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किडनी ट्रांसप्लांट के बाद हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का सफल प्रबंधन

Updated at : 25 Feb 2026 12:49 AM (IST)
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किडनी ट्रांसप्लांट के बाद हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का सफल प्रबंधन

मुकुंदपुर के मणिपाल हॉस्पिटल में 30 सप्ताह तीन दिन पर सिजेरियन से 1.6 किग्रा बच्ची का जन्म

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मां और प्रत्यारोपित किडनी सुरक्षित कोलकाता. दक्षिण कोलकाता के मुकुंदपुर स्थित मणिपाल हॉस्पिटल के चिकित्सकों ने किडनी प्रत्यारोपण करा चुकी एक महिला की अत्यंत जोखिमपूर्ण (हाई-रिस्क) गर्भावस्था का सफल प्रबंधन किया. उपचार के दौरान मां और शिशु दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की गयी तथा प्रत्यारोपित किडनी की कार्यक्षमता भी सुरक्षित रखी गयी. इस जटिल मामले के लिए बहु-विभागीय मेडिकल टीम गठित की गयी थी. टीम का नेतृत्व अस्पताल के डायरेक्टर–नेफ्रोलॉजी एवं कंसल्टेंट (नेफ्रोलॉजी व किडनी ट्रांसप्लांट) डॉ उपल सेनगुप्ता ने किया. उनके साथ गायनेकोलॉजी, ऑब्स्टेट्रिक्स एवं मैटरनल फीटल मेडिसिन की विशेषज्ञ डॉ शिल्पिता बनर्जी सहित एनेस्थीसिया, क्रिटिकल केयर और नवजात विशेषज्ञों की टीम शामिल थी. मरीज माधबीलता कुंडू (33) बर्दवान की निवासी हैं. उनका दिसंबर 2023 में किडनी प्रत्यारोपण हुआ था. गर्भावस्था के 16वें सप्ताह में लंबे समय से चल रही प्रतिरक्षा-दमन (इम्यूनोसप्रेसिव) दवाओं के उपचार के दौरान वह अस्पताल पहुंचीं. उनके चिकित्सा इतिहास में पूर्व सिजेरियन प्रसव, एक बार गर्भपात, उच्च रक्तचाप, हाइपोथायरॉयडिज्म और प्रत्यारोपण के बाद गर्भावस्था से जुड़े अतिरिक्त जोखिम शामिल थे. इन परिस्थितियों को देखते हुए निरंतर निगरानी और अत्यंत सावधानीपूर्वक चिकित्सीय योजना की आवश्यकता थी. विस्तृत मूल्यांकन और परिवार के साथ सामूहिक निर्णय के बाद नेफ्रोलॉजी, प्रसूति एवं स्त्री रोग, एनेस्थीसिया, क्रिटिकल केयर और नवजात विशेषज्ञों की देखरेख में गर्भावस्था जारी रखने का फैसला किया गया. गर्भावस्था के 21वें सप्ताह में मरीज में कई गंभीर जटिलताएं सामने आयीं. इनमें प्रत्यारोपित किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होने की आशंका, गंभीर एनीमिया, क्रिएटिनिन स्तर में वृद्धि, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप और सक्रिय संक्रमण शामिल थे. उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कर रक्त चढ़ाया गया, दवाओं में आवश्यक बदलाव किये गये और संक्रमण का आक्रामक उपचार शुरू किया गया. इस दौरान गर्भस्थ शिशु की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी गयी, ताकि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और किसी भी असामान्यता को रोका जा सके. कुछ समय के लिए स्थिति स्थिर हुई, लेकिन 28वें सप्ताह तक किडनी संबंधी परीक्षणों के परिणाम फिर बिगड़ने लगे. रक्तचाप में उतार-चढ़ाव बढ़ गया, गर्भ में शिशु का विकास प्रभावित होने लगा और एम्नियोटिक द्रव की मात्रा भी घट गयी. इससे मां की सुरक्षा और प्रत्यारोपित किडनी को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न हुई. नेफ्रोलॉजी, प्रसूति, एनेस्थीसिया और नवजात विशेषज्ञों के बीच विस्तृत चर्चा के बाद मां के हित को प्राथमिकता देते हुए गर्भावस्था के 30 सप्ताह और तीन दिन पर नियोजित सिजेरियन ऑपरेशन करने का निर्णय लिया गया. सुदृढ़ एनेस्थीसिया और नवजात देखभाल सहयोग के साथ 1.6 किलोग्राम वजनी बच्ची का जन्म हुआ. जन्म लेते ही बच्ची रोने लगी. बाद में उसे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआइसीयू) में रखा गया, जहां 20 दिनों तक विशेष देखभाल दी गयी. डॉ शिल्पिता बनर्जी ने कहा कि यह गर्भावस्था शुरू से ही चिकित्सकीय रूप से बेहद संवेदनशील थी. मरीज कई शारीरिक जटिलताओं से जूझ रही थीं और छोटी-सी भी चिकित्सीय बदलाव मां और शिशु दोनों के परिणामों को प्रभावित कर सकता था. हमारा लक्ष्य मां की स्थिति को स्थिर रखते हुए शिशु की निरंतर निगरानी करना था. टीमवर्क और सतर्क निगरानी की बदौलत हम बार-बार आने वाली चुनौतियों के बावजूद गर्भावस्था को सुरक्षित रूप से आगे बढ़ा सके. डॉ. उपल सेनगुप्ता ने कहा कि किडनी प्रत्यारोपण के बाद गर्भावस्था स्वाभाविक रूप से उच्च जोखिम वाली होती है, क्योंकि इससे प्रत्यारोपित किडनी पर अतिरिक्त शारीरिक दबाव पड़ता है. हमारी प्राथमिकता किडनी की कार्यक्षमता को सुरक्षित रखते हुए गर्भावस्था को सुरक्षित रूप से आगे बढ़ाना था. इसके लिए लगातार मूल्यांकन, दवाओं का सावधानीपूर्वक समायोजन और अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना आवश्यक था. यह सफलता समय पर लिए गये निर्णय और बहु-विभागीय समन्वय के महत्व को दर्शाती है.

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GANESH MAHTO

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By GANESH MAHTO

GANESH MAHTO is a contributor at Prabhat Khabar.

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