ePaper

Jharkhand News: झारखंड के जंगलों में पेड़ों से टपक रहा 'पीला सोना' ग्रामीणों के लिए है कितना खास

Updated at : 15 Apr 2022 1:45 PM (IST)
विज्ञापन
Jharkhand News: झारखंड के जंगलों में पेड़ों से टपक रहा 'पीला सोना' ग्रामीणों के लिए है कितना खास

Jharkhand News: सुन्दरू खेरवार कहते हैं कि खराब मौसम के कारण महुआ पिछले साल की अपेक्षा इस बार कम है. अभी पेड़ से चुनकर जमा कर रहे हैं. एक व्यक्ति पूरे सीजन मे क्विंटलभर सूखा महुआ जमा कर लेता है. इससे अच्छी आमदनी हो जाती है.

विज्ञापन

Jharkhand News: झारखंड के लातेहार जिले के महुआडांड़ के जंगलों में काफी संख्या में महुआ के पेड़ हैं. इनसे पीला सोना टपक रहा है. ग्रामीण कहते हैं कि जंगल के वनोपज में सबसे ज्यादा आय महुआ से है. इसको ग्रामीण पीला सोना भी कहते हैं. महुआ गिर रहा है. इस कारण सुबह-सवेरे जंगलों में लोगों की चहल-पहल बढ़ जाती है. ग्रामीण लाइट, लाठी और महुआ रखने के लिए टोकरी लेकर निकल पड़ते हैं. पेड़ के नीचे खाना-पीना एवं विश्राम करते ग्रामीणों को देखा जा सकता है. इन्हें जानवरों को महुआ खाने से रोकना पड़ता है. हर साल हजारों ग्रामीण परिवार के जीवनयापन का ये जरिया है. महुआ चुनकर आंगन में सूखाकर बेचते हैं.

महुआ की महत्ता

पीटीआर के जंगल और महुआडांड़ वन प्रक्षेत्र में मार्च से अप्रैल तक हर रोज कहीं न कहीं आपको धुआं अक्सर नजर आ जाएगा. नेतरहाट, दूरूप, हामी, अक्सी, कुरुंद, ओरसापाठ, सोहर के जंगल क्षेत्र में इन दिनों महुआ चुनने के लिए ग्रामीण सूखे पत्ते में आग लगा रहे हैं. जंगल में धुआं छाया हुआ है. यही आग कभी-कभी जंगल के बड़े हिस्से में फैल जाती है. इससे छोटे पौधे एवं बीज नष्ट हो जाते हैं, जबकि सांप, बिच्छू एवं अन्य जंगली जीव जलकर मर जाते हैं. आदिवासी जीवन में महुआ रचा बसा है. जन्म से लेकर मृत्यु तक एवं त्योहारों में महुआ शराब की डिमांड होती है. महुआ से कई प्रकार के व्यंजन भी तैयार होते हैं.

Also Read: …जब झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने नेतरहाट में सूर्योदय के अनुपम नजारे को कैमरे में किया कैद

कोरोना में महुआ से हुई अच्छी आमदनी

सुन्दरू खेरवार कहते हैं कि खराब मौसम के कारण महुआ पिछले साल की अपेक्षा इस बार कम है. जमा कर रहे हैं. एक व्यक्ति पूरे सीजन मे क्विंटलभर सूखा महुआ जमा कर लेता है. संतोष नगेसिया, विनोद किसान, फूदैन किसान, सूखू उरांव, असरीता नगेसिया व अन्य ग्रामीणों ने बताया कि कोरोना के कारण जब लॉकडाउन लगा, तब गांव में रोजगार के सृजन बंद थे, उस समय महुआ ने उनकी जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ायी. बीते साल महुआ पांच हजार रुपये प्रति क्विंटल तक बिका था.

Also Read: Jharkhand News: टाटा स्टील माउंट एवरेस्ट एक्सपीडिशन, झारखंड की अस्मिता दोरजी करेंगी माउंट ए‌वरेस्ट फतह

ग्रामीणों को किया जा रहा जागरूक

वन प्रक्षेत्र महुआडांड़ के पदाधिकारी वृंदा पांडेय ने बताया कि वन प्रक्षेत्र के जंगल में महुआ चुनने पर विभाग ने कभी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है, लेकिन आग लगाना जंगल को भारी नुकसान दे जाता है. आग से जंगल को बचाने की जिम्मेदारी केवल वन विभाग की ही नहीं है, बल्कि ग्रामीणों को भी जागरूक होना होगा. वन विभाग के द्वारा इको वन समिति एवं ग्रामीणों के बीच एयर ब्लोवर मशीन बांटी गयी है. एयर ब्लोवर के प्रेशर से सूखे पत्ते हटाकर महुआ समेट सकते हैं. आग बुझाने का काम भी किया जाता है. लगातार विभाग द्वारा गांव में ग्रामीणों के बीच जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है.

Also Read: Jharkhand Panchayat Chunav 2022: झारखंड पंचायत चुनाव का मामला क्यों पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, पढ़िए ये है वजह

रिपोर्ट: वसीम अख्तर

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola