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यादों में मुंशीजी: गुदड़ी के लाल की विरासत को बिसराता काशी, धूल फांकते कमरे और जर्जर इमारत में सिमटे प्रेमचंद

Updated at : 08 Oct 2021 6:15 PM (IST)
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यादों में मुंशीजी: गुदड़ी के लाल की विरासत को बिसराता काशी, धूल फांकते कमरे और जर्जर इमारत में सिमटे प्रेमचंद

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में मुंशी प्रेमचंद के लिए शोध संस्थान तक निर्मित किया गया है. आज यह दोनों स्थान अवहेलना का दंश झेल रहे हैं. यूं कहे खानापूर्ति के नाम पर यह जगह अपनी आधी-अधूरी विरासत को खुद में समेटे जी रहा है.

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Varanasi Premchand Story: काशी विश्वनाथ की नगरी वाराणसी सांस्कृतिक, धार्मिक और शैक्षणिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध है. यहां हिंदी साहित्यकारों का अनूठा खजाना रहा है. उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद को सबसे अनमोल खजाने के रूप में उनकी जन्मभूमि लमही में आज भी सहेजकर रखा गया है. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में मुंशी प्रेमचंद के लिए शोध संस्थान तक निर्मित किया गया है. आज यह दोनों स्थान अवहेलना का दंश झेल रहे हैं. यूं कहे खानापूर्ति के नाम पर यह जगह अपनी आधी-अधूरी विरासत को खुद में समेटे जी रहा है. प्रभात खबर ने उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की 85वीं पुण्यतिथि पर पैतृक गांव लमही से लेकर बीएचयू शोध संस्थान की एक रिपोर्ट तैयार की है.

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उपन्यासकार सम्राट मुंशी प्रेमचंद (मूल नाम- धनपत राय श्रीवास्तव) की 8 अक्टूबर को 85वीं पुण्यतिथि मनाई गई. हिंदी साहित्य का एक ऐसा नाम जिसने लोगों की जीवन कलाओं को कथा, किताबों, कहानियों में पिरोकर उनके सामाजिक जनजीवन को बड़ी ही खूबसूरती से सामने रखा. आज भी उनकी कहानियां, उपन्यास एक विरासत के तौर पर याद की जाती हैं. मुंशी प्रेमचंद का निवास वाराणसी के लमही गांव में है.

उनके टूटे-फूटे जजर्र हो चुके मकान को काशी के विद्वानों और लोगों के हस्तक्षेप के बाद एक स्मारक के रूप में निर्मित कर सहेजा गया. इसके बाद 5 साल पहले काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा मुंशी प्रेमचंद शोध संस्थान की स्थापना की गई. इस संस्थान की स्थापना इस उदेश्य के साथ की गई थी कि यहां साहित्यिक चर्चा, एकेडमिक कार्यकलाप और शोधगत विषयों पर अध्ययन किया जाएगा. मगर यहां की हालत तो कुछ और ही दास्तान बयां कर रही है. यहां शोध संस्थान में मकड़ी के जाले लगे खाली-खाली कमरे, धूल फांक रहे खिड़की-दरवाजे, म्यूजियम के नाम पर मुंशीजी की टूटी चप्पल, कपड़े और सामान ही हैं.

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लाइब्रेरी में रखी किताबों को उठाते ही पन्ना-पन्ना हाथ में आ जाता है. 5 साल पहले बने मुंशी प्रेमचंद शोध संस्थान की स्थापना से लोगों को हैरिटेज और साहित्यिक विकास की उम्मीद जगी थी. शोध संस्थान के नाम पर आज तक एक भी शोध नहीं है. संस्थान की जिम्मेदारी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसरों के पास है.

संस्थान तो बन गया… इस्तेमाल नहीं हो रहा…

पूरे 2 करोड़ रुपए से बने इस संस्थान की नींव 31 जुलाई, 2016 को रखी गई थी. केंद्रीय मंत्री ने भवन का उद्घाटन किया था. इसके कुछ दिन बाद ही यहां से सबका ध्यान हट गया. इस शोध संस्थान के प्रमुख से लेकर सदस्य तक बीएचयू के ही हिंदी और उर्दू के प्रोफेसर हैं. सच्चाई यही है कि इन साहित्यकारों के हाथों प्रेमचंद की विरासत की नाव डूब रही है. यहां के शोध संस्थान से संबंधित वेबसाइट भी हाल ही में लॉन्च की गई है. वेबसाइट पर सूचना अपडेट नहीं है. आखिरी कार्यक्रम 2018 को हुआ था. उसकी कुछ तस्वीरें वेबसाइट पर दिख भर जाती हैं.

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इस केंद्र की स्थापना भी इसी लक्ष्य के साथ की गई थी कि अकादमिक कार्यों, शोध, संगोष्ठी, व्याख्यान, परिचर्चा आदि का आयोजन कर इसे बढ़ावा दिया जाए. इसके साथ ही प्रेमचंद के साहित्य पर आधारित प्रकाशन को बढ़ाना देना, प्रेमचंद पर वृत्त चित्र का निर्माण, उनकी कहानियों पर आधारित कोलाज बनाना और प्रेमचंद संबंधित वाद-विवाद, निबंध, कहानी-लेखन, कहानी पाठ आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन भी हो सके. लेकिन, अभी तक कोई भी कार्य (एक-दो संगोष्ठी को छोड़कर) नहीं हुआ.

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मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही की भी हालत शोध संस्थान जैसी है. यहां के लाइब्रेरी में पिछले 5 साल से एक भी साहित्य से संबंधित कोई नई किताब नहीं आई है. जो भी थोड़ी बहुत किताबें हैं वो दान में मिली हैं. 8 अक्टूबर को प्रेमचंद की पुण्यतिथि है. इस अवसर पर ही साहित्यकार और प्रोफेसर दिखते हैं. इसके बाद सालभर कोई भी झांकने तक नहीं आता है. सरकार ने भी लंबे-चौड़े वायदे किए. जमीनी हकीकत क्या है? सभी को नजर आ रहा है. ना तो यहां साहित्यिक किताबें हैं, ना ही रिसर्चर पर्यटकों की कोई आवाजाही है. ऐसे मे यहां की धरोहर के लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाए? ये आप या सरकार तय कर सकती है?

(रिपोर्ट: विपिन सिंह, वाराणसी)

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