CM हेमंत सोरेन के 5 चुनावी सभा करने के बाद भी UPA नहीं बचा सकी रामगढ़ सीट, ये रहा चर्चा का विषय

मुख्यमंत्री हेमंत ने 19 फरवरी को गोला के एसएस प्लस टू हाई स्कूल, 22 को दुलमी बाजारटांड़, 23 को चितरपुर के ट्रेनिंग कॉलेज मैदान एवं रकुवा में चुनावी सभा की. इन सभाओं में लोगों की भीड़ तो देखी गयी, लेकिन यह भीड़ वोट में नहीं तब्दील हो सकी.
रजरप्पा, सुरेंद्र कुमार/शंकर पोद्दार: रामगढ़ उपचुनाव में यूपीए को करारी हार मिली है, साल 2019 के बाद अब तक हुए उपचुनावों में ये पहला मौका है जब यूपीए को हार का सामना करना पड़ा है. हर उपचुनाव की तरह इस बार भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने रामगढ़ में जीत का झंडा गाड़ने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. लेकिन, सफलता हाथ नहीं लगी. उन्होंने यूपीए प्रत्याशी के पक्ष में गोला, दुलमी, चितरपुर, रकुवा में चुनावी सभाएं एवं रामगढ़ में पहले रोड शो भी किया इसके बाद सभा को संबोधित किया.
बावजूद बजरंग महतो को जीत नहीं मिल पायी. जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री ने 19 फरवरी को गोला के एसएस प्लस टू हाई स्कूल, 22 को दुलमी बाजारटांड़, 23 को चितरपुर के ट्रेनिंग कॉलेज मैदान एवं रकुवा में चुनावी सभा की. जबकि 24 फरवरी को रामगढ़ में सभा करने के बाद रोड शो किया. इन सभाओं में लोगों की भीड़ तो देखी गयी, लेकिन यह भीड़ वोट में नहीं तब्दील हो सकी. जिस कारण क्षेत्र के लोगों का कहना है कि चुनावी समर में मुख्यमंत्री की सभाएं भी फ्लॉप साबित हुई.
गौरतलब है कि यूपीए 2019 के बाद राज्य में पांचवां उपचुनाव था. इसमें बेरमो, मांडर, मधुपुर एवं दुमका उपचुनाव में यूपीए महागठबंधन की जीत हुई. लेकिन रामगढ़ उपचुनाव में इन्हें हार का सामना करना पड़ा. लोगों का कहना है कि ममता देवी का जेल जाना एवं अपने दूध मुंहे बच्चे को लेकर बजरंग महतो का जनता के समक्ष जाना उन्हें लोगों की सहानभूति दिलायेगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.
मतगणना आरंभ होने के बाद से ही एनडीए प्रत्याशी सुनीता चौधरी को बढ़त मिल गयी. इसकी सूचना जैसे ही उनके समर्थकों को मिली लोगों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया. रामगढ़ से लेकर चितरपुर, गोला व दुलमी के सुदूरवर्ती गांवों में समर्थकों ने जमकर आतिशबाजियां की. साथ ही एक-दूसरे को अबीर गुलाल और मिठाईयां बांट अपने खुशी का इजहार किया. चौक चौराहों पर आजसू-भाजपा के झंडों के साथ लोगों ने सुनीता चौधरी जिंदाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिये.
ममता देवी के जेल जाने के बाद बजरंग महतो और उनके भाई अमित महतों के बीच टिकट को लेकर टकराव हो गया. अमित महतो ने कांग्रेस आलाकमान के समक्ष अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर दी. हालांकि बजरंग को टिकट मिलने के बाद में दोनों भाईयों में समझौता हो गया. लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव चुनावी परिणाम में दिखा.
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