भारत-बांग्लादेश के बीच बस्तियों की अदला-बदली, अपना वतन की गूंज से आधी रात को रौशन हुईं बस्तियां

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ढाका/कोलकाता/सिलीगुड़ी : भारत और बांग्लादेश के बीच आधी रात के समय 162 बस्तियों की अदला-बदली की गयी. इसके साथ ही दुनिया के सर्वाधिक पेचीदा सीमाई मुद्दों में शामिल इस समस्या को सुलझा लिया गया, जो सात दशकों से अटका पड़ा था. कई दशकों से बिना स्कूल, क्लिनिक और बिजली के रह रहे हजारों लोग ‘अपना […]

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ढाका/कोलकाता/सिलीगुड़ी : भारत और बांग्लादेश के बीच आधी रात के समय 162 बस्तियों की अदला-बदली की गयी. इसके साथ ही दुनिया के सर्वाधिक पेचीदा सीमाई मुद्दों में शामिल इस समस्या को सुलझा लिया गया, जो सात दशकों से अटका पड़ा था. कई दशकों से बिना स्कूल, क्लिनिक और बिजली के रह रहे हजारों लोग ‘अपना वतन’ पाकर खुशी से चिल्ला उठे. 31 जुलाई की रात के 12 बजते ही बस्तियों में जश्न का माहौल पैदा हो गया, जहां सालों से जिंदगी अधर में लटकी थी.
आधी रात बीतने के बाद 17, 160 एकड़ क्षेत्र में बसी 111 भारतीय बस्तियां बांग्लादेश का हिस्सा बन गयीं. इसी प्रकार 51 बांग्लादेशी बस्तियां भारतीय सीमाई क्षेत्र में शामिल हो गयीं. बीडीन्यूज 24 डाट काम ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि अंतत: दोनों देशों के बीच सीमाओं को अंतिम रूप दे दिया गया.
इस पल के गवाह: भारत के महापंजीयक, बांग्लादेश के सांख्यिकी ब्यूरो और कूच बिहार के जिला मजिस्ट्रेट तथा लालमोनीरघाट, पंचगढ़ , कुरीग्राम व नीलफामड़ी के उपायुक्तों ने दोनों ओर बसे लोगों से उनकी पसंद जानने के लिए व्यवस्थित ढंग से काम किया. इस पूरे काम को छह से 16 जुलाई के बीच 75 टीमों ने अंजाम दिया. इस सर्वे की अवधि में भारतीय और बांग्लादेशी सरकारों के 30 पर्यवेक्षक बस्तियों में मौजूद थे.
भारत को सबसे शांतिपूर्ण देश बताया: कूचबिहार जिले के दिनहाटा ब्लॉक के छींटमहल निवासी सुक्कुर अली शेख, सैदुल शेख आदि ने बताया कि भारत जैसा शांतिपूर्ण देश और नहीं है. हम भारतीय हो पाने से आज बेहद खुश हैं. हमारे कष्ट के दिन दूर हुए. बांग्लादेश में चावल, दाल की कीमत काफी ज्यादा है. भारत में रहने पर हमें काफी सुविधा होगी. बांग्लादेश में शांति नहीं है.
भारत में रह कर हम शांति में रह पायेंगे. अब हम चिंतामुक्त होकर सोना चाहते हैं. इतने दिनों तक हमने काफी कष्ट ङोला है. अब हमारे स्वतंत्र होने की बारी है. हमपर कई अत्याचार हुए हैं, जो अब से नहीं होगा. अब सिर्फ शांति ही शांति होगी. दूसरी ओर, कुछ छींटमहल वासी परिवार इस बात से चिंतित हैं कि वर्ष 2011 की जनगणना में उनके नाम रहने के बावजूद नयी समीक्षा में उनके नाम नहीं हैं.
उनका कहना हैं कि अगर उन्हें भारत की नागरिकता नहीं मिलती है तो उन्हें वापस बांग्लादेश जाना होगा. करीब 10 परिवारों के 50 लोगों के नाम अभी तक पंजीकृत नहीं हुए हैं. भारत-बांग्लोदश छींटमहल विनिमय सहकारिता कमेटी की ओर से दिप्तीमान सेनगुप्त ने बताया कि इतने दिनों का आंदोलन सफल हुआ.
यह थी स्थिति : एक अनुमान के अनुसार करीब 37 हजार लोग बांग्लादेश में भारतीय बस्तियों में रह रहे थे जबकि 14 हजार लोग भारत में बांग्लादेशी बस्तियों में रह रहे थे. इन 162 बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए इन बीते सालों में जिंदगी किसी दुखस्वप्न से कम नहीं रही.
अब क्या : अब सीमा के दोनों ओर इन बस्तियों के लोगों को भारत या बांग्लादेश की नागरिकता मिल जायेगी. इसके साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारों द्वारा उपलब्ध करायी जाने वाली अन्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच होगी.
चार दशक पहले हुआ था समझौता
– मूल रूप से भूमि समझौता 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान के बीच हुआ था.
– वर्ष 1975 में मुजीब की हत्या के बाद लंबे अर्से तक करार पर प्रगति रुकी रही. बाद की सरकारें बस्तियों के आदान-प्रदान पर सहमत नहीं हो पायीं.
– छह जून, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी बांग्लादेशी समकक्ष शेख हसीना की मौजूदगी में बस्तियों के आदान-प्रदान का करार हुआ और 31 जुलाई, 2015 को समझौता अमल में आया.
पश्चिम बंगाल
बेरुबाड़ी, सिंघपाड़ा-खुदीपाड़ा (पांचागढ़-जलपाईगुड़ी) : 1,374.00
पाकुरिया (खुष्टिया-नदिया) : 576.36
चार महिषकुंडी : 393.33
हरिपाल/एलएन पुर (पटारी) : 53.37
कुल : 2,398.05
पश्चिम बंगाल
बोसुमारी-मधुगाड़ी (कुष्टिया-नदिया) : 1,358.25, अंधारकोटा : 338.79, बेरुबाड़ी (पांचागढ़-जलपाईगुड़ी) : 260.55
कुल : 1,957.59
मेघालय
पिरडीवाह : 193.516
लिंगखात 1 : 4.793
लिंगखात 2 : 0.758
लिंगखात 3 : 6.940
दावकी/तामाबिल : 1.557
नलजुरी 1 : 6.156
नालजुरी 3 : 26.858
त्रिपुरा
चंदननगर (मौलवी बाजार-उत्तर त्रिपुरा) : 138.41
असम
ठाकुरानीबाड़ी-कलाबाड़ी/ बोरोइबाड़ी (कुरिग्राम-धुबरी) : 193.85, पल्लाथल (मौलवी बाजार-करीमगंज) : 74.54
मेघालय : लोबाचेरा-नुनचेरा : 41.702
कुल : 268.39 एकड़
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