चंदा मामा के पास बना है अंतरिक्ष यात्रियों का घर, स्पेस वॉक के दौरान यहीं करते हैं एंजॉय

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चंदा मामा के पास बना है अंतरिक्ष यात्रियों का घर, स्पेस वॉक के दौरान यहीं करते हैं एंजॉय

आइएसएस काम करने और रहने के लिए कई हिस्सों में बंटा हुआ है. इसमें एक 360 डिग्री का दृश्य दिखाने वाली खिड़की, अंतरिक्षयात्रियों के सोने के लिए छह क्वार्टर और दो बाथरूम हैं. नासा के अनुसार, इसका माप लगभग 109 मीटर है यानी 357 फीट, जो एक अमेरिकी फुटबॉल फील्ड के बराबर है.

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International Space Station Completes 25 Years, Know Its History & Significance : क्या आप जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यानी आईएसएस हर 24 घंटे में 16 बार हमारे सिर के ऊपर से होकर गुजरता है. यही नहीं, धरती से 439 किलोमीटर की ऊंचाई पर 16 सूर्योदय और सूर्यास्त देखना भी उसके रूटीन का हिस्सा है. इसकी मदद से ऐसी बहुत सारी खोजें हुई हैं, जो धरती पर जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं. यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, शांति, सहयोग और तकनीक के लिए दुनिया के सबसे सफल स्थानों में से एक है.

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन कब लॉन्च हुआ?

आइएसएस का पहला सेगमेंट जरया कंट्रोल मॉड्यूल रूसी था जो 20 नवंबर, 1998 को लॉन्च किया गया. जरया ने ईंधन स्टोरेज और बैटरी पावर पहुंचाई और आइएसएस पहुंचने वाले दूसरे अंतरिक्ष यानों के लिए डॉकिंग जोन की भूमिका निभायी. इसके लगभग 15 दिन बाद, 4 दिसंबर 1998 को अमेरिका ने यूनिटी नोड 1 मॉड्यूल लॉन्च किया. इन दोनों मॉड्यूल के जरिये स्पेस लैबोरेट्री ने काम करना शुरू किया. इसके बाद स्टेशन स्थापित करने के लिए 42 असेंबली फ्लाइट की मदद से, आइएसएस उस स्थिति में पहुंचा, जिसमें आज वह है.

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आइएसएस कितना बड़ा है?

आइएसएस काम करने और रहने के लिए कई हिस्सों में बंटा हुआ है. इसमें एक 360 डिग्री का दृश्य दिखाने वाली खिड़की, अंतरिक्षयात्रियों के सोने के लिए छह क्वार्टर और दो बाथरूम हैं. नासा के अनुसार, इसका माप लगभग 109 मीटर है यानी 357 फीट, जो एक अमेरिकी फुटबॉल फील्ड के बराबर है. इसका सोलर एरे विंगस्पैन भी 109 मीटर का है. कमर्शियल एयरक्राफ्ट से अगर इसकी तुलना करें, तो एयरबस ए380 का विंगस्पैन 79.8 मीटर है. इस स्पेस स्टेशन के अंदर लगभग 13 किलोमीटर लंबे इलेक्ट्रिकल तारों का जाल है.

स्टेशन पर क्या करते हैं एस्ट्रॉनॉट

दिनभर में आइएसएस धरती के कई चक्कर लगाता है. यह हर 90 मिनट पर, 8 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से चक्कर काटता है. जब अंतरिक्षयात्री किसी एक्सपेरिमेंट में नहीं लगे होते हैं, तब वह सामान्य स्पेसवॉक यानी अंतरिक्ष की सैर पर निकलते हैं ताकि स्टेशन में नयी चीजें जोड़ी जा सकें जैसे रख-रखाव या रोबोटिक हाथ. कई बार उन्हें अंतरिक्ष में पड़े मलबे की वजह से हुए छेदों का परीक्षण करके उन्हें ठीक भी करना पड़ता है. इसके अलावा, सेहत से जुड़ी कड़ी दिनचर्या का भी अंतरिक्षयात्री पालन करते हैं. उन्हें अपनी मांसपेशियों और हड्डियों को कमजोर होने से बचाना होता है, जिसकी वजह माइक्रोग्रैविटी या गुरुत्वाकर्षण की कमी है.

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आइएसएस पर खोज, धरती पर फायदा

अंतरिक्षयात्रियों ने आइएसएस पर सैकड़ों प्रयोग किये हैं. कई बार तो वे खुद पर भी एक्सपेरिमेंट करते हैं. जैसे अपनी सेहत मॉनीटर करना, खान-पान या फिर सोलर रेडिएशन के असर की पड़ताल. इसके साथ, वह धरती पर मौजूद वैज्ञानिकों के लिए भी प्रयोग करते हैं. इनमें बहुत सारी वैज्ञानिक सफलताएं मिली हैं. दिल की बीमारी हो या अल्जाइमर, पर्किंसन, कैंसर अथवा अस्थमा, इन सभी पर स्पेस में शोध हुआ है. वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ प्रयोग तो केवल अंतरिक्ष में ही बेहतर किये जा सकते हैं, क्योंकि माइक्रोग्रैविटी में कोशिकाएं वैसे ही काम करती हैं जैसे इंसान के शरीर में.

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Rajeev Kumar

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By Rajeev Kumar

राजीव, हिंदी डिजिटल मीडिया के अनुभवी पत्रकार हैं और प्रभातखबर डॉट कॉम में कार्यरत हैं. अपने 15 वर्षों से अधिक के पत्रकारीय अनुभव के दौरान उन्होंने टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल सेक्टर की हजारों खबरों, एक्सप्लेनर, एनालिसिस और फीचर स्टोरीज पर काम किया है. आसान भाषा, गहरी रिसर्च और यूजर-फर्स्ट अप्रोच उनकी कंटेंट राइटिंग की सबसे बड़ी पहचान है.

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