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लाल सागर का संकट और भारत पर प्रभाव

Updated at : 27 Dec 2023 8:35 AM (IST)
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लाल सागर का संकट और भारत पर प्रभाव

लाल सागर संकट से व्यापार पूरी तरह नहीं रुकेगा, लेकिन व्यापार की लागत बढ़ जायेगी और हमारे उत्पाद कम प्रतिस्पर्धी रह जायेंगे. इसका असर मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र पर पड़ेगा. ईंधन के दाम तो बढ़े ही हैं, अनाज के दाम भी जल्द बढ़ सकते हैं.

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लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों पर यमन के हूथी समूह के लगातार हमले ने भारत के महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग को खतरे में डाल दिया है. यह मसला गंभीर होता जा रहा है और क्षेत्रीय संकट का रूप ले रहा है. यदि इसे रोकने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाये गये, तो भारत समेत अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. हूथी हमलों ने उस प्राथमिक समुद्री मार्ग को बाधित कर दिया है, जिससे होकर जहाज एशिया से यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और अमेरिका के पूर्वी तट तक उत्पादों का परिवहन करते हैं. हूथी यमन स्थित विद्रोहियों का एक समूह है, जो शिया जैदी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और जिसे ईरान का समर्थन प्राप्त है. उनकी मुख्य मांग है कि इजराइल गाजा में हमले रोके और वहां मानवीय सहायता की आपूर्ति बहाल करे. प्रारंभ में उसने केवल इजराइल के जहाजों पर हमला करने की घोषणा की, लेकिन पिछले दिनों में दूसरे देशों के कई जहाज, जिनका इजराइल से कोई लेना-देना नहीं था, निशाना बने हैं, जिनमें भारत आ रहे दो वाणिज्यिक जहाज भी शामिल हैं. इन पर ड्रोन से हमले किये गये. जापानी कंपनी के स्वामित्व वाले रसायन ले जा रहे एमवी केम प्लूटो नामक जहाज पर हमला किया गया, जो सऊदी अरब से निकला था और 21 भारतीय और एक वियतनामी चालक दल के साथ भारत की ओर आ रहा था. यह हमला लाल सागर से काफी दूर और भारतीय तट से 370 किलोमीटर दूर अरब सागर में हुआ था. सौभाग्य से किसी के घायल होने की सूचना नहीं है. भारतीय नौसेना ने जहाज की सुरक्षा के लिए पी81 विमान, आइएनएस मोरमुगाओ और अन्य तट रक्षक वाहन तत्काल भेजा. इसके एक दिन बाद एमवी साईं बाबा नामक एक अन्य जहाज पर लाल सागर में ड्रोन हमला हुआ. अभी तक किसी ने इन हमलों की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए शक की सुई हूथी की ओर जाती है. अमेरिका ने हमले के लिए ईरान को दोषी ठहराया है, पर ईरान ने इसे झूठा और उकसावा बताते हुए खारिज कर दिया है. स्वेज नहर मार्ग एशिया को यूरोप से जोड़ने वाला मुख्य समुद्री मार्ग है. सऊदी अरब, मिस्र और सूडान के बीच स्थित लाल सागर स्वेज नहर का प्रवेश द्वार है. इस रास्ते से लगभग 12 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और लगभग एक-तिहाई वैश्विक कंटेनर यातायात होता है. इस मार्ग से हर साल 20 हजार से अधिक जहाज गुजरते हैं. वैश्विक तेल का 10 फीसदी व्यापार इसी मार्ग से होता है. हूथी हमले ने प्रमुख शिपिंग कंपनियों को इस मार्ग से व्यापार रोकने और केप ऑफ गुड होप के माध्यम से 6000 समुद्री मील लंबा रास्ता अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है. बीपी, इक्विनोर, मेर्स्क, एवरग्रीन लाइन और एचएमएम सहित कई कंपनियों ने या तो अपने जहाजों का मार्ग बदल दिया है या लाल सागर में परिचालन निलंबित कर दिया है.

व्यापार मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका ने ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्जियन नामक टास्क फोर्स बनाने के लिए 10 देशों को एकजुट किया है. इसमें बहरीन, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, ग्रीस, इटली, नीदरलैंड, नॉर्वे, सेशेल्स और स्पेन शामिल हैं. दुर्भाग्य से पश्चिम एशिया के प्रमुख खिलाड़ी, जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और तुर्की अनुपस्थित हैं. इसलिए इस गठबंधन का प्रभाव संदिग्ध है. यदि अमेरिका यमन में हूथी ठिकानों पर बड़ा हमला करने का निर्णय लेता है, तो इससे क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ सकता है. यह ईरान को लड़ाई में खींच सकता है, जो हमास चाहता है. लेकिन न तो ईरान और न ही अमेरिका की इच्छा है कि इजराइल-हमास संघर्ष व्यापक रूप से भड़के. स्वेज नहर पर भारतीय उद्योगों की निर्भरता बहुत अधिक है. यूरोप और पूर्वोत्तर अमेरिका में उत्पादों की डिलीवरी सीधे इस चैनल के माध्यम से होती है. भारत इस मार्ग से कच्चा तेल, कच्चा सोना, कोयला, ईंधन, हीरे, कीमती पत्थर, भारी मशीनरी, कंप्यूटर, विद्युत और यांत्रिक उपकरण, विशेष धातु, कार्बनिक रसायन, प्लास्टिक, और लोहा और इस्पात का व्यापार करता है. अभी बासमती चावल सहित प्रमुख शिपमेंट खतरे में हैं क्योंकि मेर्स्क जैसी प्रमुख वैश्विक शिपिंग लाइनों ने जलडमरूमध्य में जाना बंद कर दिया है. हमारे शीर्ष व्यापारिक भागीदार अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, चीन, ब्रिटेन, हांगकांग, जर्मनी और नीदरलैंड हैं. अमेरिका और यूरोप के लिए भारी शिपिंग कनेक्शन स्वेज नहर के माध्यम से ही होता है. हमारे मैनुफैक्चरिंग उद्योग विशेष रूप से इस पर निर्भर हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संकट जारी रहा, तो यूरोप और अफ्रीका जाने वाले भारतीय शिपमेंट के लिए माल ढुलाई दरें 25-30 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं. अधिकांश बीमा कंपनियों ने लाल सागर को पार करने वाले शिपमेंट को कवर करने से इनकार कर दिया है और कुछ बीमाकर्ताओं ने माल ढुलाई शुल्क के अलावा 5,200 डॉलर युद्ध जोखिम अधिभार लगाना शुरू कर दिया है. भारत और यूरोप के बीच एक शिपमेंट राउंड ट्रिप में गंतव्य के आधार पर 50 से 55 दिन लगते हैं. लेकिन अगर यह दक्षिण अफ्रीका मार्ग लेता है, तो यात्रा 10 अतिरिक्त दिनों तक बढ़ जाती है. इससे परिवहन लागत, श्रम शुल्क, बीमा और ईंधन लागत बढ़ जायेगी. ऐसी खबरें हैं कि कई यूरोपीय कंपनियों ने लागत और देरी के कारण आयात अनुबंध रद्द कर दिये हैं.

वर्ष 2023 में भारत का लगभग 65 फीसदी कच्चा तेल, जिसका मूल्य 105 अरब डॉलर है, और माल व्यापार, जिसका मूल्य 113 अरब डॉलर है, स्वेज मार्ग से होकर गुजरा. इस प्रकार भारत का अनुमानित 20 प्रतिशत व्यापार इस मार्ग पर निर्भर है. लाल सागर संकट से व्यापार पूरी तरह नहीं रुकेगा, लेकिन व्यापार की लागत बढ़ जायेगी और हमारे उत्पाद कम प्रतिस्पर्धी रह जायेंगे. इसका असर मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र पर पड़ेगा. मुद्रास्फीति का दबाव भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है. भारत को इस संकट को रोकने के लिए तत्काल उपाय करने चाहिए. अपने वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए युद्धपोतों और विमानों को तैनात करने का निर्णय लिया गया है, लेकिन साथ ही लाल सागर में जहाजों की सुरक्षित और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए ईरान और अन्य पश्चिम एशियाई देशों के साथ बातचीत की जानी चाहिए. अमेरिका के बनाये गठबंधन में शामिल होना भारत के हित में नहीं है. लेकिन भारत युद्धरत दलों को एक साथ लाने में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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डॉ राजन

लेखक के बारे में

By डॉ राजन

एसोसिएट प्रोफेसर, रुसी एवं मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र

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