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पीएम मोदी के गढ़ में गरजेंगे नीतीश कुमार, भाजपा को चुनौती देने के साथ I-N-D-I-A पर सियासी दबाव की रणनीति

यूपी में नीतीश कुमार की जनसभा को लेकर प्रदेश के कार्यकर्ता बेहद उत्साहित हैं. उनका कहना है कि इससे पार्टी की यूपी में सियासी जमीन मजबूत करने में मदद मिलेगी. उत्तर प्रदेश के फूलपुर, वाराणसी, अंबेडकरनगर और प्रतापगढ़ लोकसभा सीट में से किसी एक से नीतीश कुमार के चुनाव लड़ने की काफी समय से चर्चा है.

Varanasi News: देश में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा जहां बेहद उत्साहित है, वहीं विपक्षी दल लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाने में जुट गए हैं. खास बात है कि इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक इंक्लूसिव एलायंस (I-N-D-I-A) में कई मुद्दों को लेकर सहयोगी दलों में आपसी खींचतान देखने को मिली है. इसके मद्देनजर सियासी दल अब अपने स्तर से रणनीति को धार देने में जुट गए हैं. समाजवादी पार्टी यूपी में पहले से ही बड़े भाई की भूमिका अदा करने की बात कह रही है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का दावा है कि सपा लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी में टिकट मांगने नहीं बल्कि देने की स्थिति में है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी शिकस्त के बाद सपा उस पर और हमलावर हो गई है. खासतौर पर मध्य प्रदेश में गठबंधन नहीं करने पर पार्टी नेता कांग्रेस पर हमलावर बने हुए हैं. इस बीच नीतीश कुमार के यूपी में कार्यक्रम को लेकर सियासी पारा गरमा गया है. इसे लोकसभा चुनाव में पार्टी की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में जनसभा करेंगे. अहम बात है कि ये जनसभा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में आयोजित की जाएगी. नीतीश कुमार पहली जनसभा 24 दिसंबर को वाराणसी में करेंगे. बिहार के कैबिनेट मंत्री और जनता दल (यूनाइटेड) के संगठन मंत्री श्रवण कुमार ने शनिवार को वाराणसी में इसकी जानकारी दी. उन्होंने कहा कि कुर्मी वोट बैंक के लिहाज से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वपूर्ण जनसभा वाराणसी के रोहनिया क्षेत्र में होगी.

नीतीश कुमार की वाराणसी में जनसभा के मायने

उत्तर प्रदेश में नीतीश कुमार की जनसभा को लेकर प्रदेश के कार्यकर्ता और नेता बेहद उत्साहित हैं. उनका कहना है कि इससे पार्टी की यूपी में सियासी जमीन मजबूत करने में मदद मिलेगी. उत्तर प्रदेश के फूलपुर, वाराणसी, अम्बेडकर नगर और प्रतापगढ़ लोकसभा सीट में से किसी एक से नीतीश कुमार के चुनाव लड़ने की काफी समय से चर्चा है. अब उनकी जनसभा का कार्यक्रम तय होने के बाद इन अटकलों को और हवा मिल गई है. वहीं इस कांग्रेस पर प्रेशर पॉलिटिक्स से जोड़कर भी देखा जा रहा है. इंडिया गठबंधन को लेकर श्रवण कुमार ने कांग्रेस पर कटाक्ष किया. उन्होंने कहा कि गठबंधन के कुछ नेताओं से चूक हुई है. चूक की वजह से आपस में कुछ मतभेद होते रहते हैं. रणनीति बनाने में थोड़ी देर हो गई है. अब आगे कोई चूक न हो, इसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं. वहीं भाजपा पर हमलावर होते हुए श्रवण कुमार ने कहा कि उनके एजेंडे में जाति और धर्म है, जबकि हमारे एजेंडे में भाईचारा और प्रेम है.

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कार्यकर्ता नीतीश कुमार के यूपी से चुनाव लड़ने के इच्छुक

इस बीच यूपी के जद यू कार्यकर्ता चाहते हैं कि नीतीश कुमार यूपी से लोकसभा चुनाव लड़ें, इससे बड़ा सियासी संदेश जाएगा. पार्टी नेताओं को लगता कि नीतीश कुमार के यूपी से चुनाव लड़ने से न सिर्फ जद (यू) को लाभ मिलेगा, बल्कि विपक्ष का गठबंधन भी मजबूत स्थिति में होगा. अगर प्रयागराज की फूलपुर लोकसभा सीट की बात करें तो नीतीश कुमार के यहां से चुनाव लड़ने की चर्चा इससे पहले भी हुई थी. हालांकि तब जद (यू) की ओर से इसे खारिज कर दिया गया. वहीं इस बार खुद नीतीश सरकार में मंत्री श्रवण कुमार ने इस मुद्दे को हवा दे चुके हैं. श्रवण कुमार ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में जद (यू) के कार्यकर्ता चाहते हैं कि नीतीश कुमार उनके क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ें. इनमें विशेष रूप से फूलपुर की जनता नीतीश कुमार को अपने संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ाने की इच्छुक है. नीतीश कुमार के यूपी से चुनाव लड़ने को लेकर समाज के हर वर्ग के लोग उत्साहित हैं.

जातीय समीकरणों के लिहाज से फूलपुर लोकसभा सीट नीतीश कुमार के लिए बेहतर बताई जा रही है. दरअसल फूलपुर का सामाजिक समीकरण नीतीश कुमार के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है. यहां अब तक हुए 20 चुनावों में कुर्मी सांसद बने हैं. राम पूजन पटेल तीन बार और जंग बहादुर पटेल दो बार सांसद रहे हैं. नीतीश कुमार भी कुर्मी जाति से आते हैं.

