घोड़ा गाड़ी में सवारी कर भक्त पहुंचते हैं जहुरा मंदिर

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मालदा. मालदा में आज भी घोड़ा गाड़ी से अवाजाही होती है. यहां के लोग आज भी घोड़ा गाड़ी में सवारी का लुत्फ लेते हैं, चाहे वह शौकिया भ्रमण के लिए हो या फिर परंपरा की खातिर. मालदा स्थित जहुरा कालीबाड़ी मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए भक्त घोड़ा गाड़ी में सवार होकर मंदिर जाते हैं. कहावत […]

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मालदा. मालदा में आज भी घोड़ा गाड़ी से अवाजाही होती है. यहां के लोग आज भी घोड़ा गाड़ी में सवारी का लुत्फ लेते हैं, चाहे वह शौकिया भ्रमण के लिए हो या फिर परंपरा की खातिर. मालदा स्थित जहुरा कालीबाड़ी मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए भक्त घोड़ा गाड़ी में सवार होकर मंदिर जाते हैं. कहावत है कि प्राचीन युग के साधक घोड़ा गाड़ी में चढ़ कर जहुरा मां की मंदिर में आते थे और तभी से आज तक भक्तों में घोड़ा गाड़ी में सवार होकर जहुरा कालीबाड़ी मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए जाने की परंपरा बनी हुई है.

मालदा शहर से पांच किलोमीटर दूर इंग्लिशबाजार ब्लॉक के जदुपुर दो नंबर ग्राम पंचायत में स्थित जहुरा काली मंदिर जाने के लिए सभी तरह के वाहन मौजूद हैं. ये वाहन मालदा के विभिन्न स्टैंडों से मिल जायेंगे. कई भक्त चार चक्का तथा मोटर बाइक से मंदिर में पूजा करने के जाते हैं, जबकि अधिकांश भक्त घोड़ा गाड़ी में सवारी करने की प्रथा को आज भी कायम रखे हुए हैं. 340 साल पुराने मालदा के जहुरा काली मंदिर में हर साल बैशाख महीने में धूमधाम से मां काली की पूजा-अर्चना की जाती है. इसके अलावा हर मंगलवार व शनिवार को यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है. मंदिर जाने के क्रम में सड़क के दोनों किनारे आम बागान पड़ता है. मंदिर इलाका भारत-बांग्लादेश सीमावर्ती क्षेत्र में आता है.

बैशाख माह में सिर्फ मालदा ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्य से तथा विदेशी पर्यटक भी इस मंदिर में भीड़ जमाते हैं. हर मंगल व शनिवार सुबह साढ़े सात बजे से रात नौ बजे तक मां की पूजा-अर्चना होती है. रात साढ़े नौ बजे आरती होती है. बैशाखी कालीपूजा के दौरान ही यह आरती होती है. आरती देखने के लिए मंदिर में भक्तों की व्यापक भीड़ उमड़ती है. जहुरा काली मंदिर के प्रमुख सेवक मुकुल तिवारी समेत उसके परिवार के सदस्य समर तिवारी, प्रवीर तिवारी, तपन तिवारी, कल्याण तिवारी समेत कई लोग इस मां की पूजा करते हैं. मुकुल तिवारी के अनुसार, जबा फूल, संदेश और बतासा से ही मां संतुष्ट हो जाती हैं.

ैक्या है इतिहास व प्रथा
मालूम हो कि बांग्ला वर्ष 1416 के चार बैशाख को तिवारी खानदान के छल्ब तिवारी ने जहुरा मां की पूजा-अर्चना की शुभारंभ की थी. यहां मां दुर्गा व काली दोनों रूप में पूजित होती हैं. मालदा शहर के नेताजी सुभाष रोड स्थित मूर्ति कलाकार जतीन पाल जहुरा मां का मुखौटा तैयार करते हैं. मां का मुखौटा तैयार होने के बाद मंदिर के पुजारी छह किलोमीटर सड़क पैदल चल कर जहुरा मां का मुखौटा मंदिर ले जाते हैं और पुराने मूर्ति को मंदिर के पश्चिम प्रांत में एक अश्वथ पेड़ के नीचे रख देते हैं. युगों से यह प्रथा प्रचलित है.
मुकुल तिवारी ने बताया कि भक्तों की सुविधा के लिए यहां विश्रम घर, पेयजल की व्यवस्था व बिजली की व्यवस्था है. बैशाख महीने में पुलिस व मेडिकल कैंप भी होता है. भक्तों के अनुसार, भक्ति और निष्ठा के साथ पूजा करने पर सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है. इस मंदिर में हर दिन भक्तों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. पुलिस अधीक्षक प्रसून बनर्जी ने बताया कि जहुरा काली मंदिर में बैशाख महीने में काफी भीड़ उमड़ती है. सुरक्षा के मद्देनजर यहां पुलिस का कैंप लगाया गया है.
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