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जलियांवाला नरसंहार के विरोध में कवि गुरु ने लौटायी थी उपाधि

जलपाईगुड़ी : पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार और उसके प्रतिवाद में कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा ब्रिटिश सरकार की दी हुई नाइटहुड की पदवी लौटाने की शतवार्षिकी के उपलक्ष में समारोह आयोजित करने पर विचार चल रहा है. इसको लेकर उत्तरबंगाल विश्वविद्यालय का इतिहास अनुसंधानी शिक्षक मंच रवींद्रभारती और विश्वभारती विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र […]

जलपाईगुड़ी : पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार और उसके प्रतिवाद में कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा ब्रिटिश सरकार की दी हुई नाइटहुड की पदवी लौटाने की शतवार्षिकी के उपलक्ष में समारोह आयोजित करने पर विचार चल रहा है. इसको लेकर उत्तरबंगाल विश्वविद्यालय का इतिहास अनुसंधानी शिक्षक मंच रवींद्रभारती और विश्वभारती विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र देगा. इसके अलावा राज्य सरकार के सूचना व संस्कृति विभाग को भी सरकारी तौर पर समारोह आयोजित करने के लिये अनुरोध किया जायेगा.

रविवार को जलपाईगुड़ी शहर के बाबुपाड़ा स्थित सुभाष भवन में मंच की पहल पर जलियांवाला बाग हत्याकांड और कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा नाइट की उपाधि लौटाने की परिघटना शीर्षक से स्मारक वक्तृता में बंगरत्न डॉ. आनंद गोपाल घोष ने मंच से अनुरोध भेजने के लिये कहा.
अपने संबोधन में उत्तरबंगाल विवि के इतिहास के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. घोष ने कहा कि उन्हें जितनी जानकारी है अभी तक राज्य के 31 विश्वविद्यालयों के साथ इस बारे में किसी तरह की बातचीत नहीं की गयी है. यहां तक कि कवि-गुरु से आत्मीय रुप से जुड़े रवींद्रभारती और विश्वभारती विवि प्रशासन से भी कोई बातचीत नहीं हुई है. हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि इस विषय पर समारोह सरकारी तौर पर आयोजित किया जायेगा.
उन्होंने बताया कि मंच की ओर से पहली बार किसी मुफस्सिल शहर में इस तरह का आयोजन किया गया. इसलिये उन्होंने मंच से समारोह के आयोजन के लिये उक्त दोनों प्रमुख विश्वविद्यालयों से अनुरोध करने के लिये कहा है. आज के कार्यक्रम में तीन शिक्षक शिक्षिकाओं दिलीप दे, सरिफुल रहमान और प्रणति भौमिक का अभिनंदन किया गया.
डॉ. आनंदगोपाल घोष ने कहा कि जलियांवाला नरसंहार का प्रतिवाद करते हुए कवि-गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेज सरकार द्वारा दी गयी नाइटहुड की उपाधि को वापस कर दिया था. उन्होंने इस कांड के विरोध के लिये आंदोलन करने के लिये महात्मा गांधी और जतिन दास से मदद मांगी थी.
लेकिन उन दोनों ने ही मदद करने से इंकार कर दिया था. इतिहास पढ़ने वालों से कहा कि हमें याद रखना होगा कि इतिहास तथ्यों का दास है. काल को छोड़कर इतिहास का आकलन नहीं किया जा सकता. उन्होंने शिक्षक शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों से नया इतिहास और वास्तविक इतिहास निर्माण के लिये आगे आने के लिये कहा. वहीं, मंच के अध्यक्ष बाबलु राय ने बताया कि पुस्तक पढ़कर हम अच्छे अंक हासिल कर सकते हैं.
लेकिन इतिहास का निर्माण संभव नहीं है. उन्होंने बताया कि मंच उत्तरबंगाल और राज्य के आंचलिक इतिहास लेखन की योजना पर काम कर रहा है. मंच के सचिव अरुण कृष्ण घोष ने बताया कि भारतवर्ष और महात्मा गांधी के सार्द्धशती के उपलक्ष में गांधीजी की प्रासंगिकता विषय पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित की गयी थी.
Prabhat Khabar Digital Desk
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