Azadi Ka Amrit Mahotsav : क्रांतिकारियों की मदद की खातिर विधवा ननिबाला देवी बनी थीं दुल्हन

Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 04 Aug 2022 4:26 PM

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ननिबाला देवी भारत की एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी थी. 20वीं सदी के दूसरे दशक में वे कलकत्ता, चन्द्रनगर, चटगांव नगरों में क्रांतिकारियों को आश्रय देने, उनके अस्त्र-शस्त्र रखने और गुप्तचर पुलिस को चकमा देने के कारण प्रसिद्ध हो गई थी. बाद में वे फरार होकर पेशावर चली गई लेकिन जल्द ही वहां से गिरफ्तार भी हुई.

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आजादी का अमृत महोत्सव: महान क्रांतिकारी ननिबाला देवी का जन्म वर्ष 1888 में हावड़ा में हुआ था. उनके पिता का नाम सूर्यकांत बनर्जी और माता का नाम गिरीबाला देवी था. शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुई. 11 साल की उम्र में शादी हो गयी और पांच वर्ष बाद ही पति का निधन हो गया. वह मायके में रहने लगी. आगे पढ़ाई की इच्छा व्यक्त की. पिता की अनुमति मिली, तो उन्होंने सारा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया. ईसाई मिशन स्कूल में अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की, पर वैचारिक मतभेदों के कारण उन्हें मिशन छोड़ना पड़ा. इसके बाद वह अपने दूर के भतीजे अमरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के संपर्क में आयीं. अमरेंद्र प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन ‘युगांतर पार्टी’ के प्रमुख नेता थे. ननिबाला भी क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गयीं. उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य राष्ट्र के प्रति सर्वस्व समर्पण था.

वह क्रांतिकारियों के ठहरने, अस्त्र-शस्त्र छिपाने और युवक-युवतियों का चयन व प्रशिक्षण के प्रबंध करने लगीं. उन्हीं दिनों ननिबाला ने ऐसा साहसिक काम किया, जो इन दिनों किसी हिंदू विधवा के लिए अकल्पनीय था. दरअसल, क्रांतिकारी रामचंद्र मजूमदार जेल में बंद थे. गिरफ्तारी से पहले वह अपना रिवॉल्वर कहां छिपा गये, इसका पता उनके साथियों को नहीं था. ननिबाला ने स्वयं को रामचंद्र मजूमदार की पत्नी बताया और जेल में उनसे भेंट की और रिवाल्वर का पता लगा लिया.

क्रांतिकारियों को छिपाने में की मदद

9 सितंबर, 1915 को बाघा जतिन की अंग्रेजों से मुठभेड़ हुई, जिसमें गोली लगने से वह घायल हो गये. जख्म गहरा होने के बाद अगले दिन ही उनकी मौत हो गयी. बाघा जतिन के हिंदू-जर्मन षड्यंत्र से भयभीत होकर अंग्रेजों ने युगांतर पार्टी से जुड़े सभी क्रांतिकारियों की खोजबीन शुरू कर दी. इसके चलते युगांतर के सभी क्रांतिकारियों को भूमिगत होकर क्रांति की योजना बनाने पर मजबूर होना पड़ा. इसी दौरान ननिबाला ने क्रांतिकारियों के लिए आश्रय स्थल खोजने में काफी मदद की. उन्होंने चंदन नगर में किराए पर मकान लेकर जादू गोपाल मुखर्जी, अमरेंद्र नाथ चटर्जी, शिवभूषण दत्त आदि को शरण दी.

जेल में व्याप्त अव्यवस्था के खिलाफ लड़ी लड़ाई, जेलर को जड़ दिया थप्पड़

पुलिस को पता चला कि युगांतर पार्टी के नेता रामचंद्र मजूमदार की शादी ही नहीं हुई है. उनकी पत्नी बन कर आखिर उनसे मिलने कौन आया था? रहस्य उजागर होने पर ननिबाला का नाम सामने आया. इसकी भनक लगते ही ननिबाला बंगाल छोड़ कर लाहौर चली गयीं और वहां पर भूमिगत होकर काम करने लगीं. उनकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस को इनाम रखना पड़ा. इसी बीच उनकी तबीयत खराब हो गयी और पुलिस को उनके गुप्त स्थान पर पता चल गया. पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने युगांतर से जुड़ी गुप्त जानकारी प्राप्त करने के लिए कई दिनों तक उन्हें यातनाएं दी. उनके विभिन्न अंगों में पिसी हुई मिर्च तक भर दी.

दर्द से कराहती हुई ननिबाला ने महिला पुलिस को जोरदार ठोकर मारी और बेहोश हो गयीं. बाद में उन्हें कलकत्ता के प्रेसिडेंसी जेल में रखा गया. यहां की व्यवस्था के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी. जब गोल्डी नाम के पुलिस सुपरिटेंडेंट ने उनके लिखित मांग-पत्र को उनके सामने ही फाड़ कर फेंक दिया, तो ननिबाला ने यहां भी पूरी ताकत से एक घूंसा उसके मुंह पर जमा दिया. 1919 में उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया, पर किसी ने उनकी सुध नहीं ली. कष्ट और बीमारी झेलते हुए उन्होंने अपना अंतिम समय कलकत्ता की एक बस्ती में गुजारा. वर्ष 1967 में उनका निधन हो गया.

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