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Sawan 2023: फलदायी होता है शिव परिवार का पूजन, जानें उनसे जुड़ीं पौराणिक कथाओं के बारे में

Updated at : 21 Aug 2023 10:43 AM (IST)
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Sawan 2023: फलदायी होता है शिव परिवार का पूजन, जानें उनसे जुड़ीं पौराणिक कथाओं के बारे में

जब बात शिव परिवार की आती है, तब माता पार्वती, उनके दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश की भी चर्चा होती है. हालांकि भगवान शिव की दो नहीं, बल्कि आठ संतानें थीं.

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सावन का पवित्र महीना भगवान शिव को समर्पित है. इस दौरान लोग उन्हें प्रसन्न करने के लिए पूजा-पाठ और उनकी आराधना में लीन रहते हैं. भले ही सावन में शिवजी की पूजा का विशेष महत्व है, मगर उनके साथ उनके पूरे परिवार की पूजा करना काफी फलदायी होता है. जब बात शिव परिवार की आती है, तब माता पार्वती, उनके दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश की भी चर्चा होती है. हालांकि भगवान शिव की दो नहीं, बल्कि आठ संतानें थीं. साथ ही तीन पुत्रियां-अशोक सुंदरी, ज्योति और मानस हैं. शिव परिवार असीम शक्तियों से संपन्न है. इनकी पूजा-अर्चना से घर में सुख-शांति बनी रहती है. शिवपुराण के अनुसार, जानें शिव परिवार से जुड़ीं पौराणिक कथाओं के बारे में.

गणेश

शिवजी की पहली पत्नी सती थीं, जो आग में जलकर भस्म हो गयी थीं. उन्हीं सती ने जब पुन: पार्वती के रूप में जन्म लिया, तब उन्होंने शिवजी को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की. इससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की और उनसे विवाह किया. पुराणों में शिव पुत्र श्रीगणेश जी की उत्पत्ति की कई कथाएं मिलती हैं. माना जाता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी का जन्म हुआ था.

कथा: एक कथा के अनुसार, शनि की दृष्टि पड़ने से शिशु गणेश का सिर जलकर भस्म हो गया. इससे दुखी पार्वती से ब्रह्मा ने कहा, जिसका सिर सर्वप्रथम मिले, उसे गणेश के सिर पर लगा दो. पहला सिर हाथी के बच्चे का मिला. इस प्रकार गणेश ‘गजानन’ बन गये. एक अन्य कथा के अनुसार, गणेश को द्वार पर बिठाकर पार्वती जी स्नान करने चली गयीं. इतने में शिवजी आये और पार्वती के भवन में प्रवेश करने लगे. गणेश ने जब उन्हें रोका, तो गुस्साये शिव ने उनका सिर काट दिया. जब पार्वती जी ने देखा कि उनके बेटे का सिर काट दिया गया, तो वे क्रोधित हो उठीं. उनको शांत करने के लिए शिवजी ने एक हाथी के बच्चे का सिर गणेश के सिर में लगा दिया. इस तरह वह जी उठे.

कथा: जब राजा दक्ष के यज्ञ में सती कूदकर भस्म हो गयीं, तब शिवजी विलाप करते हुए गहरी तपस्या में लीन हो गये. इससे सृष्टि शक्तिहीन हो गयी. असुरों ने इस मौके का फायदा उठाया. इस दौरान धरती पर तारकासुर का आंतक फैल गया. तब सभी देवता ब्रह्माजी से प्रार्थना किये. ब्रह्माजी ने कहा कि तारकासुर का अंत शिव पुत्र करेगा. फिर इंद्र और अन्य देवता शिवजी के पास पहुंचे. तब भगवान शंकर पार्वती के अपने प्रति अनुराग की परीक्षा लेते हैं और पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होते हैं. फिर शिवजी और पार्वती का विवाह हो जाता है. इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म होता है. कार्तिकेय तारकासुर का वध करके देवताओं को उनका स्थान प्रदान करते हैं. पुराणों के अनुसार, कार्तिकेय का जन्म षष्ठी तिथि को हुआ था. इसलिए इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है.

