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संताल युवा शिक्षा को अपनायें, भाषा व परंपराओं को करें संरक्षित

Updated at : 08 Mar 2026 1:01 AM (IST)
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संताल युवा शिक्षा को अपनायें, भाषा व परंपराओं को करें संरक्षित

**EDS: THIRD PARTY IMAGE** In this image posted on March 7, 2026, President Droupadi Murmu gives an addressal during the 9th International Santal Conference, in Darjeeling, West Bengal. (@rashtrapatibhvn/X via PTI Photo)(PTI03_07_2026_000108A)

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शनिवार को कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संताल समुदाय के योगदान को उचित मान्यता नहीं मिली है.

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बोलीं राष्ट्रपति

संवाददाता, कोलकाता

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शनिवार को कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संताल समुदाय के योगदान को उचित मान्यता नहीं मिली है. उन्होंने कहा कि कई महान हस्तियों को इतिहास में जान-बूझकर शामिल नहीं किया गया. सिलीगुड़ी में नौवें अंतरराष्ट्रीय संताल सम्मेलन में उन्होंने कहा कि यह संताल समुदाय के लिए गर्व की बात है कि हमारे पूर्वज, तिलका मांझी ने लगभग 240 साल पहले शोषण के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाया था. अपने विद्रोह के लगभग 60 वर्ष बाद, वीर भाई सिदो-कान्हू और चांद-भैरव ने वीर बहनों फूलो-झानो के साथ मिलकर 1855 में संथाल हुल का नेतृत्व किया.

संतालों को नहीं मिल रहा विकास का लाभ : मौजूदा चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रपति ने कुछ क्षेत्रों में विकास की गति पर सवाल उठाते हुए कहा : मुझे नहीं लगता कि इस क्षेत्र में संताल और अन्य आदिवासी प्रगति कर रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि उन्हें विकास का लाभ मिल रहा है. उन्होंने इस तरह की सभाओं के आयोजन में आने वालीं बाधाओं का भी उल्लेख किया. कहा : जब मैं इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए यहां आ रही थी, तो मुझे एहसास हुआ कि कोई इस बैठक को आयोजित करने के लिए तैयार नहीं था. ऐसा लगता है कि कुछ लोग संताली समुदाय को प्रगति करते, सीखते व एकजुट होकर मजबूत होते देखना नहीं चाहते. ओल चिकी लिपि के आविष्कारक को दी श्रद्धांजलि: ओल चिकी लिपि के आविष्कारक पंडित रघुनाथ मुर्मू को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने कहा : 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी लिपि का आविष्कार किया था. उनके योगदान ने संताली भाषी लोगों को अभिव्यक्ति का एक नया द्वार प्रदान किया. उन्होंने बिदु चंदन, खेरवाल वीर, दलगे धन और सिदो कान्हू-संताली हुल जैसे नाटकों की रचना भी की. इस प्रकार उन्होंने संताली समुदाय में साहित्य और सामाजिक चेतना का प्रकाश फैलाया. उन्होंने संतालियों से आग्रह किया कि वे अपनी मातृभाषा से जुड़े रहते हुए अन्य भाषाएं भी सीखें. आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों पर राष्ट्रपति ने कहा : आदिवासियों ने सदियों से अपने लोक संगीत, नृत्य और परंपराओं को संरक्षित रखा है. उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को बनाये रखा है. प्रकृति संरक्षण का पाठ भावी पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है. परंपरा व आधुनिक विकास में संतुलन बनाने पर जोर : उन्होंने परंपरा और आधुनिक विकास के बीच संतुलन बनाये रखने पर जोर दिया. द्रौपदी मुर्मू ने कहा : लोक परंपराओं और पर्यावरण को संरक्षित करने के साथ-साथ, हमारे आदिवासी समुदायों को आधुनिक विकास को अपनाना चाहिए और प्रगति की राह पर आगे बढ़ना चाहिए. मुझे पूरा विश्वास है कि संताल समुदाय सहित आदिवासी समुदायों के सदस्य प्रगति और प्रकृति के बीच सामंजस्य का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे.

देश के लिए संताल समुदाय ने दिया योगदान

राष्ट्रपति ने कहा : लेकिन मैं जानती हूं कि संतालों ने देश के लिए कितना योगदान दिया है. बाबा तिलका मांझी, सिदो-कान्हू और चांद-भैरव, और ऐसे कई अन्य लोग हैं, जिनके नाम इतिहास में दर्ज नहीं हैं. मुझे लगता है, अगर उनके नाम शामिल किये जाते, तो पूरा इतिहास उनके नामों से भर जाता. लेकिन उनके नाम जान-बूझकर शामिल नहीं किये गये. आज भी इतिहास उनके नाम चाहता है. लेकिन आप डर क्यों रहे हैं और पीछे क्यों जा रहे हैं? न्होंने संतालों के साहस की प्रशंसा करते हुए कहा : आप उनके पूर्वज हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि आप संताली हैं. आपकी रगों में संतालों का खून बह रहा है. संताली हीनता को पसंद नहीं करते. वे हीनता के खिलाफ लड़ते हैं. वे बहादुर हैं और एक बहादुर समुदाय से संबंध रखते हैं.

संताली समुदाय के लिए ऐतिहासिक है वर्ष 2003

द्रौपदी मुर्मू ने संताली पहचान के प्रमुख पड़ावों को याद करते हुए कहा : वर्ष 2003 को संताली समुदाय के इतिहास में हमेशा याद रखा जायेगा. उस वर्ष संताली भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था. पिछले वर्ष, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर, संताली भाषा में ओल चिकी लिपि में लिखा गया संविधान जारी किया गया था.

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AKHILESH KUMAR SINGH

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