिकलैंड. उन्होंने फिजिक्स का नोबेल जीता है.

डेविड कहते हैं कि आपको जानकर आश्चर्य होगा कि नोबेल पुरस्कार के इतिहास में फिजिक्स और केमिस्ट्री दोनों का नोबेल जीतने वाली एक महिला थी. वह एकमात्र महिला थी. उनका नाम है मैरी स्क्लोदोस्का क्यूरी. लोग उन्हें मैडम क्यूरी के नाम जानते हैं.

उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई दूसरा वैज्ञानिक नहीं हुआ, जिसने फिजिक्स और केमिस्ट्री दोनों का नोबेल हासिल किया हो. मैडम क्यूरी ने अपना पूरा जीवन विज्ञान को समर्पित कर दिया था. अपने अभूतपूर्व शोध के दौरान कैंसर की वजह से उनका निधन हो गया.

डॉ डेविड आगे कहते हैं कि किसी पुरुष वैज्ञानिक को यह उपलब्धि आज तक हासिल नहीं हुई. इसलिए सर्न के वैज्ञानिक अलेसांद्रो स्त्रुमिया का यह कहना कि ‘फिजिक्स की स्थापना पुरुषों ने की’ बेवकूफी भरा बयान है.

अंतरराष्ट्रीय पत्रिका दि इंडिपेंडेंट को लिखे अपने खत में डॉ डेविड कहते हैं कि अच्छा है कि 150 साल के काले इतिहास को पीछे छोड़ते हुए महिलाएं आगे बढ़ रही हैं. उस युग से आगे बढ़ रही हैं, जहां यह मान लिया गया था कि दिमाग सिर्फ पुरुषों के ही पास है.

उन्होंने कहा है कि यदि हमें अपनी धरती, अपने ग्रह को बचाना है, उसमें इस सदी और उसके आगे हाइ-टेक्नोलॉजी में उन मूल्यों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए, जो चीजों को अपने नजरिये से देखते हों. उसमें लिंग के आधार पर भेद करते हों. पुरुष वैज्ञानिक जितनी जल्दी इस सच को स्वीकार कर लेंगे, विज्ञान और मानवता का उतना ज्यादा भला होगा.

ज्ञात हो कि क्रमविकास के सिद्धांतों का उपयोग कर जैव ईंधन से लेकर औषधि तक, हर चीज बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्रोटीन का विकास करने के लिए उन्हें दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ रसायन विज्ञान के क्षेत्र में प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया. अर्नोल्डको 90 लाख स्वीडिश क्रोनोर (करीब 10.1 लाख डॉलर या 870,000 यूरो) की आधी रकम जीती.

दूसरी तरफ, वर्ल्ड मीडिया में एक नयी वैज्ञानिक उस वक्त छा गयीं, जब डोना स्ट्रिकलैंड भौतिकी का नोबेल जीतने वाली अब तक की तीसरी महिला बन गयीं. उन्होंने अल्ट्रा-शॉर्ट लेजर्स पर काम किया है. उनके पहले रिसर्च पेपर के लिए ही उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल गया. 55 साल में फिजिक्स का नोबेल जीतने वाली वह पहली महिला बन गयीं.

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