कथा: कहा जाता है कि दैत्यों का प्रतिनिधित्व दो भाइयों-हेति और प्रहेति को सौंपा गया था. ये दोनों मधु और कैटभ के समान ही बलशाली व पराक्रमी थे. राक्षसराज हेति ने अपने साम्राज्य विस्तार हेतु ‘काल’ की पुत्री ‘भया’ से किया. भया से विद्युत्केश नामक पुत्र का जन्म हुआ. विद्युत्केश का विवाह संध्या की पुत्री ‘सालकटंकटा’ से हुआ. माना जाता है कि ‘सालकटंकटा’ व्यभिचारिणी थी. इस कारण जब उसका पुत्र जन्मा, तो उसे लावारिस छोड़ दिया गया. पुराणों के अनुसार, भगवान शिव व मां पार्वती की उस बालक पर नजर पड़ी. उन्होंने उस बालक का भरण पोषण किया और उसका नाम ‘सुकेश’ रखा. सुकेश ने गंधर्व कन्या देववती से विवाह किया. देववती से सुकेश के तीन पुत्र हुए- माल्यवान, सुमाली और माली. इन तीनों के कारण असुरों को विस्तार और प्रसिद्धि प्राप्त हुई.

अंधक

अंधक महादेव के अंधकार से जन्मा पुत्र है. एक कथा के अनुसार, जब माता पार्वती ने खेल-खेल में महादेव के नेत्रों को बंद कर दिया था, तब पृथ्वी पर छाये अंधकार से महादेव के इस पुत्र का जन्म हुआ था. यह अंधकार में जन्म लेने के कारण नेत्रहीन था और अंधक कहलाया. पुत्र होने के बावजूद माता पार्वती पर कुदृष्टि डालने के कारण पार्वती जी ने मां काली का रूप धारण कर इसका वध कर दिया था.

मंगल

भगवान शिव और माता पार्वती के एक और पुत्र थे, जिनका नाम मंगल था. मंगल भगवान शिव के संगीत से जन्मे थे. माना जाता है कि मंगल ने संगीत के बल पर महादेव को नियंत्रित कर अपना आधिपत्य संसार में फैलाने की कोशिश की थी, लेकिन महादेव ने अपने डमरू के संगीत से उसका वध कर दिया था.

भूमा

देवों के देव महादेव के इस पुत्र का जन्म उनके पसीने से हुआ था. भूमा को मंगल ग्रह के नाम से भी जाना जाता है. कहते हैं कि कुछ बड़ा होने पर मंगल काशी जा पहुंचा और भगवान शिव की कड़ी तपस्या की. तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे मंगल लोक प्रदान किया.

कथा : एक समय जब कैलाश पर्वत पर शिवजी समाधि में ध्यान लगाये बैठे थे. उसी दौरान उनके ललाट से तीन पसीने की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं. इन बूंदों से पृथ्वी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया, जिसकी चार भुजाएं थीं और वय रक्त वर्ण का था. इस पुत्र को पृथ्वी ने पालन-पोषण करना शुरू किया. तभी भूमि का पुत्र होने के कारण यह ‘भौम’ कहलाया.

अयप्पा

भगवान शिव के एक अन्य पुत्र थे, जिनका नाम ‘अयप्पा’ था. भले ही शिव जी अयप्पा के पिता हैं, लेकिन उनकी माता पार्वती नहीं, बल्कि माता मोहिनी हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने जब समुद्र मंथन के दौरान श्री विष्णु को मोहिनी रूप में देखा, तब उनके सौंदर्य को देखकर वह मोहित हो गये और मन में पुत्र की इच्छा जाग गयी. इसी इच्छा से ‘अयप्पा’ प्रकट हुए थे.

कथा : कहा जाता है कि भगवान ‘अयप्पा’ के पिता शिव व माता मोहिनी हैं. कहते हैं कि विष्णु का मोहिनी रूप देख शिवजी का वीर्यपात हो गया था. उनके वीर्य को पारद कहा गया और उनके वीर्य से ही बाद में ‘सस्तव’ नाम पुत्र का जन्म हुआ, जिन्हें दक्षिण भारत में ‘अयप्पा’ कहा गया. शिव व विष्णु से उत्पन्न होने के कारण उनको ‘हरिहरपुत्र’ भी कहा जाता है. केरल में शबरीमला में अयप्पा स्वामी का प्रसिद्ध मंदिर है, जहां दुनियाभर के लोग शिवजी के इस पुत्र के मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं. इस मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात घने अंधेरे में रह-रहकर एक ज्योति दिखती है. इस ज्योति के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु हर साल आते हैं.

