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जूट भंडारण की सीमा सीमित होने से उद्योग की मुश्किलें बढ़ीं

Updated at : 19 Dec 2025 1:42 AM (IST)
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जूट भंडारण की सीमा सीमित होने से उद्योग की मुश्किलें बढ़ीं

वर्ष 2025–26 में कच्चे जूट पर लगायी गयी लगातार स्टॉक सीमा आदेशों ने जूट उद्योग की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. एक ओर सरकार ने खाद्यान्न पैकेजिंग में जूट बोरियों (जीबीटी) के अनिवार्य उपयोग में ढील दी है,

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संवाददाता, कोलकाता वर्ष 2025–26 में कच्चे जूट पर लगायी गयी लगातार स्टॉक सीमा आदेशों ने जूट उद्योग की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. एक ओर सरकार ने खाद्यान्न पैकेजिंग में जूट बोरियों (जीबीटी) के अनिवार्य उपयोग में ढील दी है, दूसरी ओर मिलों, बेलर्स और ट्रेडर्स के लिए जूट भंडारण की आजादी पहले से काफी कम कर दी गयी है. नतीजतन, कीमतों पर नियंत्रण और जमाखोरी रोकने के इरादे वाला यह ढांचा अब उत्पादन क्षमता और रोजगार पर दबाव बढ़ा रहा है. मिलों के लिए दो महीने से घट कर 45 दिन: जूट मिलों के लिए सबसे बड़ा बदलाव स्टॉक सीमा में आया है. पहले मिलें लगभग दो महीने की खपत के बराबर कच्चा जूट अपने पास रख सकती थीं, जिससे मौसम, फसल और आपूर्ति में उतार-चढ़ाव के बावजूद उत्पादन स्थिर रखा जा सके. नये आदेशों के तहत यह सीमा घटा कर केवल 45 दिन की खपत कर दी गयी है. जीबीटी ऑर्डर में कमी के कारण कई मिलों ने अपनी उत्पादन क्षमता पहले ही घटा दी है. अब चूंकि स्टॉक सीमा वर्तमान उत्पादन पर आधारित है, इसलिए कम उत्पादन का मतलब है कि मिलें अब पहले से भी कम जूट रख सकती हैं. मिल प्रबंधकों का कहना है कि कम ऑर्डर, महंगा कच्चा जूट और 45 दिन की सीमित स्टॉक क्षमता के साथ लगातार आपूर्ति बनाये रखना अत्यंत कठिन होता जा रहा है. कच्चे जूट के बेलर्स और ट्रेडर्स के लिए भी नियम सख्त हुए हैं. शुरुआत में जारी आदेशों ने बेलर्स की सीमा लगभग 500 क्विंटल और अन्य ट्रेडर्स की सीमा 100 क्विंटल के आसपास कर दी थी, जबकि अपंजीकृत इकाइयों के लिए मात्र 500 किलोग्राम की अनुमति थी. बाद में इन सीमाओं को वापस लिया गया और फिर एक नये आदेश के साथ बेलर्स के लिए सीमा 2,000 क्विंटल और अन्य स्टॉकिस्टों के लिए 300 क्विंटल तक बढ़ायी गयी. उल्लेखनीय है कि अपंजीकृत कारोबारियों के लिए पहले 500 किलोग्राम की अलग सीमा निर्धारित थी. नयी व्यवस्था में इस तरह की अलग छोटी सीमा का उल्लेख नहीं है, ऐसे में या तो इन इकाइयों को औपचारिक रूप से पंजीकृत होकर कड़े नियमों का पालन करना होगा या धीरे–धीरे कच्चे जूट के व्यापार से बाहर होना पड़ेगा. सरकार और जूट आयुक्त कार्यालय की मंशा स्पष्ट है – कच्चे जूट की तेजी, संभावित जमाखोरी और खाद्यान्न पैकेजिंग लागत पर बढ़ते दबाव को देखते हुए बाजार को अनुशासित करना और पारदर्शिता लाना. साप्ताहिक ऑनलाइन रिटर्न, स्टॉक सीमा और निरीक्षण की व्यवस्था के जरिए प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि बड़ी मात्रा में जूट बंद गोदामों में न फंसा रहे और मिलों को पर्याप्त आपूर्ति मिलती रहे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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