नीतीश कुमार पर फूलपुर सीट से चुनाव लड़ने का बनाया जा रहा दबाव

ऐसे में विपक्षी एकता खासतसौर से समाजवादी पार्टी के सहयोग से नीतीश कुमार के लिए यहां सियासी राह आसान हो सकती है. विपक्षी दलों के उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरने से जद (यू) और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होगा, जिसका फायदा नीतीश कुमार को मिल सकता है. इस सीट को भाजपा की परंपरागत सीट नहीं माना जाता है. पार्टी का पहली बार 2014 में यहां खाता खुला था, तब केशव प्रसाद मौर्य ने यहां से जीत दर्ज की थी. योगी सरकार में उपमुख्यमंत्री बनने पर जब उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दिया तो सपा ने भाजपा के कब्जे से सीट छीन ली. हालांकि 2019 में भाजपा ने एक बार फिर यहां जीत दर्ज की.फूलपुर संसदीय सीट सियासी तौर पर बेहद अहम है. आजादी के बाद से ये संसदीय सीट न सिर्फ प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का संसदीय क्षेत्र रहा, बल्कि यहां से तमाम दिग्गजों ने चुनाव लड़ा है. इनमें से कई दिग्गज जीते और हारे, तो कुछ की जमानत भी जब्त हुई है.

नेहरू के कारण सुर्खियों में रही फूलपुर लोकसभा सीट

विधानसभा के तौर पर फूलपुर का गठन पहली बार 2012 में ही हुआ. इससे पहले इस विधानसभा का कुछ क्षेत्र प्रतापपुर तो कुछ झूंसी विधानसभा क्षेत्र में आता था. बाद में झूंसी विधानसभा को खत्म करके और प्रतापपुर के कुछ हिस्सों को मिलाकर फूलपुर के नाम से नई विधानसभा बनाई गई. वहीं, संसदीय सीट के तौर पर फूलपुर 1952 से ही अस्तित्व में है.देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1952 में पहली लोकसभा में पहुंचने के लिए इसी सीट को चुना और लगातार तीन बार 1952, 1957 और 1962 में उन्होंने यहां से जीत दर्ज कराई थी. नेहरू के चुनाव लड़ने के कारण ही इस सीट को वीआईपी सीट का दर्जा मिला. अहम बात है कि फूलपुर से जवाहर लाल नेहरू का कोई खास विरोध नहीं होता था और वे आसानी से चुनाव जीत जाते थे. लेकिन, उनके विजय रथ को रोकने के लिए 1962 में प्रख्यात समाजवादी नेता डॉक्टर राममनोहर लोहिया स्वयं फूलपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरे. हालांकि उन्हें हार नसीब हुई.

कांग्रेस को मिली शिकस्त

जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद इस सीट की जिम्मेदारी उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित ने संभाली और उन्होंने 1967 के चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी के जनेश्वर मिश्र को हराकर नेहरू और कांग्रेस की विरासत को आगे बढ़ाया. 1969 में विजय लक्ष्मी पंडित ने संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद इस्तीफा दे दिया. इसके बाद यहां हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने नेहरू के सहयोगी केशवदेव मालवीय को उतारा. लेकिन, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जनेश्वर मिश्र ने उन्हें पराजित कर दिया. इसके बाद 1971 में यहां से पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित हुए. आपातकाल के दौर में 1977 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने यहां से रामपूजन पटेल को टिकट दिया. लेकिन, जनता पार्टी की उम्मीदवार कमला बहुगुणा ने यहां से जीत हासिल की. बाद में कमला बहुगुणा स्वयं कांग्रेस में शामिल हो गईं. कमला बहुगुणा पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की पत्नी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और वर्तमान में भाजपा सांसद रीता बहुगुणा जोशी की मां थीं.

इन नेताओं ने जीत की हासिल

राजनीतिकि परिस्थितियों के कारण आपातकाल के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी की सरकार पांच साल नहीं चली और 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए. तब इस सीट से जनता पार्टी (सेक्युलर) के उम्मीदवार प्रोफेसर बीडी सिंह ने जीत दर्ज की. 1984 में हुए चुनाव कांग्रेस के रामपूजन पटेल ने जीत दर्ज कर एक बार फिर पार्टी की यहां वापसी कराई. हालांकि, कांग्रेस से जीतने के बाद रामपूजन पटेल जनता दल में शामिल हो गए. इसके बाद 1989 और 1991 का चुनाव रामपूजन पटेल ने जनता दल के टिकट पर ही जीता. पंडित नेहरू के बाद इस सीट पर लगातार तीन बार यानी हैट्रिक लगाने का रिकॉर्ड रामपूजन पटेल ने ही बनाया. 1996 से 2004 के बीच हुए चार लोकसभा चुनावों में यहां से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार जीतते रहे. 2004 में माफिया कहे जाने वाले अतीक अहमद ने यहां से जीत दर्ज की. अतीक अहमद के बाद 2009 में पहली बार इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने भी जीत हासिल की. जबकि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम यहां से स्वयं चुनाव हार चुके थे.खास बात है कि कुर्मी बहुल इस सीट पर अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल ने भी दो बार ताल ठोकी. हालांकि, 1996 के लोकसभा चुनाव में उनकी जमानत जब्त हो गई और 1998 में वह जमानत तो बचाने में कामयाब रहे लेकिन, जीत उनसे काफी दूर रही. 2014 में यहां की जनता ने केशव प्रसाद मौर्य को भारी मतों से विजयी बनाया. केशव मौर्य ने बसपा प्रत्याशी कपिलमुनि करवरिया को तीन लाख से भी जयादा मतों से शिकस्त दी. भाजपा के लिए ये जीत इतनी अहम थी कि पार्टी ने केशव प्रसाद मौर्य की इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी कर दी.

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