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शहीद दिवस रैली में एक बार फिर बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठा सकती है तृणमूल

Updated at : 20 Jul 2025 10:56 PM (IST)
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शहीद दिवस रैली में एक बार फिर बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठा सकती है तृणमूल

अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस अपने वार्षिक 'शहीद दिवस' रैली को 'बंगाली अस्मिता' के विमर्श को मजबूत करने.

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कोलकाता. अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस अपने वार्षिक ”शहीद दिवस” रैली को ”बंगाली अस्मिता” के विमर्श को मजबूत करने और भाजपा शासित राज्यों में बांग्ला भाषी प्रवासियों के कथित उत्पीड़न को लेकर भाजपा पर निशाना साधने के मंच के तौर पर इस्तेमाल करने की तैयारी में है. भाजपा शासित असम, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली जैसे राज्यों में बांग्ला भाषी श्रमिकों के साथ भाषा के आधार पर कथित तौर पर भेदभाव और तनाव की पृष्ठभूमि में तृणमूल ने कोलकाता के धर्मतला स्थित विक्टोरिया हाउस के पास 21 जुलाई को इस रैली का आयोजन किया है. पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस रैली में अपने कार्यकर्ताओं से यह संदेश दोहराने की उम्मीद है कि बांग्ला भाषी अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक नहीं हैं. तृणमूल के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “बार-बार गरीब बांग्ला भाषी श्रमिकों को हिरासत में लिया जा रहा है. परेशान किया जा रहा है और उन्हें घुसपैठिया करार दिया जा रहा है. भाजपा गरीबी को अपराध बना रही है और हाशिए पर पड़े लोगों को परेशान करने के लिए पहचान को हथियार बना रही है.” मुख्यमंत्री ने हाल ही में एक जनसभा में कहा था कि भाजपा शासित राज्यों में बंगाली होना अपराध हो गया है. उन्हें लगता है कि हर बंगाली बांग्लादेश से है. हम (तृणमूल) यह अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे. तृणमूल ने भाजपा पर ‘भाषाई भेदभाव’ का आरोप लगाया है और क्षेत्रीय पहचान के भावनात्मक मुद्दे को फिर से उभारने की कोशिश कर रही है. माना जा रहा है कि तृणमूल को 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हिंदुत्व लहर का मुकाबला करने में क्षेत्रीय पहचान के मुद्दे से काफी मदद मिली थी. तृणमूल के एक सांसद ने कहा, “ गरिमा, पहचान और अस्तित्व दांव पर है. भाजपा राष्ट्रवाद की आड़ में बंगाली अस्मिता को मिटाने पर तुली है. हमारी लड़ाई सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि अस्तित्व की है.” दूसरी ओर, भाजपा ने तृणमूल के आरोपों पर जोरदार पलटवार किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में दुर्गापुर में अपनी रैली के दौरान तृणमूल पर घुसपैठ को बढ़ावा देने और वोट बैंक की राजनीति के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने का आरोप लगाया था. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “यह भाजपा ही है जो वास्तव में बंगाली अस्मिता की रक्षा करती है.” उन्होंने भाजपा को बंगाल में एकमात्र विश्वसनीय विकल्प के रूप में पेश किया. बंगाली प्रवासियों के उत्पीड़न के तृणमूल के आरोपों का जवाब देते हुए भाजपा नेताओं ने दावा किया है कि यह भ्रम नागरिकता और मतदाता दस्तावेजीकरण को सुव्यवस्थित करने में तृणमूल की विफलता से उपजा है. भाजपा की बंगाल इकाई के एक नेता ने कहा कि वे अपनी अक्षमता छिपाने के लिए दूसरों पर आरोप लगा रहे हैं. तृणमूल हर साल 21 जुलाई को शहीद दिवस रैली आयोजित करती है. पार्टी 1993 में पुलिस गोलीबारी में 13 युवा कार्यकर्ताओं के मारे जाने की याद में शहीद दिवस मनाती है. उस समय युवा कांग्रेस की तत्कालीन मुखर नेता ममता बनर्जी ने राज्य सचिवालय तक एक मार्च का नेतृत्व किया था, जिसमें मांग की गयी थी कि मतदाता पहचान पत्र को ही मताधिकार के लिए एकमात्र दस्तावेज बनाया जाये. पिछले कुछ वर्षों में यह रैली तृणमूल के लिए शक्ति प्रदर्शन का मौका बन गयी है, जिसमें वह अक्सर आगामी सियासी लड़ाइयों का रुख तय करती है. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, इस साल की रैली 2026 के विधानसभा चुनावों से पूर्व अभियान शुरू करने का ””””लॉन्च पैड”””” होगा, जहां तृणमूल बंगाली अस्मिता और राज्य की सीमाओं के पार अपने लोगों के कथित अपमान को मुख्य मुद्दा बना आगे की लड़ाई लड़ने की योजना बना रही है. तृणमूल के एक युवा विधायक ने कहा, “हमने 2011 में उन्हें पोरिबॉर्तन (परिवर्तन) दिया था. अब हम उन्हें प्रतिरोध देंगे.” उन्होंने बनर्जी के भाषण की ओर इशारा किया, जिसमें भावनात्मक अपील के साथ तीखे राजनीतिक संदेश दिये गये. तृणमूल की इस रैली में राज्य के कोने-कोने से काफी तादाद में समर्थकों के कोलकाता पहुंचने की उम्मीद है. कुछ लोग भीड़-भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में, तो कुछ तृणमूल के झंडे लगे ट्रक से शहर की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे कोलकाता में उत्सव जैसा माहौल बन रहा है. रविवार को भी महानगर व आसपास इलाकों में तृणमूल समर्थकों का जुटना शुरू हो गया था. धर्मतला और सियालदह स्टेशन के आसपास चाय की दुकानें और ढाबे अन्य जगहों में ””””खेला होबे, आबार होबे”””” (खेल होगा, फिर होगा) और ””””बांग्लार केउ बांग्लादेशी नोय”””” (बंगाल का कोई भी बंगाली बांग्लादेशी नहीं है) जैसे नारे लिखे दिखाई दे रहे हैं. पार्टी के एक रणनीतिकार ने कहा, “1993 से 2025 तक यह रैली एक श्रद्धांजलि से कहीं अधिक है. यह सुश्री बनर्जी की अन्याय के खिलाफ, अपमान के खिलाफ और बंगाल की आत्मा के लिए लड़ाई की घोषणा है.”

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SANDIP TIWARI

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SANDIP TIWARI is a contributor at Prabhat Khabar.

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