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गोरखपुर में बंगाली समिति ने शुरू की थी दुर्गा पूजा, कोलकता से आए कलाकर बनाते हैं प्रतिमा

Updated at : 15 Oct 2023 7:01 PM (IST)
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गोरखपुर में बंगाली समिति ने शुरू की थी दुर्गा पूजा, कोलकता से आए कलाकर बनाते हैं प्रतिमा

गोरखपुर में बंगाली समिति ने दुर्गा पूजा की शुरुवात की थी, जो आज भव्य रूप ले चुका हैं. शहर में अब हजारों की संख्या में मां दुर्गा की प्रतिमाएं बैठती हैं. श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह पर समितियों द्वारा प्रसाद की व्यवस्था की जाती है.

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शारदीय नवरात्र आज से शुरू हो गया है. गोरखपुर में भी मंदिरों में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जुट रही है. जय माता दी की जयकारे से मंदिर गूंज रहा है. गोरखपुर में कोलकाता के बाद दुर्गा पूजा की धूम देखने को मिलता है. शहर में दुर्गा पूजा शुरू करने का श्रेय बंगाली समिति को जाता है, आज गोरखपुर में यह भव्य रूप ले लिया है. यहां पर 9 दिन नवरात्र में माँ दुर्गा की विधिवत पूजा अर्चना होती है. दुर्गा पूजा की शुरुवात 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में हुआ था. गोरखपुर जिला अस्पताल में सिविल सर्जन डॉक्टर योगेश्वर राय ने 1896 में अस्पताल परिसर में ही दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. आज कोतवाली थाना क्षेत्र के दुर्गाबाड़ी में यह प्रतिमा रखी जाती है. 1953 से लगातार दुर्गा बाड़ी में यह मूर्ति रखी जा रही है. दुर्गा बाड़ी में जो मां दुर्गा की प्रतिमा बैठाई जाती है वह कोलकाता से आए कलाकार द्वारा बनाई जाती है. दुर्गाबाड़ी में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद की विशेष व्यवस्था की जाती है.

गोरखपुर में क्या है दुर्गा पूजा का इतिहास

सन 1896 में गोरखपुर जिला अस्पताल में सिविल सर्जन रहे डॉक्टर योगेश्वर राय ने दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. 1930 तक यहां पर दुर्गा पूजा निरंतर होता रहा. 1903 में प्लेग महामारी फैली जिसके कारण दुर्गा पूजा 1906 तक बंद रहा. 1907 से 1909 तक जुबली कॉलेज के प्रधानाचार्य राय साहब अघोरनाथ चटर्जी व डॉक्टर राधा विनोद राय ने जुबली कॉलेज में दुर्गा प्रतिमा की शुरुआत की थी.1910 में आर्य नाटक मंच का गठन हुआ. इसी समय दुर्गा पूजा अलहदादपुर में स्थानांतरित हो गई. दुर्गा पूजा को गति और व्यवस्थित रूप मिले इसके लिए 1928 में आर्य नाट्य मंच और सुहृदय समिति का विलय कर बंगाली समिति का गठन हुआ. जिसने दुर्गा पूजा की जिम्मेदारी संभाल ली. इसी समय दुर्गा पूजा स्थानांतरित होकर भगवती प्रसाद रईस के हाते में आ गई. कुछ वर्षों बाद यह पूजा चरनलाल चौराहे पर आयोजित होने लगी.

1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के समय सरकार ने चरनलाल चौराहे स्थित वह भवन अधिग्रहण कर लिया .तो समिति ने दुर्गा पूजा को दीवान बाजार में स्थानांतरित कर दिया.1953 में बाबू महादेव प्रसाद रईस ने अपने पिता भगवती प्रसाद की स्मृति में समिति को एक भूखंड प्रदान किया जहां आज दुर्गाबाड़ी है.1953 में स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त को इस भूमि का पूजन हुआ और तभी से यहां समिति की ओर से दुर्गा पूजन का आयोजन होने लगा.

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पंडाल में रहता है यह व्यवस्था

इस बार बंगाली समिति गोरखपुर में 116 वें वर्ष में  दुर्गा मूर्ति बैठा रही है .बंगाली समिति दुर्गा बाड़ी में श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था करती है. यहां पंडाल के साथ-साथ दुर्गाबाड़ी परिसर में स्टाल की भी व्यवस्था की जाती है. जहां खानपान के सामान बिकते है. बंगाली समिति हर दिन अपने श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रसाद की व्यवस्था करती है. लेकिन अष्टमी ,नवमी और दशमी को प्रसाद की कुछ विशेष ही व्यवस्था समिति के द्वारा किया जाता है. बंगाली समिति यहां बच्चों से लेकर महिलाओं के प्रोग्राम भी कराती है और उन्हें पुरस्कार भी देती है. बंगाली समिति शुरू से ही कंधों पर मां दुर्गा प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाती रही है. लेकिन 2013 में जब हुद हुद चक्रवाती तूफान आया था तब भी बंगाली समिति ने रथ की व्यवस्था की थी. इस बार भी मौसम को देखते हुए बंगाली समिति ने रथ की व्यवस्था की है जिस पर मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के लिए जाएगी.

बंगाली समिति के सदस्य अभिषेक नहीं बताया कि अष्टमी के दिन बच्चों के लिए बुगी बुगी डांस का कंपटीशन नित्यांजली और और गाने के लिए सा रे गा मा पा कंपटीशन स्वरांजली रखा गया है जो. अष्टमी और नवमी के दिन 11:00 बजे से शुरू होकर शाम 5:00 बजे तक चलेगा चलेगा. इस कंपटीशन में जो बच्चे क्वालीफाई करेंगें उनका 25 अक्टूबर को फाइनल कंपटीशन होगा. उन्होंने बताया कि समिति की ओर से सप्तमी,अष्टमी और नवमी को विशेष प्रसाद की व्यवस्था रखी गई है जो दिन में 2:00 बजे से शुरू होगा.

अभिषेक ने बताया कि अष्टमी को संधी पूजा होगा. यह एक विशेष पूजा होती है.अबकी बार इस पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 4.54 से शुरू हो कर 5.42 तक है. संधी पूजा का मुहूर्त कभी भोर में तो कभी मध्य रात्रि में भी पड़ता है.अबकी बार संधी पूजा का मुहूर्त शाम को पड़ा है. इस विशेष पूजा में 108 दिए जलाए जाते हैं,108 कमल का फूल माता को चढ़ाया जाता है और 108 मंत्र पढ़े जाते हैं. इस पूजा में बंगाली समाज के लोग काफी संख्या में मौजूद रहते हैं.अभिषेक ने बताया कि श्रद्धालुओं को कोई दिक्कत ना हो इसके लिए समिति की ओर से 150 वॉलिंटियर की व्यवस्था की गई है.

सुरक्षा के दृष्टिकोण से दुर्गाबाड़ी परिसर में सीसीटीवी लगाया गया है. परिसर के अंदर अस्थाई चौकी बनाई गई है.जहां पर महिला और पुरुष पुलिसकर्मी मौजूद रहेंगे.महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग लाइन की व्यवस्था की गई. जिससे श्रद्धालुओं को किसी तरह की दिक्कत ना हो. उन्होंने बताया कि श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद की व्यवस्था समिति के द्वारा की गई है.

रिपोर्टर – कुमार प्रदीप,गोरखपुर

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