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झारखंड : देश के चुनिंदा शिवलिंगों में है ईचागढ़ का चतुर्मुखी शिवलिंग, कई रहस्यों को है समेटे

Updated at : 10 Jul 2023 12:06 PM (IST)
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झारखंड : देश के चुनिंदा शिवलिंगों में है ईचागढ़ का चतुर्मुखी शिवलिंग, कई रहस्यों को है समेटे

ईचागढ़ का चतुर्मुखी शिवलिंग देश के गिने चुने शिवलिंगों में एक है, जिसमें कई रहस्य छिपे हैं. लोग बताते है कि ऐसा ही एक शिवलिंग महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी नट पर है. चार मुंह वाले ईचागढ़ के चतुर्मुख शिवलिंग की स्थापना राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी. लोगों की इसमें अटूट आस्था है.

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सरायकेला, शचिंद्र कुमार दाश. सरायकेला जिला मुख्यालय सरायकेला से करीब 40 किलोमीटर चांडिल अनुमंडल का ईचागढ़. यहां छोटे से मंदिर में स्थापित है चतुर्मुखी शिवलिंग. बताया जाता है कि ईचागढ़ का चतुर्मुख शिवलिंग देश के गिने चुने शिवलिंगों में एक है. लोग बताते है कि ऐसा ही एक शिवलिंग महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के नट पर है. ईचागढ़ के चतुर्मुख शिवलिंग में चार मुंह है. चारों तरफ से देखने में एक जैसे ही लगती है यह चतुर्मुखी शिवलिंग. इस शिवलिंग पर क्षेत्र के लोगों की भारी आस्था है. स्थानीय लोगों को विश्वास है कि बाबा के दरबार में मांगी हुई मुराद पूरी होती है. चतुर्मुखी शिव मंदिर में पूजन दर्शन के लिये आस पास के लोगों के साथ साथ बाहर से भी श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं. वहीं, पवित्र सावन माह में शिवलिंग पर जलार्पण करने के लिए भी यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.

कई रहस्य समेटे है यह चतुर्मुखी शिवलिंग

यह चतुर्मुखी शिवलिंग क्षेत्र कई रहस्यों को समेटे हुए है. ईचागढ़ के चतुर्मुखी शिवलिंग की स्थापना कब हुई थी और यह ऐतिहासिक शिवलिंग किस सदी का है, इसके पुख्ता प्रमाण नहीं हैं. ईचागढ़ राजघराने के वार्तमान राजा प्रशान्त कुमार आदित्य देव बताते है कि संभवत ईचागढ़ रियासत के राजा विक्रमादित्य ने अपने शासनकाल में चतुर्मुखा शिव मंदिर बनाया था. क्षेत्र के लोगों का भी कहना है कि राजा विक्रमादित्य ने चतुर्मुखी शिव मंदिर के साथ साथ आसपास के क्षेत्र में कई धरोहर बनवाए थे. इनका भग्नावशेष आज भी ईचागढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिलता है. जानकार बताते हैं कि वर्ष 1991-92 में पुरातत्व विभाग के तत्कालिन सहायक निर्देशक राम शेखर सिंह पुरातात्विक धरोहरों की जांच के लिए ईचागढ़ के चतुर्मुख शिव मंदिर पहुचें थे. परंतु यह शिव लिंग की स्थापना कब हुई थी, यह पता नहीं चल सका.

सरकारी संरक्षण मिले तो धार्मिक पर्यटन को मिल सकता है बढ़ावा

हजारों साल पुराने इस शिवलिंग के रख रखाव और इसे संरक्षित करने के लिए सरकार की ओर से कोई विशेष पहल नहीं की गई है. यहां ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से एक छोटे मंदिर का निर्माण कराया है. इस ऐतिहासिक चतुर्मुख शिव मंदिर को कई बार धार्मिक पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने की मांग उठी, परंतु अब तक मांग पूरी नहीं हो सकी. ईचागढ़ के चतुर्मुख शिव मंदिर क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराकर इसे बेहतर पर्यटन स्थल बनाया जा सकता है. यह मंदिर क्षेत्रवासियों के लिए आस्था का केंद्र है. यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराने के साथ पूरे क्षेत्र का सौंदर्यीकरण करा दिया जाए तो मंदिर पर्यटन का आकर्षक केंद्र बन सकता है.

चतुर्मुखी शिव मंदिर के निकट ही बांका महादेव हैं अवस्थित

चतुर्मुखी शिव मंदिर के निकट ही बांका महादेव अवस्थित हैं. कहते हैं कि अंग्रेज बांका महादेव को उठाकर कहीं ले जाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन जिस बैल गाड़ी से महादेव की शिवलिंग को ले जाया जा रहा था, वह गाड़ी उसी जगह पर टूटकर दो भागों में बंट गया. इसके बाद जमीन में गिरे शिवलिंग को अंग्रेज उठा नहीं पाए. इसके बाद से वह शिवलिंग आज भी उसी जगह अवस्थित है.

कैसे पहुंचे ?

जमशेदपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर टाटा-रांची राष्ट्रीय राजमार्ग-33 पर चौका मोड़. यहां दायीं ओर करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर ईचागढ़ से लेपाटांड जाने के रास्ते पर चतुर्मुख शिव मंदिर स्थित है. रांगामाटी-सिल्ली सड़क के डुमटांड मोड़ से भी चतुर्मुख शिव मंदिर तक पहुंचा जा सकता है.

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