धनबाद के पंडालों में कल होगी मां काली की आराधना, तैयारी पूरी

Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 23 Oct 2022 10:41 AM

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मां काली की पूजा के लिए मंदिरों में विधिवत तैयारी कर ली गयी है. आद्या काली मंदिर के पुजारी हरि भजन गोस्वामी कहते हैं कि मां काली भक्तों की मन्नतें पूरी करती हैं. रात्रि नौ बजे पूजा शुरू होगी. रात्रि 11 बजे पुष्पांजलि दी जाएगी.

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Dhanbad News: मां काली की पूजा के लिए मंदिरों में विधिवत तैयारी कर ली गयी है. आद्या काली मंदिर के पुजारी हरि भजन गोस्वामी कहते हैं कि मां काली भक्तों की मन्नतें पूरी करती हैं. रात्रि नौ बजे पूजा शुरू होगी. रात्रि 11 बजे पुष्पांजलि दी जाएगी. महाआरती के बाद भक्तों के बीच भोग का वितरण किया जायेगा. हटिया काली मंदिर, हरि मंदिर काली मंदिर में मां काली की आराधना भक्त कर पायेंगे. रात्रि 10 बजे के बाद पूजा शुरू होगी. 11 बजे पुष्पांजलि दी जाएगी. महाआरती के बाद मां का भोग का वितरण किया जायेगा.

पुराना बाजार काली मंदिर जागृत मंदिर

पुराना बाजार काली मंदिर जागृत मंदिर है. कहते हैं यहां सच्चे मन से मांगी गयी मुराद पूरी होती है. काली पूजा में यहां दूर दराज से भक्त आते हैं. यहां मध्य रात्रि में पूजा शुरू होगी. नेपाल काली मंदिर जेसी मल्लिक रोड, तेलीपाड़ा काली मंदिर, हटिया काली मंदिर, में मध्य रात्रि में मां काली की आराधना की जायेगी. पुष्पांजलि, पूजन, आरती के बाद भोग वितरित की जायेगी.

24 को पंडाल का उदघाटन

श्री श्यामा पूजा समिति चिल्ड्रेन पार्क हीरापुर के पूजा पंडाल का उद्घाटन 24 अक्तूबर को संध्या साढ़े छह बजे कमेटी के सदस्यों द्वारा किया जायेगा. यहां तीन दिवसीय मेला लगाया गया है. 24 से 26 अक्तूबर तक मां की प्रतिमा पूजा स्थल पर रहेगी, मेला रहेगा. 28 अक्तूबर को मां की प्रतिमा खोखन तालाब जेसी मल्लिक रोड में विसर्जित की जायेगी. मां की पूजा रात्रि में होगी. महा आरती के बाद भक्तों के बीच भोग वितरित किया जायेगा. समिति द्वारा पूजा का 43वां साल है. इस साल धान की बिचाली से काल्पनिक मंदिर बनायी गयी है. पूजा को लेकर समिति के सदस्य सक्रिय हैं.

हमीद मिस्त्री ने दिया था नेपाल काली मंदिर को भव्य रूप

कोयलांचल के काली मंदिरों में नेपाल काली मंदिर जेसी मल्लिक रोड की विशिष्ट पहचान है. बताया जाता है कि वर्ष 1970 में स्थापित मंदिर के संस्थापक स्व नेपाल चंद्र बनर्जी को मां काली ने स्वप्न देकर मंदिर स्थापित करने को कहा था. 1980 में इसका रूप बड़ा हुआ और मंदिर को यह रूप देने में हमीद मिस्त्री का बड़ा हाथ था. मंदिर का पूरा निर्माण कार्य उसी ने किया. मंदिर के एक भक्त गणेश दा कनकनी कोलियरी में कार्यरत थे. उस समय मंदिर को बड़ा करने की बात चल रही थी, पर पैसे नहीं थे. ऐसे में मां ने फिर स्वप्न देकर नेपाल दा से कहा कि तुम काम शुरू करो, सब हो जायेगा. गणेश दा कोलियरी में हमीद नाम के व्यक्ति से टकरा गये. हमीद ने कहा कि वह मिस्त्री है और उसे काम की तलाश है. गणेश दा ने उनसे मंदिर बनाने की बात कही और हमीद मंदिर के निर्माण कार्य में लग गया. इसी मिस्त्री ने पूरे मंदिर का निर्माण किया. मजदूर भक्त और नेपाल दा के परिवार के थे.

अमावस्या में लगती है भीड़

वैसे तो हर अमावस्या में मां की पूजा खास होती है. भक्तों की भीड़ लगती है, पर कार्तिक अमावस्या की बात अलग है. मध्य रात्रि में पूजा-अर्चना के बाद मां को खीर, खिचड़ी, सब्जी, भुजिया का भोग लगता है. मां का आदेश था कि उनके भोग में नमक का इस्तेमाल नहीं हो. इसलिए भुजिया में नमक नहीं डाला जाता है. स्व बनर्जी की पत्नी सुधा रानी बनर्जी बताती हैं कि मां के स्वप्न में आने के बाद मेरे पति (स्व बनर्जी) ने गृहस्थ जीवन त्याग दिया था. उनका जीवन मां के चरणों में समर्पित था. सभी महिलाओं में मां का रूप नजर आता था. पति के देहांत के बाद उनके दोनों बेटे हराधन बनर्जी और ब्रह्मानंद बनर्जी मां की पूजा-अर्चना करते हैं. मां की पूजा उसी तरह होती है जैसे स्थापना के समय से होती थी.

मध्य रात्रि में होगी पुष्पांजलि

24 अक्तूबर को रात्रि 11 बजे से पूजा शुरू होगी. मध्य रात्रि में संकल्प के बाद मां को पुष्पांजलि दी जायेगी. महाआरती के बाद भोग वितरित किया जायेगा.

यहां मन्नतें होती हैं पूरी

श्रद्धालुओं की आस्था है कि इस मंदिर में मांगी गयी मन्नत पूरी होती है. काली पूजा में यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ होती है. पुष्पांजलि देने के लिए भक्त कतारबद्ध होकर रहते हैं. स्व बनर्जी के पुत्र हराधन बनर्जी और ब्रह्मानंद बनर्जी बताते हैं कि जिस जगह मंदिर स्थित है, वह तेलीपाड़ा के लखीकांत पाल की थी. मां ने उन्हें भी स्वप्न देकर मंदिर बनाने की बात कही थी. मंदिर से पूर्व वहां विशाल पीपल का पेड़ था. पेड़ के पास रखे कलश का जल स्वत: भरकर बहने लगा और उसी रात मां काली ने नेपाल चंद्र बनर्जी को स्वप्न देकर कहा कि वह यहीं बिराजमान हैं. अब वक्त आ गया है कि उनके लिए मंदिर बनाया जाए. इसकी चर्चा जमीन मालिक से की गयी. उन्होंने भी स्वप्न की बात कही. अत्यल्प राशि में जमीन मंदिर के लिए दे दी गयी. 1970 में छोटे स्तर पर मां काली की प्रतिमा स्थापित की गयी. भक्तगण पूजा करने आने लगे. इस मंदिर की इतनी महिमा है कि यहां मांगी गयी मन्नत पूरी होती है. मंदिर इस विशाल रूप 1980 में आया.

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