बारिश की बहार में जायके का लुत्फ
Updated at : 19 Aug 2018 5:28 AM (IST)
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इस वक्त देश के कुछ हिस्सों में बारिश तबाही का कहर ढा रही है और इस माहौल में कुछ लोगों को मौसम के माफिक खान-पान की बात अटपटी लग सकती है, पर करें क्या कि दिल भी तो मजबूर है! गरमागरम तला-भूना खाना इन दिनों ललचाता है- पकौड़े हों या समोसे इनके तरह-तरह के अवतार […]
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इस वक्त देश के कुछ हिस्सों में बारिश तबाही का कहर ढा रही है और इस माहौल में कुछ लोगों को मौसम के माफिक खान-पान की बात अटपटी लग सकती है, पर करें क्या कि दिल भी तो मजबूर है! गरमागरम तला-भूना खाना इन दिनों ललचाता है- पकौड़े हों या समोसे इनके तरह-तरह के अवतार प्रकट होने लगते हैं. बारिश की बहारों में खान-पान के बारे में बता रहे हैं व्यंजनों के माहिर प्रोफेसर
शायर नजीर अकबराबादी की एक नज्म है- ‘बारिश की बहारें’, जिसमें जमुना में तैराकों की मस्ती और कनकौव्वे उड़ानेवालों की मौज का दिलकश बयान है. हमारा मन आसमान में घुमड़ते कजरारे बादलों को देखते ही बचपन में पढ़ी अब काफी कुछ भिला दी गयी इन पंक्तियों को गुनगुनाने और दूसरों को सुनाने का करने लगता है. बारिश देश के कुछ हिस्सों में तबाही का कहर ढा रही है और इस माहौल में कुछ पाठकों को इस मौसम के माफिक खान-पान की बात करना अटपटा लग सकता है, पर करें क्या कि दिल भी तो मजबूर है, और पेट भी!
गरमागरम तला-भूना खाना इन दिनों ललचाता है-
पकौड़े हों या समोसे इनके तरह-तरह के अवतार प्रकट होने लगते हैं. बढ़िया सिकी हुई आलू की टिक्की का साथ देते हैं छोले एवं दो तरह की चटनियां और थोड़ा सी दही. पेट खराब होने का जोखिम उठाकर गोलगप्पों का आनंद लेनेवालों की कमी नहीं है. तीखी चटपटी चाट के बाद जब जुबान पर सी-सी होने लगे, तो मीठा खाने की तलब स्वाभाविक है. अकसर समोसे, टिक्की चाट वाले खोमचे के पास ही जलेबियां कड़ाही में नजर आती हैं. गुलाब जामुन कब लोकप्रिय नहीं था! लेकिन, आजकल यह सब चटोरापन घर के बाहर ही दिखता है.
कुछ बरस पहले तक बारिश के खाने का मजा घर पर ही लिया जाता था. पकौड़े परिवार के सदस्यों की पसंद और फरमाइश के अनुसार मेथी, पालक, प्याज और मिर्ची के बनते थे. ‘मिक्स्ड’ का चलन नहीं था. पनीर का उपयोग पकौड़ियों में नहीं के बराबर होता था. मिर्ची और बैंगन एकरसता तोड़ते थे. घर की पकौड़ियां दो बार तलकर करारी नहीं बनायी जाती थीं. इनका आनंद ताजा ही लिया जा सकता था. मिठास के नाम पर सूजी, आटे या दाल का हलवा तुरत-फुरत पेश करके गृहिणी अपने कौशल का परिचय देती थी! यों पारंपरिक प्रथा वर्षा के स्वागत या उसको विदा देने के लिए पुए और अनरसे पकाने की भी थी. उत्तराखंड में खमीर चढ़े पुए के घोल से जलेबी की शक्ल के सिंगल पकाये जाते थे, जिनकी जुगलबंदी आलू के गुटकों से साधी जाती थी.
दक्षिण भारत में पकौड़ियां भजिया नाम से जानी जाती हैं, पर वहां इनसे ऊपर के पायदान पर बड़े और बौंडे रहते हैं. सिर्फ इडली दोसे के साथ परोसे जानेवाले मेदु वडे नहीं, वरन दाल/रस वडे और बटाटा और साबूदाना वडा भी. सबसे ज्यादा मशहूर मैसूर बोंडा है, पर आलू के बगैर दाल की पीठी को मंगोडी वाले अंदाज में तलकर भी बड़ा बनाया जाता है. तमिलनाडु में ही यही दिन हैं, जब पनियारम नाम की तली नन्हीं इडलियां चाव से खायी जाती हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में जिसे रिकौंच कहते हैं, वही अन्यत्र पतौड़े के रूप में पहचाना जाता है.
ऐसा जान पड़ता है कि बारिश के दिनों में आमाशय के संक्रामक रोगों से बचने के लिए तेल-घी में तले व्यंजन हमारे यहां लोकप्रिय हुए. अपच हो या अजीर्ण इनके घरेलू उपचार का बंदोबस्त कर देती थीं चटनियां और छिड़के जानेवाले सूखे घर पर पिसे मसाले. बारिश की बौछार जब घर पर बैठे रहने के लिए मजबूर कर देती थी और किसी पूर्वनिश्चित कार्यक्रम को रद्द करना पड़ जाता था, तब अचानक इन खानों को पकाने-खिलाने का अप्रत्याशित तामझाम एक ऐसे पर्व का नृप धारण करता था, जिसका उल्लास सामूहिक होता था. कहां बची हैं अब ऐसी बारिश की बहारें!
रोचक तथ्य
कुछ बरस पहले तक बारिश के खाने का मजा घर पर ही लिया जाता था. पकौड़े परिवार के सदस्यों की पसंद और फरमाइश के अनुसार मेथी, पालक, प्याज और मिर्ची के बनते थे.
बरसात में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में बननेवाले रिकौंच को अन्यत्र पतौड़े के रूप में पहचाना जाता है.
बारिश के दिनों में आमाशय के संक्रामक रोगों से बचने के लिए तेल-घी में तले व्यंजन हमारे यहां लोकप्रिय हुए.
पुष्पेश पंत
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