तुम ही थे वीरेन

Updated at : 09 Sep 2018 5:31 AM (IST)
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तुम ही थे वीरेन

वीरेन डंगवाल ने अपने कैरियर की शुरुआत पत्रकारिता से की. बाद में वे पढ़ाने लगे थे. वे अपनी कविता में समाज, लोकतंत्र और मनुष्यता के छिजते चले जाने को लगातार दर्ज करते रहे. हिंदी कविता 28 सितंबर, 2015 की सुबह एक गहरी पीड़ा के क्षण से गुजरी थी, जब वीरेन डंगवाल हमारे बीच से चले […]

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वीरेन डंगवाल ने अपने कैरियर की शुरुआत पत्रकारिता से की. बाद में वे पढ़ाने लगे थे. वे अपनी कविता में समाज, लोकतंत्र और मनुष्यता के छिजते चले जाने को लगातार दर्ज करते रहे.

हिंदी कविता 28 सितंबर, 2015 की सुबह एक गहरी पीड़ा के क्षण से गुजरी थी, जब वीरेन डंगवाल हमारे बीच से चले गये थे. पुस्तक ‘कविता वीरेन : वीरेन डंगवाल की संपूर्ण कविताएं’ को नवारुण ने प्रकाशित किया है. संवेदनशील और साहित्य प्रेमी संजय जोशी नवारुण की देखरेख करते हैं और बेहतर किताबों के प्रकाशन के लिए प्रतिबद्ध हैं. इस संग्रह में वीरेन डंगवाल की तीनों प्रकाशित संग्रहों की कविताएं भूमिका सहित तो हैं ही, उनके सभी अप्रकाशित कविताएं भी शामिल की गयी हैं.

संग्रह की कविता ‘रामसिंह’ आज से लगभग चालीस साल पहले ‘पहल-13’ में छपी थी और कवि को रातोंरात प्रसिद्धि के शिखर पर ला खड़ा किया था. आज भी उस कविता की पंक्तियां सुधी पाठकों को बेचैन करती हैं- ‘कहां की होती है वह मिट्टी/ जो हर रोज साफ करने के बावजूद/ तुम्हारे भारी बूटों के तलवों में चिपक जाती है…’ आपातकाल के तुरंत बाद की लिखी कविता का यह प्रश्न आज भी अपने उत्तर की तलाश में है.

वीरेन डंगवाल ने अपने कैरियर की शुरुआत पत्रकारिता से की. बाद में महाविद्यालय में पढ़ाने लगे थे. वह अपनी कविता में समाज, लोकतंत्र और मनुष्यता के छिजते चले जाने को लगातार दर्ज करते रहे. निराला को समर्पित ‘उजले दिन जरूर’ कविता की अंतिम तीन पंक्तियों में कवि का आशावाद दिख पड़ता है- ‘आये हैं जब हम चलकर इतने लाख वर्ष/ इसके आगे भी तब चलकर ही जायेंगे/ आयेंगे, उजले दिन जरूर आयेंगे…’ उन्होंने राजनीतिक कविताएं भी लिखी हैं- ‘चेहरा भी सुंदर और मोहरा भी/ धर्मनिरपेक्षता पर भी है पूरा विश्वास/ अब आत्मा में ही नहीं है सुवास/ तो क्या कीजे…’

पुस्तक की भूमिका के अंतिम हिस्से में मंगलेश डबराल सही कहते हैं- कविता से बाहर भी वीरेन के दोस्तों और प्रशंसकों की दुनिया इतनी बड़ी थी, जितनी शायद किसी दूसरे समकालीन कवि की नहीं रही होगी. उनके निधन पर असद जैदी ने मीर तकी मीर की एक रुबाई का हवाला दिया था, जिसमें किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की गयी है, जो सचमुच मनुष्य हो, जिसे अपने हुनर पर अहंकार न हो, जो अगर कुछ बोले, तो एक दुनिया सुनने के लिए एकत्र हो जाये और जब वह खामोश हो, तो लगे कि एक दुनिया खामोश हो गयी है. वीरेन ऐसी ही शख्सियत के कवि थे. उनकी कविताओं का यह समग्र काव्य-प्रेमियों के लिए एक उपहार की तरह ही है. मनोज मोहन

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