Azadi Ka Amrit Mahotsav: 15 साल की उम्र में शांति ने मजिस्ट्रेट चार्ल्स स्टीवंस को मारी थी गोली
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 04 Aug 2022 12:00 PM
शांति घोष भारत के स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी वीरांगना थीं. अपनी सहपाठिनी सुनीति चौधरी के साथ मिलकर उन्होंने त्रिपुरा के कलेक्टर चार्ल्स स्टिवेन को गोली मारी थी. शांति और सुनीति को संसार की सबसे कम उम्र की क्रांतिकारी माना जाता है. अंग्रेज सरकार ने उन्हें आजीवन काले पानी की सजा दी थी.
आजादी का अमृत महोत्सव: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी वीरांगना शांति घोष का जन्म 22 नवंबर, 1916 को बंगाल के कलकत्ता में हुआ था. उनके पिता देवेंद्रनाथ घोष मूल रूप से बारीसाल के रहने वाले प्रखर राष्ट्रवादी और विक्टोरिया कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे. शांति पर पिता की राष्ट्रभक्ति का प्रभाव था. वह बचपन से भारतीय क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ती थीं. एक छात्र सम्मेलन ने शांति और उनकी जैसी अन्य युवा लड़कियों को देश के लिए की जाने वाली गतिविधियों को ऊर्जा दी. 1931 में वह गर्ल्स स्टूडेंट्स एसोसिएशन की संस्थापक सचिव भी बनीं. फजुनिस्सा गर्ल्स स्कूल में पढ़ते हुए 15 वर्ष की उम्र में सहपाठी प्रफुल्ल नलिनी के संपर्क में आयीं और ‘युगांतर पार्टी’ में शामिल हो गयीं. क्रांतिकारी कार्यों के लिए प्रशिक्षण लेने लगीं. उन्होंने तलवार, लाठी चलाने और आग्नेयास्त्रों से आत्मरक्षा का प्रशिक्षण लिया. जब शांति क्रांतिकारी प्रशिक्षण में दक्ष हो गयीं, तब 14 दिसंबर, 1931 को उन्हें सुनीति चौधरी के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी दी गयी. उस समय उनकी उम्र महज 15 साल और सुनीति की उम्र सिर्फ 14 साल. इन दोनों के कंधों पर एक ब्रिटिश अफसर और कोमिल्ला जिले के मजिस्ट्रेट चार्ल्स जेफ्री बकलैंड स्टीवंस को मौत के घाट उतारने की जिम्मेवारी दी गयी. इन्होंने यह काम बड़ी चतुराई के साथ बखूबी अंजाम दिया.
जब फांसी की सजा नहीं मिलने पर हो गयी निराश
इस घटना के बाद इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. इन पर फरवरी, 1932 में कलकत्ता अदालत में मुकदमा चला और आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी, लेकिन ये दोनों ही क्रांतिपुत्री इस सजा से निराश थीं. वजह यह थी कि उन्हें फांसी की सजा नहीं दी गयी और इस तरह ये दोनों क्रांतिकारी महिलाएं देश के लिए अपनी शहादत नहीं दे पायीं. बाद में शांति घोष को जेल में अपमान और शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ा और उन्हें ‘दूसरे दर्जे का कैदी’ भी माना गया. वर्ष 1939 में उन्हें कई राजनीतिक कैदियों के साथ जेल से रिहा कर दिया गया.
आजादी के बाद भी राजनीतिक गतिविधियों में रहीं सक्रिय
जेल से रिहाई के बाद शांति घोष ने अपने अव्यवस्थित जीवन को व्यवस्थित करने के लिए फिर से अपनी पढ़ाई शुरू कर दी. उन्होंने बकायदा बंगाली महिला कॉलेज में दाखिला ले लिया. इस दौरान ही वह भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ी गयीं. हालांकि, बाद में शांति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गयीं. इसके बाद वर्ष 1942 में शांति घोष ने चटगांव के रहने वाले एक क्रांतिकारी और प्रोफेसर चितरंजन दास से शादी कर ली. देश की आजादी के बाद भी वह राजनीतिक गतिविधियों से निरंतर जुड़ी रहीं. उन्होंने वर्ष 1952 से 1962 और वर्ष 1967 से 68 तक पश्चिम बंगाल विधान परिषद में अपना योगदान दिया. वह वर्ष 1962 से 64 तक पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्य भी रहीं. उन्होंने बांग्ला में ‘अरुण बहनी’ नामक आत्मकथा लिखी और उसे प्रकाशित भी किया. देश के लिए सर्वस्व कुर्बानी देने वाली यह वीरांगना अपने जीवन के करीब 73 बसंत मातृभूमि की सेवा में व्यतीत करने के बाद 28 मार्च,1989 को चिरनिद्रा में चली गयीं.
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