कथा: श्रीमद् देवी भागवत पुराण के अनुसार, एक बार शिवजी ने अपना तेज समुद्र में फेंक दिया. इससे जलंधर उत्पन्न हुआ. जलंधर में अपार शक्ति थी और उसकी शक्ति की वजह थी उसकी पत्नी वृंदा. वृंदा के पतिव्रत धर्म के कारण देवता भी उसे पराजित नहीं कर पा रहे थे. इससे जलंधर को अपने शक्तिशाली होने का अभिमान हो गया और वह देवी-देवताओं को सताने लगा. उसे मालूम था कि ब्रह्मांड में सबसे शक्तिशाली कोई है, तो वो हैं महादेव. जलंधर ने खुद को सर्वशक्तिमान के रूप से स्थापित करने के लिए पहले इंद्र को परास्त कर त्रिलोधिपति बन गया. फिर उसने विष्णु लोक पर आक्रमण कर दिया,पर देवी लक्ष्मी ने जलंधर से कहा कि हम दोनों ही जल से उत्पन्न हुए हैं, इसलिए हम दोनों भाई-बहन हैं.

देवी लक्ष्मी की बातों से जलंधर प्रभावित हुआ और लक्ष्मी को बहन मानकर बैकुंठ से चला गया. इसके बाद उसने सभी असुरों को एकत्रित कर कैलाश पर आक्रमण कर देवी पार्वती को पत्नी बनाने का प्रयास करने लगा. इससे पार्वती क्रोधित हो गयीं. तब महादेव को जलंधर से युद्ध करना पड़ा, पर वृंदा के सतीत्व के कारण शिवजी का हर प्रहार वह निष्फल कर देता था. अंत में विष्णु जलंधर का वेश धारण कर वृंदा के पास पहुंचे. वृंदा विष्णुजी को अपना पति समझ बैठी. इससे वृंदा का पतिव्रत टूट गया और भगवान शिव ने जलंधर का वध कर दिया.

कार्तिकेय

शिवजी के दूसरे पुत्र थे कार्तिकेय, जिन्हें सुब्रमण्यम, मुरुगन और स्कंद के नाम से भी जाना जाता है. उनके जन्म की कथा काफी विचित्र है. कार्तिकेय की पूजा मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों में होती है. एेसी मान्यता है कि उत्तरी ध्रुव के निकटवर्ती प्रदेश उत्तर कुरु के क्षेत्र में इन्होंने स्कंद नाम से शासन किया था. इनके नाम पर ही िहंदू धर्म का पुराण ‘स्कंद पुराण’ पड़ा है.

सुकेश

भगवान शिव का एक तीसरा पुत्र था, जिसका नाम सुकेश था. ऐसी मान्यता है िक सुकेश असुर कुल में जन्मा एक बालक था, जिसे उसके माता-पिता ने जन्म के पश्चात किसी सुनसान जगह पर छोड़ दिया था. तब महादेव और माता पार्वती ने उस बालक का भरण पोषण किया और उसका नाम ‘सुकेश’ रख दिया. तभी से सुकेश महादेव पुत्र कहलाए.

जलंधर

महादेव शिवजी का एक चौथा पुत्र था, जिसका नाम जलंधर था. ऐसी मान्यता है िक बाद में जलंधर शिवजी का सबसे बड़ा शत्रु बना. श्रीमद् देवी भागवत पुराण के अनुसार, जलंधर असुर शिव का अंश था, लेकिन उसे इसकी जानकारी नहीं थी. जलंधर बहुत ही शक्तिशाली असुर था. इंद्र को पराजित कर जलंधर तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा था. यहां तक कि यमराज भी उससे डरते थे.

शिव की बहू

भगवान शिव की दो बहुएं हैं. श्रीगणेश की पत्नी सिद्धि और बुद्धि.शिवपुराण के अनुसार, ये प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियां हैं. कुछ स्थानों पर रिद्धि और सिद्धि का नाम मिलता है, लेकिन अधिकांश ग्रंथों में सिद्धि और बुद्धि को ही गणपति की पत्नी माना गया है. सिद्धि कार्यों और मनोरथ में सफलता प्रदान करती हैं. वहीं, बुद्धि ज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करती हैं.

शिव के पौत्र

ग्रंथों के अनुसार, भगवान गणेश के दो पुत्र हैं-क्षेम और लाभ. क्षेम हमारे अर्जित पुण्य, धन, ज्ञान और ख्याति को सुरक्षित रखते हैं अर्थात हमारी मेहनत से कमाई गयी हर वस्तु को सुरक्षित रखते हैं. उसे कम नहीं होने देते और धीरे-धीरे उसे बढ़ाते हैं. जबकि, लाभ का काम निरंतर उसमें वृद्धि देने का है. लाभ हमें धन, यश आदि में निरंतर बढ़ोतरी देते हैं.

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